विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially Written for Vikalp Sangam)
(Aarthik Sangam Mein Mahilaon Ne Dikhai Raah)
फोटो क्रेडिट: ध्रुव गुप्ता और बाबा मायाराम
यह संगम बताता है कि एक और वैकल्पिक अर्थव्यवस्था न केवल संभव है, बल्कि पहले से ही मौजूद है।
“हमें प्रकृति से जो कुछ भी मिलता है, वह जंगल, उस पर निर्भर रहने वाले लोग और शेष सभी के बीच साझा किया जाना चाहिए। यह तीसरा हिस्सा सबका है। यह हमें प्रकृति ने सिखाया है, वह सबसे बड़ी शिक्षक है।” यह शब्द स्टेन थेकेकारा के थे, जो तमिलनाडु नीलगिरी की जस्ट चेंज इंडिया संस्था से जुड़े हैं।
हाल ही में, तमिलनाडु के कन्याकुमारी में 11 से 13 जून तक क्रेडिट और आर्थिक विकल्प संगम आयोजित किया गया। इस संगम में देश भर से 100 से अधिक शोधकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जमीनी संगठनों ने हिस्सा लिया। जिसमें स्टेन थेकेकारा भी शामिल थे। उनकी संस्था में, बड़ी संख्या में आदिवासी जुड़े हैं, और वे जंगल व खेती से जुड़े उत्पादों की बिक्री कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

देश के दक्षिणी और अंतिम छोर पर आयोजित इस कार्यक्रम में वित्तीय स्वायत्तता, न्यायसंगत ऋण प्रणाली और स्थायी आर्थिक विकल्पों के लिए शिक्षण और अनुभव साझा किए गए। अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संघ (एआईबीओसी) के समर्थन और टिम्बकटू कलेक्टिव, सेंटर फॉर फाइनेंशियल एकाउंटबिलिटी (वित्तीय जवाबदेही केन्द्र) और अन्य के साथ साझेदारी में महालिर एसोसिएशन फॉर लिटरेसी अवेयरनेस एंड राइट्स (एमएएलएआर) द्वारा आयोजित इस संगम में क्षेत्र के अनुभव, आलोचनात्मक संवाद और सामूहिक चिंतन को शामिल किया गया।
मैं इस संगम में शामिल होने के लिए लम्बी ट्रेन यात्रा करके पहुंचा था। कन्याकुमारी, हमारे देश का अंतिम छोर है। यह जिला भी है, और इसका मुख्यालय नागरकोइल है। यहां अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर का त्रिवेणी संगम स्थल है। यहां सूर्योदय व सूर्यास्त के मनमोहक दृश्य दिखाई देते हैं। हमने विशाल सागर के दर्शन किए और मनोरम दृश्य की कई छटाएं देखीं। समुद्र तट पर सुबह-शाम सैर भी की।
आगे बढ़ने से पहले यह बताना उचित होगा कि विकल्प संगम क्या है? संगम में सहजो सिंह व बबलू गांगुली ने इस पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने संयुक्त रूप से परिवर्तन के फूल यानी उसके मूल्यों व सिद्धांतों के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि विकल्प संगम, एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर अलग-अलग हिस्सों में गोष्ठियां होती हैं। विकल्पों पर जो समुदाय, व्यक्ति, समूंह और संस्थाएं काम कर रही हैं, उनके अनुभव सुने समझे जाते हैं और एक-दूसरे से सीखा जाता है। इसके माध्यम से आपस में विचारों का आदान-प्रदान करने, गठजोड़ मजबूत करने और मिल-जुलकर बेहतर भविष्य बनाने की कोशिश की जाती है।
विकल्प संगम का शुभारंभ मलार के कार्यालय में हुआ, जो नागरकोइल में स्थित है। मलार (महालिर एसोसिएशन फॉर लिटरेसी अवेयरनेस एंड राइट्स), यह एक महिला संगठन है, जो संपूर्ण साक्षरता अभियान के बाद सामाजिक गतिविधियों से उभरा है। इस अभियान की ऊर्जा व उत्साह महिला स्वयं सहायता समूहों के काम आया। वर्ष 1994 में इसका पंजीयन हुआ।
इस संगठन का उद्देश्य महिलाओं को संगठित करना, फिजूलखर्ची को कम करना, और बचत करना है। छोटे ऋणों के द्वारा सामाजिक और आर्थिक विकास करना इत्यादि था। अब इन समूहों से करीब 30 हजार से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हैं। इन महिलाओं के करीब 2 हजार स्वयं सहायता समूह हैं। स्थानीय स्तर पर विकल्प संगम के आयोजन में मलार प्रमुख रूप से शामिल था।

