विश्राम देने से जी उठा जंगल (in Hindi)

By बाबा मायारामonFeb. 18, 2021in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (SPECIALLY WRITTEN FOR VIKALP SANGAM)

सभी फोटो – अशीष कोठारी

उत्तराखंड की हेंवलघाटी की गोद में बसा है जड़धार गांव। यहां अस्सी के दशक तक पहाड़ों की हरियाली कम हो चुकी थी। जंगल में गिने-चुने पेड़ ही बचे थे। चारा-पत्ती,पानी और ईंधन की कमी हो गई थी। इससे चिंतित होकर गांववालों ने पेड़ बचाने व नंगे वृक्षविहीन जंगल को हरा-भरा करने की ठानी और इसे कर दिखाया। कुछ ही सालों में जंगल जी उठा, पहाड़ों पर हरियाली लौट आई।

यह बदलाव की कहानी है उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के चम्बा विकासखंड में स्थित जड़धार गांव की। इसी इलाके में सत्तर के दशक में जंगल को बचाने का विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन हुआ था। यहां के अद्वाणी व सलेत के ग्रामीण जंगल को बचाने के लिए पेड़ों से चिपक गए थे। यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं था बल्कि अद्वाणी व सलेत के वनों को काटने से रोकने के लिए वास्तव में पेड़ों से चिपके थे। गांधीवादी सोच का यह अनूठा सत्याग्रह था। इस आंदोलन की चर्चा देश-दुनिया में हुई थी और यहां हरे पेड़ों के कटने पर रोक लग गई थी।

चिपको कार्यकर्ताओं का आधार है जड़धार जंगल

इस इलाके को हेंवलघाटी कहा जाता है। हेंवल नदी सिद्धपीठ सुरकंडा देवी की पहाड़ी से निकलकर आगे ऋषिकेश के समीप शिवपुरी में गंगा में विलीन हो जाती है। पहले इन पहाड़ियों में खूब बर्फ पड़ती थी, मई माह तक भी सुरकंड़ा की बर्फ नहीं पिघलती थी। एक जमाने में यह क्षेत्र बांज, बुरांस, मैरू, देवदार, रई, मुरेंडा आदि प्रजातियो के घने जंगल से ढका रहता था। लेकिन 60 के दशक में इस कुदरती जंगल पर संकट आया। 80 के दशक तक आते-आते पूरा पहाड़ ही नंगा हो गया,जैसे किसी व्यक्ति के सिर पर उस्तरा फेर दिया हो। क्षेत्र के लोगों ने जंगल काट डाले। इससे जैव विविधता का संकट तो हुआ ही, यहां से निकलने वाली नदियां भी सूखने लगीं। झरने व जलस्रोत भी जवाब देने लगे। इसी इलाके में शराब विरोधी आंदोलन व चूना पत्थर के खनन के खिलाफ आंदोलन चला था, जिसकी रजत जयंती पर 28 दिसंबर (2020) को बड़ा समारोह भी कटाल्डी गांव में हुआ। इस कार्यक्रम में चिपको आंदोलन के कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया।

सीढ़ीदार पहाड़ पर बसे गांव के जंगल को देखने मैं कुछ साल पहले गया था। इसी गांव के निवासी हैं विजय जड़धारी, जो चिपको आंदोलन के कार्यकर्ता रहे हैं। जब चिपको आंदोलन का दौर निकल गया, तो उन्होंने गांववासियों के साथ यहां के उजड़ चुके जंगल को फिर से हरा-भरा करने की पहल की। साथ ही बीज बचाओ आंदोलन शुरू किया। देसी बीजों की पारम्परिक खेती को बचाने के लिए मुहिम छेड़ी। उनका पारंपरिक खेती पद्धति बारहनाजा (मिश्रित खेती की पद्धति) का अनुभवजन्य ज्ञान व जानकारी उपयोगी है। उन्होंने अपने अनुभव व पारंपरिक ज्ञान के आधार पर कई किताबें लिखी हैं, जिनकी सराहना अकादमिक दुनिया में भी हुई है।

