सतपुड़ा की घाटी में हरियाली (in Hindi)

By बाबा मायारामonJan. 16, 2022in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially written for Vikalp Sangam)

सभी फोटो – राजेन्द्र गढ़वाल

मध्यप्रेदश की सतपुड़ा घाटी में आदिवासियों की हरियाली बढ़ाने की पहल अब रंग लाने लगी है। यहां फलदार पेड़ लगाने और सब्जियों की खेती से न केवल उन्हें फल, फूल और हरी पत्तीदार सब्जियां खाने को मिल रही हैं, बल्कि इन्हें बेचकर कमाई भी हो रही है। महामारी के दौरान रोजगार भी मिला और इससे कुछ हद तक पलायन भी रूका है।

इस इलाके में श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जनपरिषद लगभग 15 वर्षों से पेड़ लगाने की मुहिम चला रहा है। बैतूल, हरदा और खंडवा जिले में आदिवासी न केवल खुद पेड़ लगा रहे हैं, बल्कि हरियाली यात्रा निकालकर दूसरे लोगों को भी प्रेरित कर रहे हैं।

बंजारीढाल में हरियाली यात्रा

इस साल हरियाली यात्रा बैतूल जिले के बंजारीढाल गांव से शुरू हुई थी। इसे देखने व समझने मैं भी गया था। 9 अगस्त (2021) को बंजारीढाल में बड़ी संख्या में स्री-पुरुषों ने रैली निकाली थी। वे हाथों में हरे पौधे रखे हुए थे और नारे लगा रहे थे – हरियाली बढाएंगे, भुखमरी मिटाएंगे। वे ढोल मंजीरों और टिमकी के साथ नाचते-गाते बंजारीढाल के गांधी स्मारक तक पहुंचे थे। इसके अलावा, यह यात्रा 12 को शाहपुर, 17 को चिचौली, 19 को कटंगी ( घोड़ाडोंगरी) होते हुए 28 अगस्त को बीजादेही में समाप्त हुई थी।

मरकाढाना में पौधारोपण की तैयारी

मरकाढाना गांव के सुमरलाल सेलूकर व अनीता बतलाते हैं कि जंगल ही उनका घर और जंगल ही ससुराल है। उनके आजा-पुरखों ने पेड़, पहाड़ और नदी-नालों को देव माना है। उनका जीवन जल-जंगल-जमीन से जुड़ा है। वनोपज से जिंदगी चलती है और भरण-पोषण होता है। पहले जंगल, आम, आंवला, महुआ, जामुन, बील, हर्रा और अन्य फलदार व छायादार पेडों से भरा था। उससे फल खाने को मिलते थे। लेकिन अब जंगल कम हो गया है। इसलिए पेड़ लगा रहे हैं।

श्रमिक आदिवासी संगठन के राजेन्द्र गढ़वाल बताते हैं कि पेड़ लगाने की पहल कई दृष्टियों से उपयोगी है। इससे हरियाली बढ़ेगी, फल खाने को मिलेंगे, कुपोषण-भुखमरी मिटेगी, गांव में रोजगार मिलेगा, पलायन रूकेगा, जैव-विविधता और पर्यावरण का संरक्षण होगा।

वे गांधीजी का प्रसिद्ध कथन याद दिलाते हैं कि प्रकृति हर व्यक्ति की जरूरत तो पूरी कर सकती है, मगर एक भी व्यक्ति का लालच नहीं। आदिवासी प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितनी उनको जरूरत है। इसलिए हम प्रकृति का संरक्षण भी कर रहे हैं और उसका संवर्धन भी। अब तक 50 हजार से ऊपर फलदार पौधे जंगलों में लगाए गए हैं। और यह सिलसिला लगातार जारी है।

बीजों का संग्रहण व पौधे

उन्होंने बताया कि हरियाली की मुहिम को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है। सबसे पहले गर्मी में पेड़ों के बीजों का संकलन किया जाता है। कुछ बीज जंगलों से एकत्रित किए जाते हैं, कुछ खरीदे जाते हैं और कुछ लोग उनके घरों में व आसपास इकट्ठे करते हैं। जो बीज खरीदे जाते हैं, उनके लिए चंदा एकत्र किया जाता है। इसके बाद इन बीजों से नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके लिए मरकाढाना, कटंगी, बोड़, पीपलबर्रा, कोचामऊ और शाहपुर में नर्सरी बनाई गई हैं।

इसके बाद खेतों की मेड़ों पर, घर के बाड़े में, और गांव के आसपास खाली पड़ी जमीन पर पौधों को रोपा जाता है। उनकी लगातार देखभाल की जाती है। इसके परिणामस्वरुप, आज मरकाढाना में कई तरह के हरे-भरे पेड़ हैं, फल देने लगे हैं। इसी प्रकार, दानवाखेड़ा, भंडारपानी, कुसमेरी,बोड़, पीपलबर्रा, उमरडोह, मालीखेड़ी और खापा में भी अच्छे बाग-बगीचे हो गए हैं।   

