बच्चों की फुलवारी (in Hindi)

By बाबा मायाराम onDec. 12, 2018inHealth and Hygiene

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (SPECIALLY WRITTEN FOR VIKALP SANGAM)

(Phulvaaree)

छत्तीसगढ़ में बिलासपुर से 20 किलोमीटर दूर एक छोटे कस्बे गनियारी में है- जन स्वास्थ्य सहयोग। यह गैर सरकारी संस्था स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत है। इस संस्था के स्वास्थ्य के कार्यक्रमों की काफी चर्चा है और कुछ राज्यों में इसे अपनाया जा रहा है। ऐसा ही एक कार्यक्रम है फुलवारी। इसका मतलब है 3 साल तक के बच्चों का झूलाघर।

मुंगेली जिले का एक गांव है सारसडोल। यहां श्रवण और बुधोरिया अपनी छोटी बच्ची सोनिया के कारण काम पर नहीं जा पा रहे थे। लेकिन फुलवारी ने उनकी मुश्किल हल कर दी है।

वे उसमें अपने बच्ची को सुबह छोड़कर जाते हैं और काम से लौटकर उसे घर ले जाते हैं। यह वह साढे तीन साल की हो गई है। उसकी सेहत भी स्वस्थ और अच्छी है। वह अकेली नहीं है जो फुलवारी से खुश  है ऐसे इस इलाके के कई बच्चे हैं, जो इन झुलाघरनुमा फुलवारी में मजे कर रहे हैं।

सुराही गांव की कार्यकर्ता देवमती

छत्तीसगढ़ का बिलासपुर जिला बहुत पिछड़ा और गरीब है। यहां के लोग पलायन कर दूर-दूर तक काम करने के लिए जाते रहे हैं। बिलासपुरिया नाम से मशहूर इन लोगों को कड़ी मेहनत के बावजूद भी दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती। ऐसे कठिन समय में बच्चों की उचित देखभाल और आहार के प्रति ध्यान देना मुश्किल है। फुलवारी ( झूलाघर) से इसमें मदद मिल रही है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 3 के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 52.2 प्रतिशत बच्चों की उम्र के हिसाब से ऊंचाई कम है। 24.1 प्रतिशत बच्चो का ऊंचाई के हिसाब से वजन कम है। 47.8 प्रतिशत बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम है यानी कुपोषित हैं।

बिलासपुर जिले में कार्यरत जन स्वास्थ्य सहयोग के प्रमुख डा. योगेश जैन के अनुसार खासतौर से  6 माह से लेकर 3 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों का समुचित पोषण की बेहद जरूरत होती है।

उन्हें इस अवधि में स्वादिष्ट, गरम पतले और मुलायम भोजन के साथ उनका खास ध्यान रखने की भी जरूरत होती है। अगर इस अवधि में बच्चों को उचित पोषण नहीं मिला तो इसका असर उनके शारीरिक व मानसिक विकास पर जिंदगी भर पड़ता है।

नेवसा गांव की फुलवारी कार्यकर्ता बच्चों को संभालती हुई

गांवों में यह देखा गया है कि बच्चे किसी बुजुर्ग या बड़ी लड़कियों के सहारे छोड़कर उसके मां और बाप दोनों को काम करने के लिए भी बाहर जाना पड़ता है। इससे बड़े बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है।

इस सबके मद्देनजर जन स्वास्थ्य सहयोग ने वर्ष 2006 से फुलवारी नामक कार्यक्रम चलाया है जिसमें गांव के 6 माह से लेकर 3 साल तक के बच्चों को रखा जाता है। यह एक झूलाघर जैसा होता है जहां बच्चों का हर तरह से स्वस्थ रहने पर जोर दिया जाता है। जहां उन्हें पका पकाया खाना खिलाया जाता है।

