झारखंडी आदिवासियों का महामारी से सामना (in Hindi)

By बाबा मायारामonSep. 01, 2021in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially written for Vikalp Sangam)

“मैं अब ठीक हूं और धान रोपाई के काम में लगी हूं। जब से एकजुट संस्था ने गांव में सुखू-दुखू बैठकी शुरू की है, तब से उसमें लगातार जाती हूं, इलाज करवा रही हूं, रोज दवा ले रही हूं। अगर यह संस्था पहले आई होती तो मेरे पिता भी लापता नहीं होते। वे भी मानसिक स्वास्थ्य के मरीज थे, जो 7-8 साल पहले घर से चले गए।” यह झारखंड के खूंटपानी प्रखंड के बींज गांव की कलावती थीं, जो मानसिक स्वास्थ्य की मरीज हैं।

झारखंड का अर्थ झाड़खंड यानी वन प्रदेश है। इस राज्य की भौगोलिक बनावट सीढ़ीनुमा है। इसमें पश्चिम सिंहभूम जिला दक्षिण में स्थित है। यह जिला पहाड़ी घाटी और हरे-भरे घने जंगलों से आच्छादित है। यहां सारंडा का प्रसिद्ध साल वन है, जहां जड़ी-बूटियों का भंडार है। यहां सदानीरा नदियां व झरने हैं। इस इलाके की अधिकांश आबादी आदिवासियों की है, जिनमें हो आदिवासी प्रमुख हैं। इस इलाके की आजीविका कृषि और वनोपज पर आधारित है। जंगल से जलाऊ लकड़ी, चारा, फूल, फल, हरी पत्तीदार सब्जियां, जंगली मशरूम, दातौन जैसी दैनंदिन चीजें मिलती हैं। सिंचाई के अभाव के कारण एक ही फसल होती है। इसलिए साल के कुछ महीने यहां से लोग रोजगार के लिए पलायन करते हैं, यह सिलसिला बरसों से चलता आ रहा है।

पश्चिम सिंहभूम जिले में एकजुट संस्था कार्यरत है। झारखंड व ओडिशा के कुछ जिलों में इसका कार्यक्षेत्र है। यह वर्ष 2002 से स्वास्थ्य, शिक्षा और टिकाऊ आजीविका के क्षेत्र में काम करती है। गर्भवती महिलाओं की देखभाल, सुरक्षित प्रसव, नवजात शिशु की मृत्यु दर रोकने, लिंग आधारित हिंसा, कम उम्र में शादी की रोकथाम, किशोर-किशोरियों से जुड़ी समस्याओं पर विशेष काम कर रही है। कोविड-19 के दौरान इस संस्था ने मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा व आजीविका पर जोर दिया है। संस्था ने अपने प्रयासों से मातृ व शिशु मृत्यु दर में कमी करने में सफलता पाई है।

बींज गांव में सुखू-दुखू बैठक

मानसिक स्वास्थ्य के मरीजों का इलाज सिर्फ दवा से नहीं, समुदाय की मदद से किया जाता है। इसमें सहभागी सीख एवं क्रियान्वयन ( पार्टिसिपेटरी लर्निंग एंड एक्शन, संक्षिप्त में पी.एल.ए) पद्धति का उपयोग किया जाता है। इस पद्धति में गांव के दौरे, नियमित बैठकें व ग्रामीणों से बातचीत की जाती है। समस्याओं की पहचान और उसके समाधान के लिए सामुदायिक पहल होती है।

एकजुट संस्था के मानसिक कार्यक्रम से जुड़े डा. सचिन बारब्दे ने बताया कि एकजुट ने कोविड-19 से बचाव के लिए गांवों में तत्कालीन व दीर्घकालीन तरह के कई काम किए हैं। तत्कालीन स्तर पर राहत सामग्री वितरण करना, सामूहिक रसोईघर चलाना, जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाना, प्रवासी मजदूरों के स्वास्थ्य व अन्य जरूरतों को पूरा करना, प्रवासी मजदूरों को कोरोनटाइन करवाना इत्यादि। दीर्घकालीन स्तर पर  टीकाकरण में मदद करना, और पोषण व स्वास्थ्य की स्थिति सुधारने के लिए बागवानी और जैविक खेती को प्रोत्साहन देना। स्कूली बच्चों की पढ़ाई में मदद करना।

बच्चों की पढ़ाई जारी है

डा. सचिन बारब्दे ने बताया कि जब कोविड-19 की पहली लहर आई और अचानक राष्ट्रव्यापी तालाबंदी हुई, उस समय कोरोना के कोई मरीज नहीं थे। शहरों से गांवों में प्रवासी मजदूर लौटने लगे थे। तब राज्य सरकार की ओर से स्वयंसेवी संस्था के साथ मिलकर एक समिति का गठन हुआ था, जिसमें एकजुट संस्था ने मध्यप्रदेश, गोवा,राजस्थान, ओडिशा से आनेवाले प्रवासी मजदूरों की मदद का जिम्मा लिया था। इन प्रवासी मजदूरों को शहरों से उनके गांव लौटते समय काफी दिक्कतें आईँ। कुछ के पास पैसे नहीं थे और कुछ के पास खाने के लिए भी नहीं था। वाट्सएप व फोन के माध्यम से इनकी मदद की।

