किसान आंदोलन के समर्थन में बयान (in Hindi)

By विकल्प संगम का कोर समूह (अनुवाद बाबा मायाराम)onDec. 09, 2020inPerspectives

Read the original Statement (in English)

हम, विकल्प संगम के कोर समूह के सदस्य, नए कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए चल रहे किसान आंदोलन के साथ अपनी एकजुटता व समर्थन का इजहार करते हैं। कृषक ( सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020,कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य ( संवर्धन व सरलीकरण) विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु ( संशोधन) विधेयक 2020 को किसान आंदोलन रद्द करने की मांग कर रहे हैं। किसान आंदोलन को दबाने के लिए सरकार की दमनात्मक नीति अपनाने से भी हमें धक्का लगा है., कार्यकर्ताओं पर मनमाने मुकदमे लगाना, विरोध को क्रूर तरीके से दमन करना व दबाना और दिल्ली की सीमा पर कड़ाके की ठंड में किसानों पर आंसू गैस के गोले छोड़ना, पानी की बौछारों का इस्तेमाल करना।

इन दिनों व्यापार समर्थक व किसान विरोधी अधिनियम के खिलाफ बड़ा और व्यापक किसान आंदोलन जारी है। इन कानूनों को हड़बड़ी में संसद के सत्र में सितंबर 2020 में चुपके से लाया गया, जिसमें केंद्र सरकार  ने असंवेदनशीलता दिखाई है। 1 दिसंबर 2020 को गतिरोध तोड़ते हुए किसान आंदोलन के साथ बैठक बुलाई और नए कृषि कानूनों का बचाव किया, साथ ही कानूनों पर चर्चा के लिए समिति बनाने का सुझाव दिया। यह साफ तौर पर आंदोलन के साथ धोखा व उसे कमजोर करने की चाल थी, बांटो और राज करो की नीति थी। ज्वाइंट एक्शन कमेटी, जिसमें राज्य व राष्ट्रीय स्तर के 500 किसान संगठन शामिल हैं, ने सरकार के समिति बनाने के प्रस्ताव को ठुकराकर सही कदम उठाया है। किसानों की असली मांगों पर ध्यान देने की बजाय समिति के माध्यम से उन्हें संभवतः शिक्षित करने की बात की जा रही थी।

हमारा मत है कि ये कानून किसानों की भूमि का हस्तांतरण करेंगे (भूमिहीन बनाएगी)  और उन्हें गरीब व अभावग्रस्त बनाएंगे, क्योंकि नए कानून इसे करने की अनुमति देते हैं। कृषि व्यवसाय व कारपोरेट घरानों की लाबी के मारफत यह कानून निर्मम लूट को बढ़ाएंगे। सरकार पर इसे करने का दबाव है। विश्व व्यापार संगठन ( डब्ल्यू. टी.ओ) के संयुक्त राष्ट्र व अन्य बड़े औद्योगिक बाजार अर्थव्यवस्था सरकार पर यह दबाव डाल रहे हैं। और वह देश की सब्सिडी व्यवस्था, सार्वजनिक भंडारण व सार्वजनिक वितरण प्रणाली को नष्ट करना चाह रही है। भारत ने विश्व व्यापार संगठन में विकसित देशों के दबाव के बावजूद प्रगतिशील रूख अपनाया था, और पीस क्लाज या शांति अनुच्छेद के लिए खाद्य स्टाकहोल्डिंग का बचाव किया था, लेकिन नए पारित कृषि कानून इसके उलट हैं और यह कदम भारत ने खुद घरेलू तौर पर उठाया है। नए कानून एक ऐसा मार्ग बनाना चाह रहे हैं जो कृषि उत्पादन को खाद्य सुरक्षा व खाद्य संप्रभुता के मूल उद्देश्य को छोड़कर अनाज के निर्यात व व्यवसायीकरण की ओर ले जाते हैं।