फुलवारी में सत्तू दिन में एक बार और खिचड़ी दिन में दो बार खिलाई जाती है। इन्हें खाने में तेल की मात्रा ज्यादा दी जाती है क्योंकि तेल भी बच्चों के शारीरिक विकास में सहायक होता है। फुलवारी में हफ्ते में तीन बार अंडे भी दिए जाते हैं। इसके अलावा यहां बच्चों का हर महीने में वजन और हर छह माह में ऊंचाई नापी जाती है। इसके आधार पर बने चार्ट के अनुसार बच्चों के खान-पान पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

एक फुलवारी में 10 बच्चों के लिए एक महिला कार्यकर्ता होती है और 10 से ज्यादा बच्चे हुए तो दो महिला कार्यकर्ताओं की नियुक्ति होती है।

डंगनिया गांव की कार्यकर्ता बिगरी बाई

आयरन सीरप रोज देते हैं। छह महीने में कृमि मारने के लिए गोली भी दी जाती है। संक्रामक बीमारियां जो बच्चों को जल्द अपने घेरे में ले लेती हैं उनसे निपटने के लिए भी फुलवारी में जरूरी दवाओं की व्यवस्था रहती है। बीमार बच्चों की देखभाल और उपचार गांव में ही स्वास्थ्य कार्यकर्ता करती है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत खेलने के लिए खिलौने आदि की व्यवस्था सभी फुलवारियों में है।

इस कार्यक्रम को ग्रामीणों का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। इस कार्यक्रम के नतीजे बहुत अच्छे आ रहे हैं। जो इससे 6 माह से 3 वर्ष तक के बच्चों के पोषण व स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। स्तनपान के अलावा 6 माह से बड़े बच्चों को पोषण आहार मिल रहा है। बड़े बच्चे अपने छोटे भाई बहन को संभालते थे, अब वे स्कूल जा रहे हैं। बच्चे के मां-बाप को भी काम करने के लिए पर्याप्त समय मिल रहा है, जिससे वे घर की जरूरतें पूरी करने के लिए काम करे, कमाई कर सके।

पिछले एक दशक से यह कार्यक्रम बिलासपुर के कोटा विकासखंड और मुंगेली जिले के लोरमी विकासखंड में चल रहा है। वर्तमान में 44 गांवों में 92 फुलवारी चल रही हैं, जिनमें 1018 बच्चे हैं। ये सभी गांव घने जंगलों के बीच हैं, जिन्हें शहरों की तरह झूलाघर की सुविधा मिल रही है। इस कार्यक्रम से प्रभावित होकर छत्तीसगढ़ सरकार ने भी फुलवारी कार्यक्रम शुरू किया है, जो 13 जिलों में चल रहा है। कई और संस्थाओं ने भी इसे अपनाया है।

करपिहा गांव में बच्चों को खेल खिलाती कार्यकर्ता

छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओडिशा और बिहार राज्यों में इन फुलवारी कार्यक्रम का संचालन एक्शन अगेंस्ट मालनुट्रीशन (AAM) कार्यक्रम के तहत किया गया जिसमें 148 झूलाघर और 1552 बच्चे थे। इस कार्यक्रम के परिणाम कुपोषण की रोकथाम के तौर पर सकारात्मक थे.

पिछले साल अनुपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ ब्लाक में जिला खनिज प्रतिष्ठान मद अंतर्गत 75 फुलवारियों की स्थापना और संचालन किया जा रहा है. यह संचालन जन स्वास्थ्य सहयोग जिला प्रशासन के साथ मिलकर कर रहे हैं जिसका शुभारंभ एक कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया था।

करही कछार में बच्चे हाथ धोते हुए

कुल मिलाकर, यह कार्यक्रम बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और समग्र विकास की दृष्टि से बहुत उपयोगी है जिसकी कुपोषण रोकने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। साथ ही मजदूर और ग्रामीण तबके के लोगों को उनकी आजीविका चलाने व जीवन स्तर सुधारने में भी मददगार है।

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De priya Awasthi December 15, 2018 at 4:05 am

अच्छी रिपोर्ट। इस प्रयोग का और विस्तार होना चाहिए।

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