उन्होंने आगे बताया कि संस्था ने बेघर बुजुर्ग, बेसहारा, असहाय,विकलांग लोगों के करीब दो हजार से भी ज्यादा परिवारों को सूखा राशन दिया। राशन सामग्री में चावल, दाल, सोयाबीन बड़ी,सरसों तेल, चना, गुड़ इत्यादि शामिल था। इसके अलावा, स्वच्छता सामग्री में साबुन, गमछा और मास्क दिए। लेकिन जब इस साल मार्च में दूसरी लहर आई और मई तक बनी रही, तो उसका असर गांवों में भी देखा गया। कई गांवों में महामारी से मौतों की खबरें भी आईँ। इसके अलावा, जो प्रवासी मजदूर शहरों में लौट गए थे, वे भी फिर से गांव लौट आए।

डा. सचिन बताते हैं कि दूसरी लहर में सबसे पहले एकजुट के कार्यकर्ताओं ने टीका लगवाया और ग्रामीणों को भी टीकाकरण के लिए प्रेरित किया। यह वह समय था जब टीकाकरण को लेकर ग्रामीणों में असमंजस था, और अफवाह फैली थी कि टीका लगवाने से कमजोरी आती है और मौत हो जाती है। इसके जवाब में जिला प्रशासन के साथ मिलकर जन जागरूकता अभियान चलाया। और अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ कॉल सेंटर बनाया। इस साल कॉल सेंटर से जिसको भी टीका लगता था, उनको दूसरे दिन कॉल करके उनका हाल-चाल पूछा जाता था। और अगर टीका लगने के बाद कोई समस्या हुई तो उनको उचित परामर्श दिया जाता था। अब तक 60,000 से भी ज्यादा कॉल किए जा चुके हैं। हर दिन करीब 100-150 फोन आते थे, जिन्हें उचित स्वास्थ्य संबंधी परामर्श दिया जाता था।

इस पूरी मुहिम का असर यह हुआ कि टीकाकरण में तेजी आई। इसके लिए पंचायत स्तर पर शिविर लगाए गए, जिसमें एकजुट के युवा साथियों ने भी मदद की। इस काम में जिला टीम में आशा कार्यकर्ता, ए.एन.एम, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को भी जोड़ा गया। संस्था ने जिला प्रशासन को ऑक्सी मीटर, मास्क, सेनेटाइजर आदि भी दिए गए, जिन्हें पंचायतों में उपयोग किया गया।

डा. सचिन बारब्दे कहते हैं कि “झारखंड के इस आदिवासी अंचल में गरीबी और बेरोजगारी बड़ी समस्या है, इसलिए हर साल पलायन होता है। इस सबका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। कोविड-19 ने इन समस्याओं को और बढ़ाया है। जब आवागमन बंद हो गया, तो इलाज के लिए मरीजों को बाहर ले जाना भी मुश्किल हो गया। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के मरीजों की देखभाल और उन्हें समय से दवाई पहुंचाना बहुत जरूरी हो गया। यह काम हमारी संस्था ने किया है।”

उन्होंने बताया कि महामारी के दौरान युवा साथियों ने डिजिटल माध्यम से गांवों के बच्चों को अनौपचारिक रूप से पढ़ाने का एक मंच प्रदान किया। इसमें सचल पुस्तकालय का एक आयाम भी जुड़ा है, जिसमें स्कूली किताबों के अलावा अन्य किताबें भी शामिल हैं। भूगोल, इतिहास, सामाजिक विज्ञान और पर्यावरण जैसे विषयों पर पोस्टरों के माध्यम से भी शिक्षा दी जा रही है।

एकजुट संस्था की कार्यकर्ता सुमित्रा गंगराई बताती हैं कि “हमने स्थानीय भाषाओं में कोविड-19 से बचाव के उपायों का प्रचार-प्रसार किया। स्थानीय भाषा हो, सादरी, मुंडारी, ओडिया और कुड़ुख में वीडियो बनाए, और सोशल मीडिया व वाट्सएप के माध्यम से लोगों तक संदेश पहुंचाया। इसमें पिक्चर कार्ड, कहानी, नुक्कड़ नाटक नृत्य, गीत व बातचीत इत्यादि के माध्यम से भी टीकाकरण के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया।”

बींज गांव की युवा साथी शान्तिबाला सामाड बताती हैं कि “मानसिक स्वास्थ्य के मरीजों को घरों में लगातार दवाएं पहुंचाई जा रही हैं। उन्हें राशन सामग्री दी जाती है। इस इलाके में डायन समझकर महिलाओं को प्रताड़ित करने की घटनाएं सामने आती हैं, जबकि इनमें बहुत सी महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य की समस्या से ग्रसित होती हैं, हमारी संस्था  इस पर लगातार काम कर रही है। लोगों को अच्छा पोषण मिले, इसके लिए गांव में पोषण बागवानी की जा रही है। फलदार वृक्षों का रोपण, जैविक खेती व गांव में साफ-सफाई का काम किया जा रहा है।”

