कमार आदिवासियों की देसी खेती (in Hindi)

By बाबा मायारामonDec. 28, 2018in Food and Water

छत्तीसगढ़ के राजिम-नवापारा में मुझे कुछ समय पहले जाने का मौका मिला। वहां सामाजिक कार्यकर्ता रामगुलाम सिन्हा रहते हैं। उन्होंने मुझे उनकी प्रेरक संस्था के काम को देखने के लिए बुलाया था। वे गरियाबंद के कमार आदिवासियों के बीच में लम्बे समय से काम कर रहे हैं।

कमार, आदिम जनजातियों में एक हैं। जो अब भी उनकी पारंपरिक जीवनशैली के करीब हैं और निर्धन हैं। यह आदिवासी गरियाबंद, छुरा और मैनपुर इलाके में पाए जाते हैं। इनका प्रकृति से गहरा जुड़ाव है और उसी पर इनकी आजीविका निर्भर है। जंगलों में कई तरह के कंद, चार, तेंदू, आंवला, महुआ और कई तरह की हरी भाजियां होती हैं। इसके अलावा वे बांस के बर्तन बनाते हैं और बेचते हैं।

गरियाबंद , पूर्व में रायपुर जिले का हिस्सा था, अब स्वतंत्र जिला बन गया है। रामगुलाम सिन्हा स्वयं इसी इलाके के एक गांव के रहनेवाले हैं। बचपन से उन्होंने इस इलाके को करीब से देखा है और इसी ने उन्हें समाज कार्य के लिए प्रेरित किया है। लम्बे समय बाद मैं उनसे मिला था। बहरहाल, मैं उनके काम को देखकर चकित था। उनकी संस्था कई क्षेत्रों में काम कर रही है।

रामगुलाम सिन्हा का किसानों से संवाद (प्रथम संस्करण में नहीं हैं, अब जोडा गया है)

खासतौर से देसी धान की खेती को बढ़ावा देने और बाड़ी (किचिन गार्डन) के काम ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उनके अपने खेत में कई देसी धान बीजों की खेती की थी, जिसे आसपास के किसान देखने आते थे। उन्होंने करीब 346 प्रकार की देसी धान की किस्में लगाई थीं। यह खेत गरियाबंद प्रखंड के भिलाई गांव में है।

जो परंपरागत देसी बीज लुप्त हो रहे हैं, उनके संरक्षण और संवर्धन का काम किया जा रहा है। देसी धान की किस्मों में लोहादी, मासूरी, विष्णुभोग, श्यामभोग, लाल चावल, काला चावल जैसी कई विशेष गुणों वाली किस्में शामिल हैं। इसके अलावा, उड़द, मूंग, तिवरा, झुरगा और अरहर जैसी कई अनाजों की किस्में हैं।

इसके अलावा, वे धान की रोपाई मेडागास्कर पद्धति से करते हैं। इस पद्धति में खेतों में पानी भरने की जरूरत नहीं होती और बीज भी कम लगता है। इस पद्धति से फसल का उत्पादन दोगुना लिया जा सकता है, जिसे छत्तीसगढ़ में कुछ किसानों से हासिल कर लिया है। मिश्रित खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। बिना रासायनिक व बिना कीटनाशक की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और यहां धान की हजारों प्रजातियां हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश से मशहूर कृषि वैज्ञानिक डा. आर.एच. रिछारिया ने 17 हजार से अधिक देसी धान किस्मों को एकत्रित किया था। जिनमें अधिक उत्पादकता देने वाली, सुगंधित व स्वाद में बेजोड़ किस्में शामिल थीं।

कमार आदिवासियों के घरों के आसपास जो खाली जगह होती है, प्रेरक संस्था ने उस पर बाड़ी ( किचिन गार्डन) को लगाने के लिए प्रोत्साहित किया है। मुझे उन्होंने कई गांव दिखाए, जहां बाड़ियों में कई तरह की सब्जियों और फलों की खेती की गई थी।

जिनमें बैंगन, मिर्ची, तुरई, करेला, कुम्हडा, करेला, बरबटी, डोडका, सेम और टमाटर लगाए थे। इन सबकी उनके पास कई किस्में हैं। इसके अलावा, नींबू, आम, जामुन, कटहल, महुआ और बांस को लगाया गया है।

रामगुलाम सिन्हा बताते हैं कि अब जंगल कम हो रहे हैं, और मौसम बदलाव भी हो रहा है। इस कारण जो कमार आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर रहते थे। वनोपज पर निर्भर रहते थे, उनमें कमी आई है। इसलिए किचिन गार्डन ( बाड़ियों में सब्जियां व अनाज) व मिश्रित देसी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे उनकी आजीविका व खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

विशेषरूप से 20 गांवों में कमार आदिवासियों की आजीविका का काम किया जा रहा है। इसके लिए देसी बीजों की खेती को सिखाया जा रहा है। क्योंकि कमार अब तक खेती से थोड़े दूर रहे हैं। उनके भोजन में पोषण हो, इसके लिए पौष्टिक अनाजों की मिश्रित खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिसमें कोदो, मड़िया, अरहर, अमाड़ी, झुरगा, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि की खेती की जा रही है।

रामगुलाम सिन्हा के अनुसार देसी बीजों की खेती को वे कुछ संस्थाओं और व्यक्तियों के साथ मिलकर 7-8 जिलों में कर रहे हैं। जिसमें धमतरी, महासमुंद, कोंडागांव, बस्तर, कवर्धा, राजनांदगांव, जांजगीर-चापा, बिलासपुर में कर रहे हैं।

देसी बीजों के संरक्षण और घरों में बाड़ियों ( किचिन गार्डन) के काम ने कमार आदिवासियों के जीवन को बदल दिया है। अब वे देसी बीजों के जरिए पारंपरिक टिकाऊ खेती की ओर मुड़ रहे हैं। बाड़ियों के प्रचलन से उनके पोषण में सुधार हुआ है और आमदनी भी बढ़ी है। साथ देशी बीजों का आदान-प्रदान बढ़ा है।

किसानों से देसी बीज की चर्चा (प्रथम संस्करण में नहीं हैं, अब जोडा गया है)

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि कमार आदिवासियों की जिनकी आजीविका जंगल पर निर्भर थी, मौसम बदलाव के दौर में इसमें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, तब प्रेरक के काम से उन्हें आजीविका सुनिश्चित करने में मदद मिली है। खाद्य सुरक्षा हुई है। उनकी थाली में पौष्टिक अनाज शामिल हुए हैं। यह बहुत ही सराहनीय और अनुकरणीय काम है।

पोस्ट में इस्तेमाल की गई तस्वीरें: साभार बाबा मायाराम

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Inclusive Media for Change द्वारा प्रथम प्रकाशित

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