नया सांचा, पुराना ढ़ांचा? (in Hindi)

By अनुवाद: पल्लवी प्रिया, भावना बिष्टonSep. 08, 2021in Food and Water

विकल्प संगम के लिये अनुवादित किया गया विशेष लेख  (SPECIALLY TRANSLATED FOR VIKALP SANGAM)

भारत में जैविक कृषि का विकास किसानों की ‘डीस्किलिंग’ करके उन्हें किस प्रकार नुकसान पहुँचा रहा है, एक नज़र।

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प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन (प्रदान) बड़े पैमाने पर गाँव की आजीविका संवर्धन के लिये देश के 7 राज्यों में कार्यरत है। हम जानते हैं कि हमारे  द्वारा किये जा रहे लगातार प्रयासों की वजह से आज देश के सभी छोटे-बड़े किसान काफ़ी तेज़ी से जैविक खेती से रूबरू हो रहे हैं। वे स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से तैयार किए गए जैविक उर्वरकों, कवकनाशकों/फफूंदनाशकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। सरकारी कृषि विभागों या गैर-लाभकारी संस्थाओं के कृषि विस्तार कर्मी (extension workers), लगातार गाँव का दौरा कर गांव वालों को जैविक खेती के इस्तेमाल पर प्रशिक्षित कर उन्हें इसके उपयोग को लेकर प्रोत्साहित करते हैं।


हालाँकि, आज से 20-30 साल पहले यह स्थिति नहीं थी। उस समय यही कृषि विस्तार कर्मी (extension workers) हर गांव में जाकर, लोगों खेती के लिए रसायनों का उपयोग करवा कर ऐसी कृषि पद्धति अपनाने के लिए प्रेरित करते थे जिनसे उनकी फसलों की उपज बढ़े। उस वक़्त खेतों की उपज बढ़ाना मुख्य उद्देश्य था। अतः पारम्परिक तरीकों को पिछड़ा हुआ माना जाता था। हरित क्रांति (Green Revolution) के काल ने यही तो सिखाया था, कि स्थानीय रूप से उपलब्ध खेती के तौर-तरीके कतई वैज्ञानिक नहीं है। इसीलिए अच्छी पैदावार के लिए वैज्ञानिक खेती के तरफ़ रुख करना ज़रूरी था। इसलिए वैज्ञानिक खेती पर कृषि-प्रशिक्षकों का ख़ासा ज़ोर रहा।


हम देख रहे हैं कि आज के समय में किसानों को बताए जा रही कृषि संबंधी चीज़ें (खाद, कीटनाशक इत्यादि) और कृषि के तरीके कुछ दशकों पहले बताए जा रहे तरीकों से काफ़ी अलग हैं। आज सुझाए जा रहे तरीके और चीज़ें रसायनिक नहीं बल्कि जैविक हैं। हालांकि, आज भी उनकी सोच वही है जो कुछ दशकों पहले थी। किसानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे खेती के लिए अपने पारंपरिक ज्ञान और कौशल का इस्तेमाल करने के बजाय बाहरी लोगों (बाहरी सरकारी और गैर-सरकारी संस्था के लोगों) द्वारा बताए जा रहे तरीकों का इस्तेमाल करें। यह भारत के जैविक कृषि क्षेत्र में एक बढ़ती हुई समस्या है|

भारतीय किसानों की ‘डीस्किलिंग’ 

1974 में, अपनी पुस्तक ‘लेबर एंड मोनोपॉली कैपिटल’ (Labor and Monopoly Capital) में, अमेरिकी राजनैतिक अर्थशास्त्री हैरी ब्रेवरमैन (Harry Braverman) ने यह तर्क दिया है कि पूंजीवाद में पहले की तुलना में कम कौशल स्तरों पर नौकरियों को पुनः संगठित करने की व्यापक प्रवृत्ति है। उनके अनुसार श्रम/शारीरिक बल को बुद्धिमत्ता/ज्ञान से अलग करने से शासक वर्ग के लोगों को दोनों पर हावी होने में मदद मिलती है। इसी प्रक्रिया को ‘डीस्किलिंग’ कहा जाता है।

