सामुदायिक वन अधिकार और महामारी : ग्राम सभा ने दिखाई राह

PostedonNov. 28, 2020inPerspectives

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‘साधारण’ लोगों के असाधारण कार्य : महामारी एवं लॉकडाउन से परे शृंखला का खंड – २ 

और

कोविड १९ एवं व अधिकार का पांचवा बुलेटिन

अक्तूबर २०२०

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इन दिनों भारत कोविड-19 से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से एक है। 15 सितंबर 2020 तक 5 मिलियन से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके थे। वैश्विक महामारी और देशव्यापी तालाबंदी से गरीब और वंचित समुदायों की बड़ी आबादी भीषण रूप से प्रभावित हुई है। इसके कारण इन लोगों ने अपनी आजीविका व रोजगार को खोया, खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ा और सामाजिक- आर्थिक संकट झेला। प्रवासी मजदूरों को भारी दुख तकलीफ का सामना करना पड़ा, और यह वैश्विक स्तर की खबर बनी। भारत सरकार ने संसद के मानसून सत्र में एक सवाल के जवाब में कहा कि उसके पास प्रवासी मजदूरों की मौत व रोजगार का कोई आंकड़ा नहीं है। इस तरह के आंकड़ें नहीं रखे गए हैं, इसलिए मुआवजा नहीं दिया जा सकता। इन प्रवासी मजदूरों में संभवतः आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी भी शामिल हैं, इन समुदायों के लोग अक्सर शहरों में बेहतर रोजगार के मौकों की तलाश में पलायन करते हैं।

पिछले कुछ समय से देशज् समुदायों को शक्तिहीन बनाया जा रहा है। पारंपरिक पारिस्थितिकी तंत्र तक उनकी पहुंच, उपयोग, प्रबंधन और संरक्षण अधिकार में कमी आई है। टिकाऊ और प्रकृति आधारित आजीविका के संरक्षण व विकास में मदद कमी हुई है। वन समुदायों के पारंपरिक पारिस्थितिकी तंत्र का उद्योगों व खनन उद्देश्य के लिए परिवर्तन होने से वे इनसे वंचित हो गए हैं। और उनसे कठोर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। आर्थिक, सामाजिक, और पारिस्थितिकी संकट के यह कुछेक कारण हैं। इसमें भारत में आदिवासियों व अन्य परंपरागत वन निवासियों की बाहरी पलायन की पीड़ा भी शामिल है।

प्रारंभिक आंकलन रिपोर्ट के अनुसार जो वन समुदाय पहले से वन,संरक्षण और आर्थिक नीतियों के कारण असुरक्षित, उत्पीड़न व अन्याय का सामना करना कर रहे थे, उनमें महामारी से कई गुना समस्याएं बढ़ गई हैं। इस अवधि में सुरक्षा की कमी ने वंचित व असुरक्षित समुदाय की स्थिति को उजागर कर दिया है। इसके अलावा, आदिवासी इलाकों में पहले से मौजूद स्थिति जैसे गंभीर रूप से बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, पेशेवर स्वास्थ्यकर्मियों की कमी,सूचना और जागरूकता की कमी, पारंपरिक चिकित्सा व्यवस्था का कमजोर हो जाना, इन सब कारणों ने आदिवासी इलाकों में महामारी का खतरा और बढ़ा दिया है। लगभग 100 मिलियन वनों में रहनेवाले लोग कई तरह से जंगल पर निर्भर हैं – भोजन, दवाई और आमदनी के लिए उनकी निर्भरता जंगल पर है। वनोपज संग्रहण का मौसम मुख्यतः अप्रैल से जून तक होता है, संयोग से उन्हीं दिनों तालाबंदी थी।

इन समस्याओं के बावजूद, ऐसे सैकड़ों उदाहरण पहले से मौजूद हैं जिससे पता चलता है कि आदिवासी व अन्य परंपरागत वन निवासियों में ऐसे संकट से निपटने की असाधारण संभलने व फिर से खड़े होने की क्षमता है, विशेषकर, तब जब वे कानूनी रूप से सशक्त हैं। इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी ( वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 और पंचायत उपबंध ( अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 ( पेसा) के अंतर्गत भूमि और वन अधिकार को मान्यता मिली है। इन दोनों कानूनों में आदिवासी व अन्य परंपरागत वन निवासी समुदायों को अधिकार दिए गए हैं, भूमि व संसाधनों पर उनके अधिकारों को मान्यता दी गई है। इन दो कानूनों से संकट व प्रतिबंधों को नियंत्रित करने में मदद मिली है।

यह दस्तावेज ऐसे कुछ उदाहरणों का है, जिसमें यह समझने में मदद मिलेगी कि समुदायों ने इस व्यापक संकट के समय किस तरह उसका मुकाबला किया। अध्ययन के मौजूदा उदाहरणों से समुदाय सशक्तिकरण को समझने में मदद मिलेगी। इस अध्ययन के उदाहरणों से यह समझने में मदद मिलेगी कि कोविड-19 जैसे महामारी के समय समुदाय को फिर से खड़ा किया जा सकता है। जैसे समुदाय का सशक्तिकरण, विशेषकर, इस कार्यकाल में सुरक्षा सुनिश्चित करना, प्राकृतिक संसाधन शासन और प्रबंधन शक्ति विकसित करना,पारिस्थितिकी तंत्र को फिर बहाल करना, टिकाऊ अर्थव्यवस्था बनाना और समुदायों में संभलने की क्षमता के साथ प्राकृतिक व मानव प्रेरित करना। इस अध्ययन में विस्तार से प्रकाश डाला गया है।

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