देसी बीजों की खेती ने भूख से बचाया (in Hindi)

By बाबा मायाराम on June 27, 2020 in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (SPECIALLY WRITTEN FOR VIKALP SANGAM)

“जब मेरे पास दो साल तक रासायनिक खेती करने के लिए पैसे नहीं थे, तब राजिम की प्रेरक संस्था ने हमें रास्ता दिखाया। देसी बीजों से खेती करने की सलाह दी, प्रशिक्षण दिया, जिससे हमारी खेती की तस्वीर बदल गई। आज हम देसी बीजों से न केवल खुद खेती करते हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी प्रशिक्षण देते हैं।” यह कहना है भानुराम नेताम का, जो छत्तीसगढ़ के गोनबोरा गांव के किसान हैं।

प्रेरक संस्था ने देसी बीजों की जैविक खेती का काम छत्तीसगढ़ के 7-8 जिलों में किया है। जिसमें धमतरी, महासमुंद, कोंडागांव, बस्तर, कबीरधाम, राजनांदगांव, जांजगीर-चापा, बिलासपुर और कोरबा शामिल है। इनमें से मैंने अधिकांश जिलों में दौरा कर किसानों से बात की है, उनकी खेती देखी है, उनके बीज बैंक देखे हैं।

गरियाबंद इलाके में मैंने कुछ समय पहले दौरा किया था। यहां मुझे प्रेरक संस्था के रामगुलाम सिन्हा ले गए थे। भिलाई गांव में हमने उनके वसुंधरा केन्द्र को देखा, जहां देसी बीजों का संरक्षण व संवर्धन किया जाता है। उनके गुणधर्मों को पहचाना जाता है। किसान कार्यकर्ता कोमलराम साहू ने मुझे कई गांवों में घुमाया। यहां मुख्य रूप से साल व सागौन का जंगल है। पैरी नदी पर सींकासेर बांध है।

यहां घना जंगल और पहाड़ हैं। पैरी नदी और सोढूर नदी यहां की पहचान है। जिले के राजिम में महानदी, पैरी और सोढूर नदी पर पवित्र संगम है, जो एक तीर्थस्थल भी है। यहां प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक मेला (पुन्नी मेला) लगता है जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण आते हैं।

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के ग्राम गोनबोरा (निसेनीदादर मोहल्ला) में भानुराम नेताम रहते हैं। यह छुरा विकासखंड में है। संस्था का कार्यक्षेत्र कमार, भुंजिया और गोंड आदिवासियों में है। गिरि यानी पर्वत के घिरे होने के कारण इसका गरियाबंद नाम पड़ा है। यह पहले रायपुर जिले में था, कुछ साल पहले ही स्वतंत्र जिला बना है।

गोनबोरा गांव में भानुराम नेताम की 5 एकड़ जमीन है, जिसमें 2 एकड़ जमीन में धान की खेती करते हैं। बाकी जमीन में पौष्टिक अनाज जैसे कोदो, कुटकी, मक्का, मड़िया, मूंगफली और सब्जियों की खेती करते हैं।

भानुराम नेताम बताते हैं कि देसी बीजों की धान खेती में बिल्कुल खर्च नहीं होता है। न रासायनिक खाद की जरूरत है और न ही कीटनाशक की, और न ही किसी मशीन की। सिर्फ हल-बैल की मदद से, खुद की मेहनत से फसल तैयार हो जाती है। उसकी ढुलाई और मिंजाई भी खुद करते हैं।

इस साल उन्होंने खेत में कुसुमकली, सोनामासुरी, डाबर जैसी देसी धान किस्में लगाई थीं। एक एकड़ में करीब 20 क्विंटल तक पैदावार हुई है। और वह भी बिना लागत खर्च के।

छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्र में जब पिछले साल संकर (हाईब्रीड) बीजों की धान फसल में बड़े पैमाने पर रोग लगा था, फसल बर्बाद हो गई थी। इसलिए कई किसान उनसे देसी धान की जैविक खेती के बारे में जानने के लिए पास आए। भानुराम नेताम उनके खेत में जैव कीटनाशक तैयार करते हैं। जैव कीटनाशक बनाने के लिए ऐसे पौधों की पत्तियां चुनते हैं, जिन्हें मवेशी नहीं खाते। जैसे सीताफल, बेसरम, नीम, करंज फुडहर इत्यादि। इन पौधों के पत्तों से जैव कीटनाशक बनता है। इन कीटनाशक बनाने का प्रशिक्षण वे अन्य किसानों को भी देते हैं। प्रेरक संस्था ने इस विकासखंड के ग्राम हरदी में बीज बैंक भी बनाया है, जहां से किसान देसी बीज ले जाते हैं।