भारतीय कृषि में भी हम ‘डीस्किलिंग’ की प्रक्रिया तेजी से बढ़ते हुए देख रहे हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसान, मात्र एक श्रमिक बन कर रह जाते हैं।

खासकर ऐसे किसान, जो बीज या कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों, डीलरों द्वारा सुझाई गई या बीजों, खाद या कीटनाशकों जैसी कृषि सामग्री के पैकेट के पीछे लिखी तकनीकों पर आँख बंद करके भरोसा कर उनका इस्तेमाल करने लगते हैं।

हमने देखा है कि किसान बीज, खाद या कीटनाशकों जैसी कृषि सामग्री अपने अनुभवों के आधार पर नहीं बल्कि कही-सुनी बातों या प्रचार-प्रसार के द्वारा फैलाए गई जानकारी को ध्यान में रखते हुए खरीदते हैं। हम देख रहे हैं कि खेती के समय भी किसान पारिस्थितिकी, मृदा उर्वरता प्रबंधन, कीट प्रबंधन, या बीज संरक्षण संबंधी अपने ज्ञान का इस्तेमाल नहीं करते, जिसका इस्तेमाल वे करीब आधी सदी पहले किया करते थे।

समय के साथ-साथ खेती का ज्ञान बड़ी-बड़ी शोध करने वाली संस्थाओं और खाद एवं बीज कंपनियों के पास चला गया है। ख़ासकर 1960 की हरित क्रांति के बाद, जिसमें खेती के लिए हाइब्रिड बीज, रासायनिक खाद और अन्य नई तकीनीकों से उपज बढ़ाने के लिए बढ़ावा दिया गया था। ऐसा इसीलिए हो रहा है क्योंकि, नई तकनीकों में इस्तेमाल होने वाला सामान (रासायनिक खाद, बीज, कीटनाशक इत्यादि) केवल बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा बनाया और बेचा जाता है। इसके परिणामस्वरूप, अब आधुनिक खेती मानकीकृत हो गई है। यहाँ तक की जैविक खेती, जिसे रासायनिक खेती के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, किसानों के लिए जैविक खेती का इस्तेमाल करने के लिए पीओपी/POP (कार्यप्रणालियों का संकुल) बनाया जा रहा है। ऐसा करना, भारतीय किसानों की ‘डीस्किलिंग’ को बढ़ावा दे रहा है।

इतिहास

हरित क्रांति के बाद, भारतीय कृषि में बदलाव आया। कृषि के इस रूप ने जहाँ कुछ फ़सलों की पैदावार को काफ़ी हद तक बढ़ा दिया, वहीं इससे कई और गंभीर समस्याओं का जन्म भी हुआ। उनमें से एक समस्या ऐसी थी जिसने लोगों के जीवन को बहुत ज़्यादा प्रभावित किया। इस तरीके से खेती करने की वज़ह से वातावरण को बहुत नुकसान पंहुचा। ‘ग्रीन रेवोल्यूशन इन इंडिया: एनवायर्नमेंटल डीग्रेडेशन एंड इम्पैक्ट ऑन लाइवस्टॉक’ (‘Green Revolution in India: Environmental Degradation and Impact on Livestock’) नामक एक अध्ययन के में लेखक ने बताया है कि, किस तरह इस क्रांति के आने से मिट्टी की उर्वरता में कमी आई; खेती में इस्तेमाल होने वाली रासायनिक खाद के ज़हरीले रासायनिक अवशेष किस तरह इंसान और जानवरों के खाने में धीरे-धीरे प्रवेश कर रहे हैं; और मुख्यतः केवल तीन से चार फसलें (धान, गेहूँ और मक्का) उगाने की वजह से हमने अपनी फ़सल विविधता भी खो दी है।

