महामारी में फुलवारी के पलते बच्चे (in Hindi)

By बाबा मायारामonDec. 12, 2021in Food and Water

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially written for Vikalp Sangam)

सभी फोटो – जन स्वास्थ्य सहयोग

“हम फुलवारी की सब्जी बाड़ी में कई तरह की सब्जियां, फल और फूल लगाते हैं। बारिश और ठंड के मौसम में दो बार सब्जियां उगाते हैं। इससे जो हरी पत्तीदार व ताजा सब्जियां निकलती हैं, उन्हें हम फुलवारी के बच्चों को खिलाते हैं, घर में खाते हैं, जिससे पोषण मिलता है। हमने महामारी के समय भी बच्चों के पोषण में कमी ना हो इसलिए कोविड नियमों का पालन करते हुए उन्हें घर-घर जाकर खिचड़ी खिलाई”, यह मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के उपरीकला गांव की ललिता मरावी थीं।

फुलवारी का अर्थ फूलों की बगिया होता है। लेकिन यह एक तरह का झूलाघर है, जो तीन साल तक के बच्चों के पोषण व स्वास्थ्य में सुधार का कार्यक्रम है। इसे जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और अनूपपुर जिला प्रशासन के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। यह अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड में चल रहा है। इस कार्यक्रम की शुरूआत 2018 में हुई है। जन स्वास्थ्य सहयोग, एक स्वयंसेवी संस्था है जो पिछले 18 वर्षों से छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य और बाल पोषण पर काम कर रही है।

इस कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. पंकज तिवारी ने बतलाया कि अनूपपुर जिला आदिवासी बाहुल्य है। इस जिले का एक विकासखंड पुष्पराजगढ़ है, जो गरीब व पहुंचविहीन है। इस विकासखंड में 268 गांव हैं । जिसकी 74 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन.एफ.एच.एस.-4) के मुताबिक अनूपपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्र में 5 साल से कम उम्र के 42.2 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं।

डॉ. पंकज तिवारी बताते हैं कि यहां के आदिवासियों की आजीविका खेती-किसानी और मजदूरी पर निर्भर है। वे रोज कमाने और रोज खाने वाले हैं। ऐसे में बच्चों की उचित देखभाल और आहार के प्रति ध्यान नहीं दे पाते हैं। 3 साल तक के आयु वाले बच्चों को समुचित पोषण की बेहद जरूरत होती है। उन्हें इस अवधि में स्वादिष्ट, गरम, पतला और मुलायम भोजन मिलना चाहिए।

वे आगे बतलाते हैं कि पर गांवों में यह देखा गया है कि अगर बच्चों के माता-पिता दोनों मजदूरी पर या खेत में काम करने के लिए जाते हैं तो छोटे बच्चों का ख्याल रखना मुश्किल हो जाता है। छोटे बच्चों को बुजुर्ग या उनके बड़े भाई-बहन के सहारे छोड़कर उनके मां-बाप को काम पर जाना पड़ता है। इस कारण बड़े भाई-बहन स्कूल नहीं जा पाते। बुजुर्ग भी कई बार उचित देखभाल नहीं कर पाते।

इसके सबके मद्देनजर जन स्वास्थ्य सहयोग की ओर से फुलवारी कार्यक्रम शुरू किया गया है। इस विकासखंड को काम की सुविधा के लिए 6 संकुल में बांटा गया है। पडमनिया, कोडार, खमरौद, अलवार, करपा, और लेंडरा संकुल बनाए गए हैं। जिसमें हर संकुल में एक सुपरवाइजर है, और फुलवारी केन्द्र में एक फुलवारी कार्यकर्ता है। कार्यक्रम के संचालन में सुपरवाइजर सहयोग करता है।

