अखबार की पगडंडी (in Hindi)

By बाबा मायाराम on Apr. 02, 2017 in Knowledge and Media

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(Akhbaar ki Pagdandee)

दिन की शुरुआत खुशी से हो तो दिन अच्छा बीतता है। लेकिन हम में से बहुत लोग दिन की शुरुआत तो अखबार पढ़ कर करते हैं, और अखबार ऐसी खबरों से भरे रहते हैं जो नकारात्मक होती हैं। पिछले कुछ समय से मुख्यधारा के मीडिया में हत्या, बलात्कार, मारपीट,ठगी, घूसखोरी और आत्महत्या की खबरों को प्रमुखता से छापा जा रहा है। इनको पढ़ कर मन मलिन तो होता ही है, साथ ही कुंठा, असहायता और निराशा का वातावरण बनता है। अब कुछ नहीं हो सकता, ऐसी सोच बनती है। 

भोपाल के कुछ युवाओं के एक अखबार ने इसे बदल दिया है। उन्होंने ऐसा अखबार शुरू किया है जो सिर्फ सकारात्मक खबरें छापता है। ये युवा मुख्यधारा के मीडिया में छपी इन खबरों को पढ़-पढ़ कर परेशान हो चुके थे। उन्होंने सोचा कुछ किया जाए।

उन्होंने जुलाई, 2015 में एक समूह बनाया और अंग्रेजी अखबार शुरू किया। उस अखबार का नाम रखा- द आप्टिमिस्ट सिटीजन, जिसका अर्थ होता है आशावादी नागरिक। इसे हर माह प्रकाशित किया जाता है, अब तक 400 से अधिक सकारात्मक कहानी छापी जा चुकी हैं, जिन्हें पढ़कर बहुत ही अच्छी सार्थक प्रतिक्रियाएं आईं हैं। इस अखबार का खासा असर भी दिख रहा है, न केवल इसे खूब पसंद किया जा रहा है, बल्कि ऐसे सार्थक कामों से लोग जुड़ रहे हैं।

द आप्टिमिस्ट सिटीजन के सम्पादक पीयूष घोष का कहना है कि हम अखबार में ऐसी खबरों को प्रमुखता देते हैं जिन्हें पढ़कर कुछ करने की प्रेरणा मिले, आगे कुछ हो, कुछ बदलाव हो। हम सुशासन, महत्वपूर्ण उपलब्धियां, साहस और निजी व समूहों की कोशिशों की सकारात्मक कहानियां प्रकाशित करते हैं।

ऐसी ही एक खबर भोपाल की एक झुग्गी में रहने वाली 9 साल की मुस्कान अहिरवार की है जो लायब्रेरी चलाती है। वह अपने ही घर में एक साल से बच्चों के लिए बाल पुस्तकालय चलाती है जिसमें अब 2000 किताबें हैं। मुस्कान को इस काम के लिए नीति आयोग का वीमेन ट्रांसफार्मिंग इंडिया के तहत थाट लीडर का पुरस्कार भी मिल गया है।

भोपाल की मुस्कान की लायब्रेरी – फोटो वरुण तिवारी

इजराइल के एक दंपति जो पर्यटन के लिए भारत आए थे और यहां केरल की हरियाली देखकर उनके मन में जंगल लगाने की प्रेरणा जगी। और उन्होंने अपनी नौकर छोड़कर तमिलनाडु में 70 एकड़ जमीन में कई तरह के पेड़ पौधे लगाए और यहीं बस गए।

इसी प्रकार, आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले के हिन्दुपुर गांव के कल्याण अक्कीपेड़ी की कहानी है, जिन्होंने बी. टेक और एम.बी.ए. की डिग्री हासिल की और कारपोरेट की नौकरी की। इस बीच उनका मन हुआ अपने देश को देखने और समझने का। वे ढाई साल तक देश भर में घूमे और उन्हें इस दौरान गरीबी का गहराई से अहसास हुआ, परेशान हुए और इस तस्वीर को बदलने की चाह मन में जगी।

कल्याण अक्कीपेडी जिन्होंने गांव को आत्मनिर्भर बनाया –  फोटो कल्याण अक्कीपेडी

उन्होंने अच्छी खासी नौकरी छोड़ी, अपने जिले के एक गांव में लौट आए और लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के काम में जुट गए।  कुछ जमीन खरीदी और उसे अच्छा उपजाऊ बनाया। पर्यावरण सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी-पानी का संरक्षण किया। एक प्रवासी भारतीय ने इस खबर को पढ़कर जमीन दान देने की पेशकश की है और इसी तरह के प्रयोग को दुहराने की इच्छा जताई है।  

क्या अखबार को एक बदलाव का माध्यम बनाया जा सकता है। इसके जवाब में पीयूष कहते हैं- हां बिलकुल, हमारी कोशिश यही है। हम खबर छापते ही हैं इसलिए कि इसे पढ़कर कुछ लोग प्रेरणा लें और इस दिशा में कुछ करें। कुछ लोगों ने ऐसा किया भी है।

पीयूष घोष बताते हैं कि हमारा अखबार प्रिंट और आनलाइन में उपलब्ध है।  कुला मिलाकर अब तक 1000 पाठक हो चुके हैं। अखबार का कामकाज 5 सदस्यीय पूरावक्ती मुख्य टीम करती है जिसमें संपादकीय कार्य, मार्केटिंग, सोशल मीडिया, शोध व समन्वय का काम शामिल है। खबरों के चयन में पाठक भी मदद करते हैं, इंटर्नशिप करने वाले युवा शोध करते हैं और खबरें बनाते हैं, जिसे संपादकीय टीम अंतिम रूप देती है।

इस युवा समूह में कोई पत्रकारिता के पेशे से नहीं है। ये उनकी खुद की पहल है जिसे पाठकों का खासा समर्थन, सहयोग और मार्गदर्शन मिल रहा है। पाठक भी खबरें के चयन से लेकर लेखन तक में मदद करते हैं। यानी अखबार में उनकी सक्रिय भागीदारी होती है। यह कुछ सार्थक काम करने वालों की साझी कोशिश बनती जा रही है।

हमारे जीवन में अखबार और किताबों की बहुत सकारात्मक और सार्थक सार्थक भूमिका रही है। रोज सबेरे हम इसे खरीद कर पढ़ते हैं। बच्चे से लेकर बूढों तक इस इसे पढ़ते हैं। विचार बनाने और सोचने-विचारने में अखबार मदद करते हैं। अच्छे विचार इंसानियत की बुनियाद होते हैं। अगर अच्छा, उम्मीदों से भरा, सुखद और बौद्धिक माहौल मिलेगा तो  समाज को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

इस दिशा में भोपाल का यह अखबार का प्रयास सराहनीय है। यह मुख्यधारा के अखबारों से अलग है। यह एक अलग पगडंडी की तरह है, जो अपना रास्ता खुद बनाने की कोशिश कर रहा है। नई राह खोज रहा है। नई तरह से चलने की कोशिश कर रहा है, जहां मुश्किलें भी हैं, कांटे और बाधाएं भी हैं, लेकिन इस पगडंडी पर चलने का साहस है, जज्बा है। पत्रकारिता के मूल्य व आदर्शों पर चलने की कोशिश है। फिलहाल द आप्टिमिस्ट सिटीजन उम्मीदों का रास्ता है जो अनुकरणीय भी है।  

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