photo credit : unsplash

हरित क्रांति के लगभग 25 साल बाद ही, 1987 में ‘आवर कॉमन फ्यूचर’ शीर्षक के साथ ब्रुन्डलैंड रिपोर्ट (Brundtland Report, titled ‘Our Common Future’), के प्रकाशन के साथ ही सतत विकास की सोच चर्चा में आने लगी। संयुक्त राष्ट्र के लिए कई देशों द्वारा निर्मित इस रिपोर्ट ने पर्यावरण की परेशानियों को राजनैतिक मुद्दों के बीच दृढ़ता के साथ रखा और पर्यावरण एवं विकास के मुद्दे को एक ही मुद्दे के रूप में देखने का प्रस्ताव दिया। धीरे-धीरे, लोग जैविक कृषि पद्धति को पारंपरिक कृषि पद्धति के वैकल्पिक रूप में देखने लगे, क्योंकि इससे पर्यावरणीय समस्याओं से संबंधित मुद्दों का ध्यान रखा जा सकता है। जैविक खेती का मतलब था – मिट्टी की उर्वरता की रक्षा करना, मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों के स्तर को बनाए रखना, रसायनों के बजाय सूक्ष्मजीवी कार्यवाही (microbial action) के माध्यम से मिट्टी को पोषक तत्व प्रदान करना और मिट्टी की नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए खेतों में फलियाँ उगाना, जैविक पदार्थ जैसे फ़सल अवशेषों और मवेशियों के गोबर को खाद के रूप में फिर से इस्तेमाल करने के लायक बनाना, प्राकृतिक शिकारियों (जैसे सांप, केंचुए इत्यादि) की मदद से बीमारियों और कीटों का प्रबंधन करना और, अन्य चीज़ों के बीच विविधता बनाए रखना।

आज भारत, पूरी दुनिया के जैविक पदार्थों के लगभग 30% का अकेला उत्पादक है। इनमें से ज़्यादातर छोटे और सीमांत किसान हैं, जो किसी न किसी रूप में हरित क्रांति की वज़ह से ‘डीस्किलिंग’ के शिकार हूए हैं। जैविक या प्राकृतिक खेती की सोच पर्यावरण पर आधारित है।

लेकिन, अगर इसका प्रचार-प्रसार और ढ़ांचा पारंपरिक खेती की तरह ही बनाया गया तो यह भी रासायनिक खेती की तरह ही ‘डीस्किलिंग’ को बढ़ावा देना जारी रखेगा।

हम देखते हैं कि आज जैविक खेती के लिए सरकारी या गैर-सरकारी एजेंसियाँ ऐसे मानक उत्पादों और तरीकों के इस्तेमाल का सुझाव दे रही हैं, जिनका किसानों द्वारा पालन करने की उम्मीद की जाती है। यह उत्पाद पारंपरिक खेती में इस्तेमाल किये जाने वाली चीज़ों से अलग ज़रूर हो सकते हैं लेकिन इन्हें इस्तेमाल करने की विधि वही होती है जो पारंपरिक खेती में इस्तेमाल की जाती है। यह किसानों को उनकी प्रकृति की समझ का इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देती। न ही यह उन्हें दोनों तकनीकों (पारम्परिक और आधुनिक) के साथ खेती को बेहतर बनाने के लिए अपनी समझ का उपयोग करने में सक्षम बनाता है|

अनुकूली कौशल

हमें एक वैकल्पिक दृष्टिकोण की ज़रुरत है। एक वह जो किसानों को फिर से कुशल बनाए और उन्हें मिट्टी की उर्वरता का प्रबंधन, मिट्टी में नमी का संरक्षण और पोषक चक्र के सिद्धांतों को फिर से समझने और इस्तेमाल करने में सक्षम कर सके। दूसरा वह जो हमें स्थानीय रूप से उपलब्ध चीज़ों का प्रयोग करने की अनुमति दे, ताकि हम उन चीज़ों से होने वाले लाभ या हानि को अच्छी तरह समझकर कर केवल उन चीज़ों का उपयोग करें जो हमारे प्रयोगानुसार सबसे अच्छी थीं।