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर जंगल को मैंने देखा था। जंगल और पहाड़ को नजदीक से देखने का आनंद ही अलग होता है। ये हमें आज के भागमभाग और तनावपूर्ण माहौल में सदा आकर्षित करते हैं। जहां देश के अन्य इलाकों में जंगल कम हुए हैं, वहां उत्तराखंड इसका अपवाद कहा जा सकता है।

विजय जड़धारी बताते हैं कि टिहरी-गढ़वाल की चंबा-मसूरी पट्टी में पहले अच्छा और सुंदर जंगल था। इस गांव में भी था। पहाड़ के ढलानों से हरियाली की चादर हटने से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बना रहता था। यहां के कई सदाबहार जलस्रोत सूख गए थे, तब गांववाले चिंतित हो उठे। इकट्ठे होकर सोचने लगे, और वनों के जतन में जुट गए। जंगल बचाने की प्रेरणा चिपको आंदोलन की थी। 

वे आगे बताते हैं कि जड़धार गांव के लोगों ने मिलकर तय किया कि जंगल को बचाया जाए। इसके लिए एक वन सुरक्षा समिति बनाई गई। जंगल से किसी भी तरह के हरे पेड़, ठूंठ, यहां तक कि कंटीली हरी झाड़ियों को काटने पर रोक लगाई गई। कोई भी व्यक्ति यदि अवैध रूप से हरी टहनी या झाड़ी काटता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा, ऐसा तय किया गया।

कुछ समय के लिए पशु चरने पर भी रोक लगाई गई। कोई व्यक्ति वनों को किसी प्रकार नुकसान न पहुंचाए, यह सुनिश्चित किया गया। यह काम गांव की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया जिसमें जरूरत पड़ने पर थोड़ा बहुत फेरबदल किया जा सके। जंगल की रखवाली के लिए वन सुरक्षा समिति ने दो वनसेवक नियुक्त किए, जिन्हें गांववाले पैसे एकत्र कर कुछ आंशिक मानदेय देने लगे। जो पैसा जुर्माने से एकत्र होता उसे वनसेवकों को मानदेय के रूप में दे दिया जाता। हालांकि मानदेय की राशि कम थी, फिर भी वनसेवकों ने यह काम अपना समझकर किया।

वनसेवक रहे हुकुमसिंह बताते हैं कि जंगल की रखवाली के लिए हर महीने 300 रू मिलते थे। 20-22 साल तक जंगल की रखवाली करते रहे। पहले 3-4 फुट छोटे पौधे थे। रूखा-सूखा जंगल था।  बाद में 15 फीट ऊंचे पेड़ हो गए। जंगल में बांज, बुरांस, काफल, बमोरा, खाकसी के पेड़ बहुतायत में थे। बांज के पेड़ से चारा, पत्ती व खाद मिलती है। यह पेड़ मिट्टी को बांधने एवं जलस्रोतों की रक्षा का काम भी अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा करता है। इसका जंगल ही पानी का सदानीरा स्रोत हैं। गर्मी के मौसम में भी इसका ठंडा जल रहता है।

जड़धार गांव के निवासी व स्वतंत्र पत्रकार रघुभाई जड़धारी ने बताया कि हमने जंगल को 15 साल तक कुदरती तौर पर बढ़ने दिया गया। चौकीदार रखे, जंगल को विश्राम दिया, आग से जंगल को बचाया, जहां कहीं भी धुआं देखा वहां तुरंत पहुंच जाते और आग बुझाते। इसमें गांववालों की भी मदद लेते। आग बुझाने में गांववासी बहुत मेहनत और साहस का परिचय देते हुए आग पर काबू पाते। और इस तरह जंगल में हरियाली लौट आई। पटुडी, आराकोट में भी ऐसी पहल हुई, जंगलों को बचाने का एक माहौल बन गया।