फुलवारी केन्द्र में 6 माह से 3 साल तक के बच्चों को रखा जाता है। इस केन्द्र में बच्चों के माता-पिता सुबह 9 बजे उन्हें छोड़कर जाते हैं और शाम को 4.30 बजे घर ले जाते हैं। फुलवारी में बच्चों को हर तरह से स्वस्थ रखने पर जोर दिया जाता है। यहां उन्हें पका पकाया खाना खिलाया जाता है। सत्तू और खिचड़ी दी जाती है। उन्हें खाने में तेल की मात्रा दी जाती है। हफ्ते में तीन दिन अंडे भी दिए जाते हैं। आयरन सीरप भी दिया जाता है। समय-समय पर सहायक नर्स मिडवाइफरी (ए.एन.एम.) द्वारा घर-घर जाकर बच्चों के स्वास्थ्य की जानकारी ली जाती है। इस दौरान कोई बच्चा बीमार होता है तो उसका इलाज किया जाता है। बच्चों का हर माह वजन लिया जाता है। और दो माह में ऊंचाई नापी जाती है। बच्चों का स्वास्थ्य व पोषण चार्ट बनाया जाता है।

बच्चे का वजन लेती कार्यकर्ता

कार्यक्रम की पोषण सलाहकार सुधा कडव ने बताया कि पुष्पराजगढ़ क्षेत्र में 75 फुलवारी केन्द्र हैं। एक फुलवारी केन्द्र में 10 से 12 बच्चे होते हैं। उनकी देखभाल के लिए एक फुलवारी कार्यकर्ता ( कार्यकर्ता दीदी) नियुक्त की जाती है। अगर केन्द्र में  10-12 से ज्यादा बच्चे होते हैं तो दो कार्यकर्ता नियुक्त होती हैं। कार्यकर्ता चयन की प्रक्रिया गांव की सहमति और उनकी सहभागिता से होती है। इन कार्यकर्ताओं का हर माह प्रशिक्षण होता है। इसमें पोषण, स्वच्छता, बच्चों की देखभाल और बच्चों के समग्र विकास संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है। स्थानीय भाषा में खेल व गीत सिखाए जाते हैं, जिससे गतिविधियों के माध्यम से बच्चे कुछ सीख सकें।

फुलवारी कार्यकर्ता का प्रशिक्षण

वे आगे बताती हैं कि हर माह गांव में बच्चों के अभिभावकों के साथ बैठक होती है। इसमें साफ-सफाई, स्वच्छता और जंगल से मिलनेवाले ( गैर खेती भोजन) पौष्टिक फल, फूल, हरी पत्तीदार भाजियां, मशरूम, शहद इत्यादि के बारे में बताया जाता है। जैसे आम, आंवला, बेर, भिलवां इत्यादि जंगल से मिलते हैं, जिनमें पोषक तत्व होते हैं।

सुधा कड़व ने बतलाया कि हर फुलवारी केन्द्र में सब्जी बाड़ी ( किचन गार्डन) है। जिसमें कई तरह की सब्जियां, फल, फूल लगाए गए हैं। इसके अलावा, बच्चों के माता-पिता के साथ मशरूम उत्पादन का काम किया जा रहा है। किसानों को मडिया की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जिससे परिवार में बच्चों और महिलाओं के पोषण की जरूरतें पूरी हो सकें। इस साल 365 किसानों को मशरूम बीज वितरित किए गए हैं। और 167 किसानों के साथ मिलकर मडिया की खेती की गई है।

फुलवारी समन्वयक अनिश बताते हैं कि कोविड-19 के दौरान जब पहली लहर आई तब स्थिति काफी बिगड़ गई थी। आंगनबाड़ी केन्द्र बंद हो गए थे। ऐसे समय में फुलवारी केन्द्र चलते रहे। लेकिन इसका स्वरूप बदल दिया गया। बच्चों को केन्द्र में न लाकर उन्हें घर पर ही खिचड़ी दी गई। अंडे व आयरन सीरप भी दिया। इस दौरान 632 आंगनबाड़ी के बच्चों को भी इसका लाभ मिला। साथ ही 891 (गर्भवती महिलाओं, बुजुर्ग और जरूरतमंद) लोगों को सूखा राशन व स्वच्छता किट बांटी गई। बेलहाई टोला (दोना) गांव में सामूहिक रसोईघर भी चलाई गई, जिससे गांव के गरीब व असहाय लोगों को भोजन मिला। इस दौरान कोविड-19 के नियमों का सख्ती से पालन किया गया।