टुईलटोला में चटाई बनाती स्कूली छात्रा

शान्तिबाला ने बताया कि हम गांव के किशोर-किशोरियों से अखबारी कागज के कई सामान बनवाते हैं। इसमें घरेलू साज-सज्जा की चीजें होती हैं, चटाई और झाड़ू भी बनाते हैं। किशोरियों के लिए पुराने कपड़े के सेनेटरी नेपकिन भी बनवाते हैं।

वह आगे बताती हैं कि हम छोटे बच्चों ( 1 से 5 वीं कक्षा तक) को खुद पढ़ाते हैं और बड़े बच्चों ( 6 वीं से 9 वीं तक) के बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं में मदद करते हैं। शांतिबाला बताती हैं कि हम स्कूल छोड़ चुके बच्चों का फिर से स्कूल में नामांकन भी करवा रहे हैं। संजली तांती ने बताया कि उसने 8 वीं कक्षा उत्तीर्ण की है, पर स्कूल नहीं लगने के कारण वह गांव में ऑनलाइन कक्षा से पढ़ रही हैं। उसकी कक्षा सुबह 6 बजे से 8 बजे तक लगती हैं, उसके बाद वह खेतों में काम करने चली जाती है। इसके अलावा, किशोर-किशोरियों के साथ जंगल को पहचानने के लिए जंगल यात्रा भी की। पेड़-पौधों, फल, फूल, पत्ती व मशरूम इत्यादि की जानकारी भी दी।

जंगल यात्रा

गांव की ब्रह्म लामाय ने बताया कि उन्होंने घर के बागान में कई तरह की सब्जियां लगाई हैं। जैसे टमाटर, बैंगन, पपीता, मकई, भिंडी, करेला, मिर्ची, मूली, ग्वारफली, लाल भाजी और पालक इत्यादि। इन हरी सब्जियों को हमने घर में उपयोग करने के अलावा बेचा भी, जिससे कुछ आमदनी भी हुई। इसके अलावा, नींबू, मुनगा, जामुन जैसे फलदार पेड़ लगाए हैं।

कुस्तुईया गांव में बागवानी में निशा पुरती

धनुर्जय हाईबुरू और मंगल सिंह हाईबुरू ने बताया कि वे श्री विधि से धान की खेती कर रहे हैं, जिससे उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल रही है। वे कीट नियंत्रण के लिए जैव कीटनाशक का इस्तेमाल भी करते हैं। यहां यह बताना उचित होगा कि श्री विधि धान की उपज बढ़ाने की पद्धति है, जिसे मेडागास्कर पद्धति भी कहते हैं। इसमें कम पानी, कम बीज लगता है और उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।

एकजुट के किसान मेले में कोहड़ा

शान्तिबाला सामाड ने बताया कि इस तरह करीब ढाई सौ किसान श्री विधि से खेती कर रहे हैं, जिसमें एक चौथाई प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं। पिछले साल किसानों को जैविक खेती के लिए बीज और तकनीक की जानकारी मुहैया करवाई गई, जिन्होंने उनके खेत में धान लगाई। पिछले 3 सालों से किसान मेला का आयोजन किया जा रहा है।

बागुसेरेंग में नारायण हेम्ब्रोंग की श्री विधि से खेती

कुल मिलाकर, कोविड-19 के दौर में एकजुट संस्था ने वंचित व हाशिये पर रहनेवालों लोगों की मदद की है। तत्कालीन राहत के कामों के साथ दीर्घकालीन टिकाऊ आजीविका की कोशिश की है। ग्रामीणों को बागवानी व जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया, फलदार पौधे वितरित किए। जिससे कोविड 19 के संकट में स्वस्थ रहने में तो मदद मिले, साथ ही उनकी खाद्य सुरक्षा भी हो। विशेषकर, मानसिक स्वास्थ्य पर जोर दिया, क्योंकि इस दौरान पहले से ही ग्रामीण इलाकों में गरीबी व बेरोजगारी से जूझ रहे लोगों की समस्याएं और बढ़ गईं। इसके मद्देनजर, संस्था ने ऐसे मानसिक स्वास्थ्य के मरीजों की देखभाल की, दवाएं पहुंचाईं। संस्था के कार्यकर्ताओं ने स्कूली बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में मदद की। शिक्षा को उत्पादक कामों से शिक्षा से जोड़ा, जो शिक्षा में एक नया आयाम व नवाचार भी है। लेकिन डा. सचिन बारब्दे कहते हैं कि हमारी संस्था के काम की सीमाएं हैं, सरकार को ही स्वास्थ्य और आजीविका पर और पहल करने की जरूरत है।

नोटः- इस कहानी में पहचान उजागर न करने के लिए कुछ मरीजों के नाम बदले गए हैं।

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