झारखण्ड के गाँव, जना में प्रदान के शोधकर्ता और अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के अध्यापकों के साथ मिलकर पिछले 3 साल से यही शोध करने में लगे हुए हैं। वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध चीज़ों से बने कई तरह के जैविक उर्वरकों, कीटनाशकों और मल्चिंग सामग्रियों का इस्तेमाल कर के देख रहे हैं। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, मिट्टी की नमी बनाए रखने और कीट प्रबंधन के लिए इस्तेमाल की जा रही सामग्रियाँ बनाने के लिए इन्होंने कई सारी किताबों, लेखों, किसानों के पिछले अनुभवों और हर यह सामग्री बनाने के लिए इस्तेमाल हो रही हर चीज़ पर चर्चाओं सहारा लिया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के अध्यापकों या प्रदान कर्मियों के विचारों को किसानों ने अपने वास्तविक ज्ञान के आधार पर कई बार चुनौती दी। उदाहरण के लिए, किसानों ने मल्चिंग के लिए बांस के पत्तों के इस्तेमाल को यह कह कर नकार दिया कि उनके इलाके में मिलने वाले बांस के पत्ते ज़हरीले होते हैं। वे पत्ते इतने ज़हरीले होते हैं कि उन पत्तों के संपर्क में आने वाले सभी पेड़ मर जाते हैं। इसी तरह, उन्होंने मल्चिंग के लिए “टेफ्रोसिया” पौधों का उपयोग करने का विरोध किया क्योंकि इसका इस्तेमाल करने से मछलियाँ मर जाती हैं।

जना के ग्राम स्तर के शोधकर्ताओं ने गांव के लिए उपयुक्त जैविक उर्वरकों, कीटनाशकों और मल्चिंग की सामग्री का चयन और उनकी जाँच करने के लिए सात तरह अलग-अलग तरीकों से उनका प्रशिक्षण किया। इस प्रक्रिया में एपीयू और प्रदान ने उन्हें प्रकृति के काम करने का ढ़ंग और पर्यावरण पर बिना किसी दुष्प्रभाव के उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है, यह समझने में उनकी मदद की। आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रिया इस प्रक्रिया से थोड़ी अलग है: शिवानी खाद या बीजामृत जैसे जैविक पदार्थों का इस्तेमाल करने का सुझाव देना और गांव वालों को इनका उपयोग करने के लिए कहना।

यह शोध यह देखने के लिए किया जा रहा है कि ‘क्या किसानों द्वारा अपने ज्ञान और कौशल के आधार पर खेती की सामग्री और तरीके चुनने से फ़सल उत्पादन में लम्बे समय के लिए बढ़ोतरी हो पाएगी?’ गांव वालों के साथ अब तक का हमारा यह शोध काफ़ी उत्साहवर्धक रहा है। इससे यह पता चलता है कि इस शोध के आधार पर की जाने वाली प्रक्रिया को उन सभी जगहों पर इस्तेमाल किया जा सकता है, जहाँ एजेंसियाँ जैविक खेती को बढ़ावा दे रही हैं।

यह अनुकूली या प्रयोग-आधारित ‘स्किलिंग’ का तरीका किसानों को खेती के संबंध में सोच कर निर्णय लेने और ‘डीस्किलिंग’ में धीरे-धीरे बदलाव करने में मदद करेगा। लोग अब खेती में खुद के पारम्परिक ज्ञान का भी इस्तेमाल करेंगे और बाहरी ज्ञान पर भी सोच-विचार करेंगे, न की पहले की तरह बाहरी लोगों पर आश्रित रहेंगे। यह पारिस्थितिक रूप से संधारणीय खेती के संदर्भ-विशिष्ट समाधान का एक अच्छा ज़रिया हो सकता है। यह पारंपरिक और जैविक खेती में मौजूद ‘डीस्किलिंग’ को खत्म करने का एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

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