यह नया रास्ता कृषक समुदाय को अनियंत्रित बाजार व मांग और आपूर्ति की अनिश्चितता के जोखिम में डालेगा। किसान (विशेषकर, छोटी जोतवाले, जो कृषक समुदाय की बड़ी आबादी को बनाते हैं) जो कृषि संकट से लगातार जूझ रहे हैं और उन पर, उन उपायों का आर्थिक प्रभाव पड़ा है जो वर्तमान व पूर्ववर्ती सरकारों ने लिए हैं।  इस स्थिति ने कृषि पर निर्भर सारेपरिवारों को गंभीर रूप से कर्ज में डुबो दिया है और इसके परिणामस्वरूप किसान आत्महत्याएं बढ़ी हैं। विडंबना है कि इससे किसान परिवारों में पोषण में कमी का संकट बढ़ेगा, यह स्थिति तब और बदतर हो जाएगी जब यह क्षेत्र अनियंत्रित बाजार के हाथ में चला जाएगा। कृषक समुदायों की महिलाएं और बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

हमारा मानना है कि वर्तमान किसानों का विरोध तीन कृषि कानूनों की वापसी से आगे जाएगा। इससे लोकतांत्रिक स्थान का विस्तार होगा जो वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में लगातार सिकुड़ता जा रहा है।

हम किसान आंदोलन के साथ एकजुटता का इजहार करते है हुए मांग करते हैं किः –

  • नए कृषि कानूनों की वापसी हो, हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि वह इस पर गंभीरता दिखाए और किसानों की मांगे माने, और तत्काल एक अध्यादेश जारी कर इन कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाएं।
  • संघर्षरत किसानों व किसान संगठनों के नेताओं पर लादे गए सभी मुकदमे वापस लिए जाएं।
  • स्वामीनाथन कमीशन रिपोर्ट के आधार पर किसानों के सभी कृषि उत्पादों और उपयोगी वस्तुओँ का लाभकारी मूल्य निर्धारण हो। और किसान संगठनों और संबंधित एजेंसियों से परामर्श कर इसकी गारंटी देने के लिए कानून बनाया जाए।
  • किसानों की कर्जमाफी हो, इसमें वे महिला किसान भी शामिल हों जिनके परिवार में किसान खुदकुशी हुई है, और वे भी जिन्होंने सूक्ष्म वित्त ( माइक्रोफायनेंस) कंपनियों व स्वयं सहायता समूह से कर्ज लिया है।
  • सभी कमजोर परिवारों को मासिक आय समर्थन किया जाए और मनरेगा और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली का क्रियान्वयन हो, जिसमें किसानों के लिए स्वास्थ्य रक्षा और शिक्षा में मदद हो।
  • सरकार को कृषि उत्पाद विपणन समिति में सुधार के लिए तत्काल कदम उठाना चाहिए, जिससे छोटे व सीमांत किसानों को बिक्री में आसानी से पहुंच की सुनिश्चतता हो, जिसमें वे महिला किसान भी शामिल हों जो स्थानीय स्तर पर व्यापार करती हैं। आंध्रप्रदेश व तेलंगाना सरकार ने जो ग्राम स्तर पर सरकारी खरीद की पहल की है, और प्रत्य़क्ष विपणन के लिए मदद पहल की है, उस तरह की कदम उठाए  जा सकते हैं।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सार्वभौमिकरण व विस्तार हो, जिसमें पौष्टिक अनाज,दालें व तेल शामिल हों, इसकी विके्द्रीकृत तरीके से लाभकारी मूल्य पर खरीदी की गारंटी दी जाए। इसी तरह के सुधार कई सरकारें पोषण कार्यक्रमों (पोषण अभियान, समेकित बाल विकास सेवाओं के तहत् पूरक पोषण व भोजन, मध्यान्ह भोजन योजना इत्यादि)  चलाकर कर रही हैं, इस तरह के कार्यक्रम की तत्काल जरूरत है। ऐसे कदम विविध फसलों की खरीदी में मददगार होंगे,  और स्थानीय विशिष्टता  और स्थानीय कृषि पारिस्थितिकीय के अनुसार साथ पोषण सुरक्षा भी सुनिश्चित करेंगे। 