राजेन्द्र गढ़वाल बतलाते हैं कि पहले हम फलदार पेड़ लगाने की मुहिम चलाते थे, लेकिन महामारी में संगठन ने सब्जियों की खेती को प्रोत्साहन दिया। इसके लिए 7 हजार रूपए का सब्जियों का बीज खरीदा और संगठन के कार्यकर्ताओं ने टीम बनाकर गांवों में बांटा।

वे बताते हैं कि बैतूल जिले के घोड़ाडोंगरी, शाहपुर और चिचौली प्रखंड के करीब 50 गांवों में आदिवासियों ने सब्जियों की खेती की। सब्जी बाड़ी में सब्जियां अच्छी हुईं, लोगों ने खुद खाईं, पड़ोसियों को बांटी और अतिरिक्त होने पर बेचकर कमाई की।  

खापा गांव की सनोती परते ने बतलाया कि उन्हें संगठन ने सब्जियों की बीज दिए थे। इनसे भटा, टमाटर, बरबटी, बल्लर (सेमी), पालक, धनिया इत्यादि की खेती की। महामारी के दौरान हमें ताजी हरी सब्जियां खाने को मिली और हमने बेची भी, जिससे आमदनी हुई।

चिमड़ी गांव के हरलाल उइके बताते हैं कि पिछले साल भिंडी और गिलकी खूब बेची। गांव में और भौंरा (कस्बा) के शुक्रवार बाजार में सब्जियां बेची, जिससे अच्छी आमदनी हुई।

आमढाना के खेमचंद का सब्जी खेत

आमढाना के रमेश सेलूकर और खेमचंद बताते हैं कि पहले उन्हें मजदूरी करने जाना पड़ता था, पलायन करना पड़ता था, अब सब्जी के धंधे से उनकी आजीविका चलती है। वे रोज साइकिल पर सब्जियां फेरी लगाकर बेचते हैं। उन्होंने उनके खेत में फलदार पेड़ भी लगाए हैं।

राजेन्द्र गढ़वाल बताते हैं महामारी के दौरान जब पहली तालाबंदी हुई थी, तब सतपुड़ा अंचल में आदिवासियों को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। अंचल के जो प्रवासी मजदूर बाहर राज्यों में मजदूरी करने गए थे, वे भी मुसीबत में फंस गए थे। यहां के मजदूर तमिलनाडु, बेंगलुरू और दिल्ली जैसे कई राज्यों में काम करने जाते हैं, संगठन ने उनकी मदद की। श्रमिक आदिवासी संगठन के अनुराग मोदी ने इन राज्यों के प्रशासन से संपर्क किया। उनके खाने-पीने की व्यवस्था से लेकर घर तक पहुंचाने में सहयोग किया।

राजेन्द्र गढ़वाल ने बताया कि तालाबंदी के दौरान सरकार ने 5 किलो मुफ्त राशन देने की घोषणा की थी। लेकिन कई दूरदराज गांवों तक ऱाशन नहीं पहुंचा था। श्रमिक आदिवासी संगठन ने जब यह मांग उठाई तब तत्काल ऐसे गांवों तक राशन पहुंचाया गया। इन गांवों में शाहपुर विकासखंड के भंडारपानी, दानवाखेड़ा, मालीखेड़ा गांव शामिल थे।

इसके अलावा, तालाबंदी की वजह से आदिवासी वनोपज संग्रह करने जंगल भी नहीं जा पा रहे थे। लेकिन बाद में इसमें छूट दी गई। महुआ बीनने के लिए आदिवासी समूह में नहीं, बल्कि एक-दो लोग मिलकर गए, महुआ बिनाई की और उसे बेचकर कुछ कमाई की। इसी प्रकार, वनोपज में शहद, गोंद, अचार (चिरौंजी), आंवला, बील, आम भी एकत्र किया और बेचा।

कोविड-19 के बारे में जन जागरूकता अभियान चलाया। गांवों में जरूरतमंदों को कपड़े और राशन की व्यवस्था भी की। इसमें शाहपुर के सार्वजनिक विकास मंच ने भी मदद की। प्रवासी मजदूरों को बाहरी राज्यों से लाने से लेकर उनको गांव-घर तक पहुंचाने में मदद की।

कुल मिलाकर, श्रमिक आदिवासी संगठन व समाजवादी जनपरिषद की हरियाली बढ़ाने और सब्जी खेती की पहल हर दृष्टि से उपयोगी है। इससे न केवल आदिवासियों की खाद्य सुरक्षा हो रही है, बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ी है। महामारी में इससे काफी सहारा भी मिला है, इससे लोगों को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है। इससे हरियाली बढ़ी है, जैव विविधता और पर्यावरण का संरक्षण व संवर्धन हुआ है। अब यह इलाके में इसका विस्तार भी हुआ है। जलवायु बदलाव के दौर में हरियाली का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पहल सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।

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