विजय जड़धारी ने बताया कि हालांकि यहां वृक्षारोपण व पेड़ लगाने का काम भी प्रतीकात्मक हुआ है लेकिन वनों को फिर से हरा-भरा करने में महती भूमिका वनों को विश्राम (बंद वन) देने की है। यानी उन्हें उसी हाल में प्रकृति के हवाले छोड़ दिया जाए, जिसमें वह है। सिर्फ उनकी रखवाली की जाए और उसे पनपने दिया जाए, और बढ़ने, पल्लवित-पुष्पित होने दिया जाए। लोग जैसे अपने खेतों की देखभाल करते हैं उसी तरह जंगल की देखभाल करने लगे। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। दो-तीन सालों में ही सूखे जंगलों में फिर से हरियाली लौटने लगी।

घना जड़धार जंगल

वे आगे बताते हैं कि शंकुधारी वृक्ष चीड़, देवदार यदि कट गए तो इनमें दुबारा कल्ले (नई कोंपलें) नहीं आते हैं। जबकि बांज, बुरांस, काफल, अथांर, घिघारू, किनगोड़, खाकसी, बमोर घने होते हैं। और उनमें 1-2 साल में ही नए कल्ले आने शुरू हो गए। झाड़ियां आ गईं। जलाऊ लकड़ियां मिलने लगीं। इससे उत्साह बढ़ने लगा।

वन सुरक्षा समिति की समय-समय पर बैठकें होती थीं। कभी 3 महीने में, कभी 6 महीने मे बैठकों का दौर जारी रहा। बंद वन जागरूकता कार्यकम भी चलता रहा। 5-7 साल में जो जलस्रोत पूरी तरह सूख गए थे, उनमें पानी आ गया। वे कल-कल बहने लगे। इस गांव के आसपास दो दर्जन जलस्रोत हैं। नए पेड़ों ने पहाड़ को हरियाली से ढक दिया।

बांज, बुरास, काफल के पुराने ठूंठों पर फिर नई शाखाएं फूटने लगीं। अंयार, बंमोर, किनगोड हिंसर, साकिना, धौला, सिंस्यारू, खाकसी आदि पेड़-पौधे दिखाई देने लगे। और आज ये पेड़ लहलहा रहे हैं। बारिश को समाहित करने की शक्ति पेड़ों में होती है, इससे भूक्षरण व भूस्खलन भी कम हो गया। गाय भैंसों के नीचे बिछाने के लिए पत्ती व घास चारे व ईंधन की सुविधा हो, इसकी कोशिश की जाने लगी।

90 के दशक में यहां हरित हिमालय कार्यक्रम चला। इसे भारत सरकार व हिमालय ट्रस्ट ने संयुक्त तौर पर पायलेट प्रोजेक्ट की तरह चलाया। हमारे यहां हेंवलघाटी हरियाली कार्यक्रम के नाम से संचालित हुआ। इसके तहत् 2 साल तक वनसेवकों को मानदेय दिया गया। यह वर्ष 1991-92 की बात है। तब कश्मीर से कागजी अखरोट के बीज लाकर नर्सरी बनाई गई, अखरोट के पौधे लोगों को बांटे गए थे जो कई साल पूर्व से अब तक लोगों को अच्छी आमदनी दे रहे हैं।

पिछले चार दशक से हरियाली वापसी के इस काम का नतीजा यह है कि बुरांस, काफल के सघन जंगल प्रकृति अपने आप वापस ले आई। अब जंगल इतना घना हो गया है कि सूरज की रोशनी जमीन पर नहीं पहुंचती। जड़ी-बूटी, घास, लताएं, बेल फिर से आ गईं। काफल, बांज, बुरांस खूब हो गए। बुरांस के लाल फूल अलग ही छटा बिखेरते हैं। काफल का खट्टा-मीठा फल लोगों की पोषण सुरक्षा व रोग प्रतिरोधी शक्ति बढ़ाने का काम करता है।