खेल गीत का कार्यकर्ता प्रशिक्षण

वे आगे बताते हैं कि हमने कोविड जागरूकता अभियान चलाया। लोगों को कोरोना से बचाव के तरीके बताए। जिसमें कोरोना के लक्षण, होम आइसोलेशन, होम क्वारंटाइन, थर्मामीटर एवं पल्स ऑक्सोमीटर का उपयोग और टीकाकरण के फायदे इत्यादि शामिल हैं। इसके अलावा, जन स्वास्थ्य सहयोग की टीम गांव- गांव  में जाकर फीवर क्लिनिक के माध्यम से कोविड नियमों को ध्यान में रखकर लोगों का इलाज कर रही है।

खरसौल गांव की फुलवारी कार्यकर्ता शांति बाई ने बताया कि सब्जी बाड़ी में पालक, मैथी, लाल भाजी, धनिया पत्ती लगाई है। इन हरी भाजियों की पत्तियों को दाल-चावल की खिचड़ी में डालकर पकाते हैं और बच्चों को खिलाते हैं। इसे पोषण आहार में शामिल किया जाता है।

पिपराह की फुलवारी की सब्जी बाड़ी

पयारी गांव की फुलवारी कार्यकर्ता कौशल्या बाई बताती हैं कि सब्जी बाड़ी में लौकी, भिंडी, कद्दू, करेला, भटा और मिर्ची लगाई है। अक्टूबर से फरवरी तक सब्जी बाड़ी से सब्जियां मिलती हैं। सब्जी बाड़ी में अलग से पानी की जरूरत नहीं होती। फुलवारी में बच्चों को जो हाथ धुलाने के लिए पानी इस्तेमाल होता है, उसी से सब्जी बाड़ी की सब्जियों की सिंचाई हो जाती है।

वे आगे बताती हैं कि हमने अपने खेतों में मडिया लगाया है और किसानों से भी लगवाया है। श्री पद्धति से मडिया की रोपाई की गई है। इस पद्धति से कम बीज लगता है और पानी की जरूरत भी कम पड़ती है। यह पौष्टिक अनाज की खेती पूरी तरह जैविक तरीके से होती है। खेत में गोबर खाद को डालते हैं और कीट लगने पर जैव कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं।

उपरीकला में ललिता बाई की मडिया की खेती 

कृषि कार्यक्रम के सलाहकार महेश शर्मा बतलाते हैं कि संस्था की ओर से देशी अनाजों, सब्जियों व मशरूम के बीज दिए जाते हैं। खेती करने के तौर-तरीके बताए जाते हैं। किसानों और फुलवारी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जाता है। संस्था ने गनियारी स्थित परिसर में पौष्टिक अनाज, देशी धान व कई तरह के परंपरागत अनाजों की खेती की है। देशी बीज बैंक बनाया है। किसानों के साथ मिलकर जैविक खेती को बढ़ावा दिया है, जिससे लोग बीमार पड़ने से पहले ही रोगों की रोकथाम कर सकें। इससे लुप्त हो रहे देशी बीजों का संरक्षण व संवर्धन भी हो रहा है। कुल मिलाकर, फुलवारी की सब्जी बाड़ी से कई फायदे सामने आ रहे हैं। विशेषकर, जब कोविड-19 के दौरान बाजार बंद थे, तब सब्जी बाड़ी से लोगों ने ताजी सब्जियां खाईं। बच्चों को भी पोषण मिलता रहा। फुलवारी की रसोई से महामारी में गर्भवती महिलाओं व जरूरतमंदों को भोजन मिला। सामूहिक रसोईघऱ से मजदूरों को भोजन मिला।  गांवों में सब्जी बाड़ी की कम होती परंपरा फिर से प्रचलन में आई। देसी बीजों का संरक्षण व संवर्धन हुआ। मशरूम उत्पादन जैसे नए कृषि कौशल को सीखने में दक्षता हासिल की। फुलवारी के काम से बच्चों को पोषण तो मिला ही, महिलाओं को भी रोजगार मिला। यह महिला सशक्तीकरण भी अच्छा उदाहरण है, जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।

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इसी फुलवारी कार्यक्रम पर लिखा गया और एक लेख पढ़िए बच्चों की फुलवारी

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Mali Sanjeeb December 13, 2021 at 10:26 pm

Very interesting Story

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