वर्तमान कृषि विकास माडल को तत्काल बदलकर और अगले दशक के अंदर सभी किसानों को इस लक्ष्य तक पहुंचने के साथ हम सरकार को व भौतिक, सामाजिक, संस्थागत ढांचा और नीतियां बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं, जिससे किसानों को बाहरी निवेश लागतवाली गैरटिकाऊ खेती ( एकल खेती पद्धति,संकर बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक व अन्य कर्जवाली खेती) के दुष्चक्र से बाहर निकलने में मदद मिले। इसके स्थान पर ज्यादा टिकाऊ, पुनर्योजी व विविध कृषि पद्धति ( जैसे पारिस्थितिकीय कृषि, समुदाय आधारित प्राकृतिक खेती, गैर रासायनिक प्रबंध खेती, जैविक खेती, पुनर्योजी खेती, संरक्षण खेती, कम बाहरी निवेश टिकाऊ खेती इत्यादि)  की ओर मुड़ना चाहिए। इस तरह की टिकाऊ खेती से पोषण सुरक्षा, बेहतर जीवनशैली और आमदनी, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, जैसे पानी और पारिस्थितिकीय का पुर्नत्पादन  सुनिश्चित हो सकता है। और किसानों को साहूकारों व कारपोरेट के चंगुल से मुक्ति भी मिल सकती है। विशेषकर, महिला किसानों की खेती की स्थिति पर ध्यान देने की जरूरत है। उनके ज्ञान को मान्यता देना, भूमि का अधिकार, निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना, और अन्य खेती में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित करना। हजारों ऐसे उदाहरण हैं, जहां इस तरह की पहल सफल हुई हैं। इस तरह की पहल सभी कृषि पारिस्थितिकीय में हुई हैं, उन्हें इस्तेमाल कर फैलाना चाहिए, कई सरकारें भी पहले से इन्हें मदद कर रही हैं, और पोषण कार्यक्रमों के माध्यम से संभव बना सकती हैं। यह भारत को कई वैश्विक पर्यावरणीय व मानव अधिकारों के अनुबंधों ( जैव विविधता व जलवायु) के कर्तव्य पालन में भी महत्वपूर्ण मदद कर सकेगी।       

एक बार फिर विकल्प संगम का कोर समूह के सभी सदस्य किसान आंदोलन के प्रति अपनी एकजुटता व समर्थन का इजहार करते हैं। यह लोकतांत्रिक संघर्ष गरिमापूर्ण जीवन के लिए है।

विकल्प संगम कोर समूह के सदस्

1. एक्कोर्ड ( तमिलनाडु)

2. एलायंस फार सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर ( राष्ट्रीय)

3. आल्टरनेटिव ला फोरम ( बेंगलुरू)

4. अशोक ट्रस्ट फार रिसर्च इन इकोलोजी एंड द एनवायरनमेंट (बेंगलुरू)

5. भाषा ( गुजरात)

6. भूमि कालेज (बेंगलुरू)

7. ब्लू रिवन मूवमेंट ( मुंबई)

8. सेंटर फार एजूकेशन एंड डाक्यूमेंटेशन ( मुंबई)

9. सेंटर फार एनवायरनमेंट एजूकेशन ( गुजरात)

10. सेंटर फार इक्विटी स्टडीज (दिल्ली)

11. सीजी नेट स्वर (छत्तीसगढ़)

12. चालाकुदी पुजा संरक्षण समिति/ रिवर रिसर्च सेंटर ( केरल)

13. काममुटिनी ः द यूथ कलेक्टिव (दिल्ली)

14. डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी ( तेलंगाना)

15. डियर पार्क ( हिमाचल प्रदेश)