सूखे पानी के जलस्रोत फिर फूट पड़े, सदानीरा हो गए। यहां के कुलेगाड, मूलपाणी, लुआरका पाणी, सांतीपुर पाणी, नागुपाणी, खुलियो गउ पाणी, रांता पाणी और द्वारछिलापाणी सहित 2 दर्जन जलस्रोत हैं। ये सदाबहार जलस्रोतों से ही साल भर गांवों को पीने का पानी मिलता है। चौड़ी पत्ती के जंगल बारिश के पानी का स्पंज हैं। वे पानी को सोखकर रखते हैं। जहां ऐसे जंगल होते हैं वहां जलस्रोत सदानीरा होते हैं। पानी छन छन, कल कल बहता रहता है। इसके अलावा, कई वन्य प्राणियों ने भी इस जंगल को अपना आशियाना बना लिया है। भालू, सेही, बघेरा, तेंदुआ, बारहसिंघा, हिरण, जंगली सुअर, बंदर आदि यहां प्रायः दिखते हैं। हिरणों की टोलियां बिचरती रहती हैं।

‘गोविंदबल्लभ पंत हिमालयी पर्यावरण व विकास संस्थान’ (श्रीनगर, गढ़वाल) के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में इसे पुनर्जीवित सर्वश्रेष्ठ जंगलों में बताया है। पुणे के पक्षी विशेषज्ञ डा. प्रकाश गोले ने यहां कुछ ही घंटों में पक्षियों की 95 प्रजातियों की गिनती की। जंगल बढ़ाने में यह सहायक हुए हैं। जड़धारी कहते हैं कि दूर-दूर से यह पक्षी बीज लाकर इस जंगल के अवैतनिक सेवक बन गए हैं।

ग्राम वन पंचायत यहां वन संरक्षण व वन प्रबंधन का काम करती हैं। उत्तराखंड में वन पंचायतों का इतिहास पुराना है। ब्रिटिश शासन से वन पंचायतें थीं। विजय जड़धारी बताते हैं कि वन पंचायत स्वशासन का एक उदाहरण हैं। आसपास के जंगलों का रखरखाव करती हैं। यह लगभग 1927 के आसपास बनीं। जड़धार में हाल ही में 1998 में वन पंचायत बनी। जड़धार में भी वन पंचायत है, इसका जंगल में दखल बढ़ा है, पर इसे हावी नहीं होने दिया है। अब इन्हें नए सिरे से मान्यता मिली है, और सक्रिय हैं। वर्तमान में जड़धार वन पंचायत के सरपंच राजेन्द्र नेगी हैं।

राजेन्द्र नेगी ने बताया कि वे वर्ष 2017 से सरपंच हैं और इस बीच उन्होंने कई काम करवाए हैं। सरकार की जायका परियोजना के अंतर्गत पौधारोपण व आजीविका सुरक्षा की है। इसके तहत् वृक्षारोपण किया गया। इसकी तार फेसिंग करवाई है, जिससे कुछ हद तक जंगली जानवर, खासकर सुअर से फसलों की सुरक्षा हुई है।

स्थानीय प्रजातियों के पौधों का रोपण करवाया गया है। जल संचयन हो इसके लिए जंगल में छोटी चाल-खाल (तालाब) बनाई गईं। कुल 9 चाल बनाई गई हैं। यह भी जल भंडारण का  परंपरागत तरीका है। इनमें से 3 चाल में बारह महीने पानी रहता है। इससे भूजल स्तर बढ़ता है और जलस्रोत भी सदानीरा होते हैं। जंगली जानवरों को पीने का पानी भी मिलता है। गांव के पालतू मवेशी भी पानी पीते हैं।