महिला किसानों द्वारा धान की कलाकृतियां

प्रेरक संस्था ने यहां देसी बीजों के संरक्षण व संवर्धन के लिए विशेष प्रयास किए हैं। संस्था के भिलाई स्थित वसुंधरा केन्द्र में 350 देसी धान की किस्मों का संग्रह है। जिसमें 27 किस्में लाल चावल की, 6 किस्में काले चावल की, 1 किस्म हरे चावल की है। इसके अलावा, इन किस्मों में कम पानी में पकने वाली, ज्यादा पानी में पकनेवाली, लंबी अवधि की माई धान, कम अवधि की हरूना धान इत्यादि शामिल हैं। इन किस्मों में जवाफूल, विष्णुभोग, बादशाह भोग, सोनामासुरी, पोरासटका, साठिया, लायचा, डाबर, दूबराज, मासुरी इत्यादि है। इनमें कई किस्मों में औषधि गुण भी हैं। सुगंधित किस्में भी हैं।

भिलाई गांव में 350 धान की किस्में

यहां बताना उचित होगा कि विश्वप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक आर.एच. रिछारिया ने अविभाजित मध्यप्रदेश ( जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल था) से धान की 17 हजार देसी किसानों को एकत्र किया था जिसमें अधिक उत्पादकता देने वाली, सुगंधित व अन्य तरह से स्वादिष्ट किस्में शामिल थीं। डा. रिछारिया चावल की किस्मों के विशेषज्ञ थे। वे मानते थे देसी किस्मों को ही देश में धान की खेती की प्रगति का आधार बनाना चाहिए। उन्होंने पता लगाया था कि धान की किस्मों की विविधता का बहुत अमूल्य भंडार है। धान की विविधता जरूरी है क्योंकि विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों को चुनकर उगाया जा सके। उनकी यह सोच आज जलवायु बदलाव के दौर में बहुत ही उपयोगी है। इससे बदलते मौसम के अनुकूल मिट्टी-पानी के हिसाब से खेती में देसी किस्मों का चुनाव कर खेती की जा सकती है। किसान मौसम के अनुकूल खेती पद्धति में भी बदलाव कर सकते हैं।

दिसंबर ( 2019) महीने के आखिर में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आदिवासी किसानों का एक सम्मेलन हुआ था जिसमें देसी बीजों की प्रदर्शनी लगाई थी। इस सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के कई कोनों से किसान आए थे। उन्होंने देसी बीजों की जानकारी हासिल की थी। देसी बीजों व जैविक खेती का प्रचार-प्रसार का यही तरीका है। जगह-जगह पर प्रदर्शनी व बीज मेला लगाए जाते हैं।

प्रेरक की एक कार्यकर्ता हैं ताराबाई। वे कनसिंगी गांव की रहनेवाली हैं, जो गरियाबंद से करीब 50 किलोमीटर दूर जंगल के अंदर बसा है। वे देसी बीजों की खेती को बढ़ावा देने का काम 15 गांवों में करती हैं। ताराबाई ने महिला किसानों को जैविक खेती की ओर मोड़ा है। वे कहती हैं उनकी पहल से कई महिला किसान बीज उत्पादक हैं और वे जैव कीटनाशक भी तैयार करती हैं। तनाछेदक, बंकी, ब्लास्ट कीट को मारने में यह दवा काम आती है।

छिन्दौली गांव में किचिन गार्डन का अवलोकन

ताराबाई बताती हैं कि देसी बीज मिट्टी पानी और हवा के लिए अनुकूल होता है। उसमें प्रतिकूल मौसम को सहने की क्षमता होती है। अगर हवा आंधी से देसी धान का पौधा नीचे गिर भी जाता है तो वह बाली को ऊपर कर अपने को बचा लेता है। यानी सड़ता नहीं है, जबकि संकर (हाईब्रीड) धान में यह गुण नहीं होता है। देसी धान स्वादिष्ट, मुलायम और पाचक होता है।