इस उद्घाटन सत्र में मलार के बारे में विस्तार से बताया गया। इसकी अध्यक्ष आर. शेलिन मैरी और उनकी टीम के सदस्यों ने उनके संगठन, कार्यकलाप व बचत समूहों के बारे में बताया। इसके माध्यम से उन्होंने किस तरह अधिकारों की लड़ाई लड़ी, इसकी भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वे स्वयं सहायता समूहों के संचालन के साथ लोगों के जीवन की बेहतरी, उनके सम्मान व अधिकारों की लड़ाई भी लड़ते हैं।
संगम में मलार के भविष्य व चुनौतियों पर कई वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए। जिसमें ऑल इंडिया पीपुल्स नेटवर्क के दिनेश अग्रवाल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रो. अर्चना प्रसाद, कृषि विश्वविद्यालय की डॉ.ए. प्रेरणा इत्यादि शामिल थे। वक्ताओँ ने मलार की चुनौतियों व कमियों पर भी प्रकाश डाला। ए. प्रेरणा ने केरल के कुदुम्ब श्री के बारे में बताया। मलयालम में कुदुम्ब श्री का अर्थ परिवार की समृदधि होता है। यह राज्य गरीबी उन्मूलन मिशन के तहत् महिला सशक्तीकरण का बहुत अच्छा उदाहरण माना जाता है।

मलार के काम को समझने के लिए फील्ड विजिट भी की गई। मैं एक समूह के साथ नगरकोइल के ऐरचाकुलम गया। इस मौके पर महिलाओं ने बताया कि उनका बचत समूह 25 साल से चल रहा है। उनके समूह में 20 सदस्य हैं। हर हफ्ते प्रति सदस्य 100 रू. जमा करते हैं, यानी प्रति माह 400 रूपए। यह राशि जमा होती है। और सदस्यों को जरूरत पड़ने पर ऋण के रूप में दी जाती है। सब्जी विक्रेता, डेयरी, सिलाई, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन इत्यादि कामों के लिए ऋण दिए जाते हैं।
समूह की राजलक्ष्मी ने उनकी बेटी की प्रसूति के लिए ऋण लिया था। एक अन्य सदस्य बासंता ने गाय खरीदने के लिए ऋण लिया, और अब उसका दूध बेचकर आजीविका चलाती हैं। इस काम से उनकी हर माह करीब 5 हजार की आमदनी हो जाती है।
इसी प्रकार, मीना शामली सिलाई-कढाई करती हैं, जिससे उनकी प्रति माह अच्छी खासी कमाई हो जाती है। उन्होंने घर के एक सदस्यों की जरूरतों के लिए ऋण लिया था। इस प्रकार महिलाएं छोटे छोटे स्वरोजगार के लिए ऋण लेती हैं, काम करती हैं और आत्मनिर्भर हो जाती हैं।
संगम के दूसरे दिन कन्याकुमारी में सीएसआई रिट्रीट सेंटर में विकल्प संगम की बैठक जारी रही। इस मौके पर टिम्बकटू कलेक्टिव से जुड़े महाशक्ति फेडरेशन के सदस्यों ने प्रस्तुति दी। उन्होंने महिलाओं के नेतृत्व वाली बचत सहकारी समितियों के कामकाज के बारे में बताया। महाशक्ति फेडरेशन बचत, ऋण और कल्याण सेवाओं के माध्यम से हजारों सदस्यों का समर्थन करती है।