हाल में चमोली जनपद में ग्लेशियर टूटने से हुई तबाही पर विजय जड़धारी ने कहा कि यह  मानव निर्मित है। इस घटना में अब तक 31 लोग मारे जा चुके हैं, और कई के लापता होने की खबर है। उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले केदारनाथ की घटना से कोई सबक नहीं लिया गया। ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट व धौली गंगा पावर प्रोजेक्ट के लिए सुरंग खोदी गई। अब कंपनियां ग्लेशियर फटने को दोष दे रही हैं।

उन्होंने कहा कि यह सही है कि जलवायु बदलाव व मौसम परिवर्तन के कारण बादल फटने, ग्लेशियर टूटने, सूखा पड़ने और अतिवृष्टि होने की घटनाएं होंगी पर होनेवाली तबाही को रोका जा सकता है। हमें नदियों को बांधने की बजाय नदियों व गाड-गदेरों को खुला रखना होगा और हिमालय के साथ हो रही छेड़छाड़ को बंद करना होगा।

उन्होंने इसका एक उदाहरण देते हुए बताया कि कुछ साल पहले जड़धार गांव के जंगल में पहाड़ की चोटी पर बादल फटने की बड़ी घटना हुई थी पर उसका असर गांव तक नहीं पहुंचा। जंगल में ही मलवा व पानी जज्ब हो गया। इस तरह हरे-भरे जंगलों से ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से होनेवाली हानि को रोका जा सकता है।

खेती और पशुपालन के लिए महत्वपूर्ण है जंगल

कुल मिलाकर, वर्ष 1980 के बाद से गांव चारा-पत्ती, जलाऊ ईंधन व पानी के मामले में यह गांव आत्मनिर्भर है। उसे किसी से पूछने की जरूरत नहीं है। जब भी हल, जुआ, लाट जैसे खेती के औजारों के लिए लकड़ी की जरूरत होती है, सब लोग जंगल मिलकर जाते हैं और लकड़ी ले आते हैं। चौड़ी पत्तियां पशुओं के नीचे बिछावन के काम भी आती हैं। गोमूत्र-गोबर आदि सड़कर जैव खाद बनाते हैं, जो बहुत उपजाऊ होती है। बांज की पत्तियां मवेशी खाते हैं, वह चारे का काम भी करती हैं। ईंधन के लिए भी अच्छी होती हैं। जलवायु बदलाव के इस दौर में जंगल को फिर से पुनर्जीवन प्रदान करना महत्वपूर्ण है। इस इलाके में कुड़ी व पिपलेत गांवों में वन संरक्षण किया जा चुका है। इस पूरे काम से यह निष्कर्ष निकलता है कि गांवों की आपसी समझ, एकता वनों के विश्राम और मेहनत से उजड़ रहे वनों को नया जीवनदान मिल सकता है। प्राकृतिक संसाधनों में कमी, जलस्रोतों का सूखना, भूक्षरण, भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। पर्यावरण का संकट बढ़ रहा है। ऐसे दौर में जड़धार के जंगल ने नया रास्ता दिखाया है। यह गांव अब पारिस्थितिकीय वापसी का भी अनुपम उदाहरण है। हाल ही के हादसे के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि जड़धार जैसे जंगल ऐसे हादसों को कुछ हद तक रोकने में सक्षम हैं, जैसा कि बादल फटने से जड़धार गांव में कोई नुकसान नहीं हुआ था। कुल मिलाकर, यह सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।

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Sunil Lahri March 13, 2021 at 10:51 am

आपके द्वारा बहुत ही अच्छे तरीके से कहानी लिखी गई है |मेरी राय व विचार है कि समुदाय के सभी तरह के विशिष्ट लोगों के विचार मय नाम/पिता का नाम व पद सहित हो तो कहानी में बहुत अधिक जान आ जाती है| बातचीत करते हुए कुछ फोटो भी अच्छे रहते है,कुछ पूर्व के भी फोटो होते तो पता चलता कि पहले की क्या स्थति थी |

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