प्रेरक संस्था के सामाजिक कार्यकर्ता रामगुलाम सिन्हा बताते हैं कि हमारा उद्देश्य आदिवासियों के जीवन को बेहतर करना है। इस तरह के प्रयास छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में किए जा रहे हैं। इनमें से एक गरियाबंद जिला भी है। यहां कमार आदिवासी हैं, जिन्होंने बैगा आदिवासियों की तरह ही कभी स्थाई खेती नहीं की है, लेकिन बदलते समय में आजीविका के लिए यह जरूरी हो गया है। इसके लिए मिश्रित खेती और बाड़ी को प्रोत्साहित किया जा रहा है। क्योंकि जंगलों से मिलने वाले खाद्य कंद-मूल, मशरूम और हरी पत्तीदार सब्जियों में कमी आ रही है।

लक्ष्मी बाई निषाद बीडर चलाते हुए

वे आगे बताते हैं कि गरियाबंद इलाके में वर्ष 2014 से तरकारियों ( सब्जियों) की खेती की जा रही है। कमार और गोंड के 3 सौ से ज्यादा परिवार यह काम कर रहे हैं। यह सब देसी बीजों से और पूरी तरह जैविक पद्धति से हो रहा है। इसमें हरी पत्तीदार सब्जियां, फल्लीदार सब्जियां, कंद, मसाले और औषधियुक्त पौधे शामिल हैं।

रामगुलाम सिन्हा बताते हैं कि कोविड- 19 के संकट के समय में जब दो महीने से साप्ताहिक बाजार बंद हैं तब लोगों के पास खाने के लिए पर्याप्त अनाज है। पौष्टिक अनाज मडिया, कोदो, कुटकी है। इस बीच आदिवासियों ने मडिया का पेज ( एक तरह का सूप) पिया। मडिया बहुत पौष्टिक होता है। उड़द की दाल थी, जिसे चावल के साथ खाते थे। चावल सरकारी राशन की दूकानों से भी मिला था। घर की सब्जी बाड़ी से सब्जियां मिल रही हैं। बैंगन, टमाटर, चेंच भाजी, करमत्ता भाजी, चौलाई भाजी, जरी भाजी, कांदा भाजी जैसी हरी पत्तीदार सब्जियां मिल रही हैं। लौकी और बरबटी मिल रही हैं। एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। खुद भी खा रहे हैं और पड़ोसियों को भी खिला रहे हैं। मई माह में जब पानी की सुविधा नहीं है तब भी इलाके में 250-300 सब्जी बाड़ी हरी भरी हैं जिनसे पर्याप्त सब्जियां मिल रही हैं। घर के बर्तन धोने के पानी का इस्तेमाल सब्जी बाड़ी में किया जा रहा है। जंगलों से कंद मूल और फल मिल रहे हैं। जंगल से डांग कांदा, जिसे आलू की तरह इस्तेमाल करते हैं। फुटू ( मशरूम), जो सुखाकर रखते हैं, उसका सब्जी बनाने में इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके साथ ही संस्था की तरफ से निःशक्त व शारीरिक रूप से असमर्थ ( जैसे दृष्टिहीन और मूक ) 2 सौ व्यक्तियों को राशन सामग्री का वितरण भी किया।

भिलाई गांव में देसी लौकी

वे बताते हैं कि इस खरीफ मौसम में हम कोदो, कुटकी, मक्का, कोसरा बाजरा जैसी पौष्टिक अनाजों पर ज्यादा जोर देंगे जिससे किसानों की खाद्य सुरक्षा हो, देसी बीजों का संरक्षण हो, जैव विविधता और पर्यावरण का संरक्षण हो। धान की जल्दी पकने वाली किस्मों का बीज किसानों को बीज बैंक से उपलब्ध कराया जाएगा। किसानों को बाजार से बीज खरीदने की जरूरत नहीं है, बाजार में यह बीज उपलब्ध भी नहीं हैं।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कोविड 19 के संकट के समय देसी बीजों की खेती और सब्जी बाड़ी से आदिवासियों को बहुत मदद मिली है। तालाबंदी के कारण जब साप्ताहिक बाजार बंद थे, रोजगार और पैसों का अभाव था, तब उनको पौष्टिक अनाज व सब्जी बाड़ी से सब्जियां की कमी नहीं हुई। गर्मी के मौसम में भी हरी सब्जियां मिल रही हैं। इससे किसान स्वावलंबी बने हैं और उनकी खेती में लागत बहुत कम हो गई है। उन्हें देसी बीजों से स्वादिष्ट भोजन भी मिल रहा है। जैव विविधता व पर्यावरण का संरक्षण भी हो रहा है। भानुराम नेताम जैसे कई किसान खेती कर रहे हैं। इस दिशा में और भी प्रयास किए जा रहे हैं, जो सराहनीय होने के साथ साथ अनुकरणीय भी हैं।  

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