16. डेवलपमेंट आल्टरनेटिव ( दिल्ली)

17. धर्ममित्र ( महाराष्ट्र)

18. एकता परिषद ( कई राज्य)

19. एकता ( चेन्नई)

20. इक्वेशंस (बेंगलुरू)

21. एक्सटेंशन रिबेलियन इंडिया ( राष्ट्रीय)

22. जीन कैम्पेन ( दिल्ली)

23. गूंज ( दिल्ली)

24. ग्रीनपीस इंडिया (बेंगलुरू)

25. हेल्थ स्वराज संवाद ( राष्ट्रीय)

26. आइडियासिंक ( दिल्ली)

27. जागोरी रूरल ( हिमाचल प्रदेश)

28. कल्पवृक्ष ( महाराष्ट्र)

29. नालेज इन सिविल सोसायटी ( राष्ट्रीय)

30. कृति टीम ( दिल्ली)

31. लद्दाख आर्ट एंड मीडिया आर्गनाइजेशन ( लद्दाख)

32. लोकल फ्यूचर ( लद्दाख)

33. माध्यम ( दिल्ली)

34. माटी ( उत्तराखंड)

35. महिला किसान अधिकार मंच ( राष्ट्रीय)

36. महालीर एसोसिएशन फार लिटरेसी, एवरनेस एंड राइट्स ( मालार)

37. मजदूर किसान शक्ति संगठन ( राजस्थान), री वाइटालाइजिंगरेनफेड एग्रीकल्चर नेटवर्क ( राष्ट्रीय)

38. नेशनल एलायंस आफ पीपुल्स मूवमेंट ( राष्ट्रीय)

39. नेशनल कैम्पेन फार दलित ह्यूमन राइट्स ( राष्ट्रीय)

40. निरनगल ( तमिलनाडु)

41. नार्थ ईस्ट स्लो फुड एंड एग्रो वायोडवर्सिटी सोसायटी ( मेघालय)

42. पीपुल्स सिसोर्स सेंटर ( दिल्ली)

43. पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट ( उत्तराखंड)

44. रिस्टोर ( चेन्नई)

45. सहजीवन ( कच्छ, गुजरात)

46. संभावना ( हिमाचल प्रदेश)

47. संवेदना ( महाराष्ट्र)

48. संगम (बेंगलुरू)

49. संगत ( दिल्ली)

50. स्कूल फार डेमोक्रेसी ( राजस्थान)

51. स्कूल फार रूरल डेवलपमेंट एंड एनवायरनमेंट ( कश्मीर)

52. शिक्षांतर ( राजस्थान),

53. स्नो लेपर्ड कंजरवेंसी इंडिया ट्रस्ट( लद्दाख)

54. सिक्किम इंडीजीनस लेपचा वीमेंस एसोसिएशन

55. सोशल इंटरप्रेन्योरशिप एसोसिएशन ( तमिलनाडु़)

56. सोपेकाम ( महाराष्ट्र)

57. साउथ एशियन डायलाग आन इकोलोजिकल डेमोक्रेसी ( दिल्ली)

58. स्टुडेंट एनवायरनमेंटल एंड कल्चरल मूवमेंट आफ लद्दाख ( लद्दाख)

59. थनल ( केरल)

60. टिम्बकटू कलेक्टिव ( आंध्रप्रदेश)

61. तितली ट्रस्ट ( उत्तराखंड)

62. ट्राइबल हेल्थ एनीशिएटिव ( तमिलनाडु)

63. उरमुल ( राजस्थान)

64. वृक्षमित्र ( महाराष्ट्र)

65. वाटरशेड सपोर्ट सर्विस एंड एक्टीविटीस नेटवर्क ( आंध्रप्रदेश, तेलंगाना)

66. यूथ एलायंस (दिल्ली)

67. युग्म नेटवर्क ( राष्ट्रीय)

68. दिनेश अबरोल

69. सुषमा आयंगार

संपर्क ः के. जे. जाय – [email protected]

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