महाशक्ति की रामीजाबी ने बताया कि इसकी शुरूआत वर्ष 1992 में हुई। सबसे पहले इलाके की स्थिति को समझने के लिए सर्वे किया गया। उसमें हमें पता चला कि महिलाओं की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। इसी से बचत समूहों के कामकाज की सोच बनी। इन सहकारी समितियों को मिलाकर महाशक्ति फेडरेशन बना है। जिससे लगभग 336 गांव की 34 हजार से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हैं।
इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को सशक्त करना था। टिकाऊ आजीविका, पुनर्चक्रण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देना और उनके हक व अधिकारों का सम्मान करना। अब सहकारी समितियों का ढांचा बन गया है, और निगरानी व संचालन की कार्यप्रणाली बन गई है। इस पूरी प्रक्रिया से महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं।
इससे पहले बबलू गांगुली ने बताया कि उन्होंने ग्रामीणों की मदद से उजड़े कलपावल्ली नामक जंगल को पुनर्जीवित किया है। इसमें सिर्फ प्रकृति को अस्थायी रूप से आराम करने दिया गया। यानी उसकी निगरानी की और उसे बचाया, इससे कुछ सालों में जंगल हरा-भरा हो गया। आज उस जंगल में जंगली जानवरों से लेकर पक्षियों की कई प्रजातियों का बसेरा है। जीव-जंतुओं व पेड़-पौधों की विविधता है।
इसके अलावा, रंगदे ने विविध स्रोतों और सामुदायिक संस्था-निर्माण के माध्यम से वैकल्पिक डिजिटल वित्त दृष्टिकोणों को समझाया। रंगदे के अरूण रामचंद्रन जी. ने बताया कि उनकी अधिकांश मदद आजीविका के लिए होती है। इसी प्रकार, महाराष्ट्र की सुख भूमि संस्था की सपना ने बताया कि उनका कार्यक्षेत्र 22 गांवों में है, और इससे लगभग 1000 महिलाएं जुड़ी हैं। उनकी संस्था पर्यावरण संवर्धन के साथ महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी काम करती है। किचिन गार्डन को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे महिलाओं को पौष्टिक भोजन मिल सके।

इसके अलावा, संगम में धरणी टिम्बकटू कलेक्टिव,( आंध्र प्रदेश), नॉर्दर्न डेवलपमेंट को-ऑपरेटिव बैंक, जाफना, (श्रीलंका), स्वाति, करूर, (तमिलनाडु), जस्ट चेंज, गुडलूर, (तमिलनाडु), मैत्री, (पांडिचेरी), जागृति महिला सहकारी समिति, रेहटी, (मध्य प्रदेश), सुख भूमि इंडिया ट्रस्ट, पालघर,(महाराष्ट्र) इत्यादि ने भी प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के दौरान मलार की कार्यकर्ताओं ने लगातार जोशीले जनगीत गाए। एकरसता तोड़ने के लिए खेल भी हुए। दक्षिण भारतीय भोजन का आनंद लिया। जिसमें दाल पायसम, गुडादाल, अबीइल, रस्म, केसरी, इडली, सांबर, चटनी इत्यादि शामिल थे।

कुल मिलाकर, क्रेडिट और आर्थिक विकल्प संगम केवल विचारों का जमावड़ा नहीं था, यह साथ मिलने-जुलने, अपने अनुभव साझा करने, एक दूसरे से सीखने-सिखाने का आत्मीय संगम था। यह वास्तविकताओं, प्रतिरोधी कल्पनाओं और परिवर्तनकारी ऊर्जा का मिलन था। जिससे भविष्य का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। चाहे सहकारी समितियों द्वारा अर्थव्यवस्था को पुनः प्राप्त करना हो, वित्तीय हिंसा का विरोध करने वाली महिलाएं हों या देखभाल के साथ पुनर्जीवित की जा रही पारिस्थितिकी हो, यह संगम हमें बताता है कि एक और वैकल्पिक अर्थव्यवस्था न केवल संभव है, बल्कि पहले से ही मौजूद है। यह सभी पहलें भले ही छोटी हों, पर बहुत ही महत्वपूर्ण व प्रेरणादायक हैं।
लेखक के बारे में
बाबा मायाराम, स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं, वे लम्बे समय से विकास व पर्यावरण के मुद्दों पर लिखते हैं.
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