ओडिशा हैंडलूम और बुनकरों की आजीविका (in Hindi)

By बाबा मायाराम (Baba Mayaram)onDec. 05, 2025in Livelihoods

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially Written for Vikalp Sangam)

(Orissa Handloom Aur Bunkaron Ki Aajeevika)

फोटो क्रेडिट- बाबा मायाराम

हथकरघे से बनी संबलपुरी साड़ियों की बाजार में काफी मांग है, इससे बुनकरों की आजीविका की सुरक्षा हो रही है

ओडिशा में ऐसे कई गांव हैं, जहां हथकरघे से संबलपुरी साडियां बनाई जा रही हैं। कुछ समय पहले तक एक ऐसा दौर भी था, तब इन साड़ियों की मांग कम थी, लेकिन अब इनकी बाजार में मांग बढ़ गई है। न केवल ओडिशा में इसकी मांग है, बल्कि देश भर में और दुनिया के बाजार में इन्हें पसंद किया जा रहा है। इससे बुनकरों की आजीविका तो सुनिश्चित हुई है, बल्कि उनके जीवन स्तर में भी सुधार आया है। शिक्षा, स्वास्थ्य व रहन-सहन का स्तर भी अच्छा हुआ है। हाल ही मैंने ओडिशा के बरगढ़ जिले के कुछ गांवों का दौरा किया। बुनकर समुदाय के लोगों से मिला, उनसे बात की, और उनके जीवन में झांकने की कोशिश की। 

हमारे गांवों में कृषि के साथ कई तरह के छोटे-छोटे रोजगार हुआ करते थे। लकड़ी और लोहे के खेती के औजार बनाना, लकड़ी के घर बनाना, खपरैल व मिट्टी के घर बनाना, मिट्टी व बांस के बर्तन बनाना, तेल व गुड़ बनाने का काम इत्यादि। इन सभी कामों को करने वाले कारीगर काफी हुनरमंद थे और कुछ अब भी हैं। इसमें बहुत से लोगों की आजीविका जुड़ी रहती थी। 

कुछ समय पहले तक देश में हथकरघे का काम खेती-किसानी के बाद सबसे बड़ा रोजगार हुआ करता था। पर कई कारणों से इसमें कमी आई है। लेकिन इसके बावजूद भी यह ऐसा महत्वपूर्ण हुनर व कौशल है, जिसकी बाजार में काफी मांग है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण संबलपुरी साड़ियां हैं, जिनकी बाजार में काफी मांग है। जो लोग हाथ के काम, सफाई, डिजाइन व श्रम  का महत्व समझते हैं, वे हथकरघे से बने कपड़े ही पसंद करते हैं। 

ओडिशा में संबलपुरी साड़ियां हथकरघे पर बनाई जाती हैं। सबसे पहले धागों को रंगना, फिर उन्हें करघे पर बुना जाता है। यह साड़ियां बंध तकनीक से बनाई जाती हैं। कारीगर धागों को विशेष पैटर्न में बांधते हैं। यह बांधा, रंग के उस हिस्से में बांध दिया जाता है, जिस पर रंग नहीं लगाना है। उसे बाद में दूसरे रंग से रंगा जाता है। यह एक जटिल प्रक्रिया है,और यह विशेष सावधानी व हुनर की जरूरत होती है। इस तरह रंगीन साड़ियां बनाई जाती है। रेशम व सूती दोनों तरह की साड़ियां बनाई जाती हैं।  

मैंने यहां बरगढ़ के पास दो गांवों के बुनकरों से बात की। उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले तक संबलपुरी साड़ियां का बाजार काफी सिमटा हुआ था। और यह ओडिशा व छत्तीसगढ़ तक ही सीमित था। लेकिन अब पूरे देश में इसकी मांग है, और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ही इसे पसंद किया जाता है। हाल ही में ओडिशा हैंडलूम को बढ़ावा देने के लिए अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को भी ओडिशा हैंडलूम का ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है। और भी प्रसिद्ध हस्तियों ने इसका प्रचार-प्रसार किया है।

कांटापाली गांव, बरगढ़ शहर से 7-8 किलोमीटर दूर है। यहां बुनकरी के अलावा कांसे व पीतल का काम भी होता है। लेकिन यहां मैं संबलपुरी साड़ियां बनाने वाले बुनकरों की बात ही करना चाहूंगा। इस गांव की आबादी करीब 10 हजार है और यहां करीब 40 से ज्यादा बुनकर परिवार हैं। सभी लोग बुनकरी से जुड़े हुए हैं। इस समुदाय के अधिकांश लोगों के घऱ पक्के कंक्रीट के हैं, और अब उनके बच्चे भी पढ़-लिख रहे हैं। 

घनश्याम मिहिर साड़ी बुनते हुए 

यहां मैं एक युवा बुनकर घनश्याम मिहिर से मिला। वे हथकरघे पर साड़ी बना रहे थे। उन्होंने बताया कि वे यह काम 10 साल से कर रहे हैं, और उन्होंने यह उनके पिता से सीखा है। इस काम को परिवार के लोग मिलकर करते हैं। उनके परिवार में 5 सदस्य हैं। 

उन्होंने बताया कि दो साड़ी तैयार करने में एक सप्ताह लगता है। सूत और रंग बाजार से खरीदते हैं। और बाकी सभी काम घऱ पर करते हैं। सूत की रंगाई और उसे बांधना, फिर हथकरघे पर उसकी बुनाई काफी मेहनत व कौशल का काम है। लेकिन अब यह सब उनकी आदत में है। वे हर माह की कमाई करीबी 25 हजार रूपयों के आसपास है। 

इसी गांव के ईश्वर मिहिर को इसके लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं। और उनके द्वारा बनाई साड़ियों की मांग देश में तो है ही, विदेशों में भी है। उनकी प्राकृतिक रंग और हाथ से बनी साड़ियों को काफी पसंद किया जाता है। बाजार के हिसाब से डिजाइन भी बहुत अच्छी होती है। वे सिल्क व सूती दोनों साड़ियां बनाते हैं। 

अनंत मिहिर व सुनील सूत सुखाते हुए

इसी प्रकार, यहां के मोहन मिहिर का पूरा परिवार इस काम में लगा है। उनके एक बेटे अनंत ने सीमेंट फैक्ट्री में कुछ समय काम किया था, लेकिन उसे वह काम रास नहीं आया। जब उन्होंने संबलपुरी साड़ियां बनाने का काम संभाला तो उन्हें यह बहुत अच्छा लगा। उनका छोटा भाई सुनील भी इसी काम में जुड़ गया। अब परिवार के सभी 5 सदस्य इस काम में लगे हैं। अब इस घर की नई सदस्य और बड़े बेटे की बहू भी इस काम में जुड़ गई है। यानी कुल मिलाकर इस काम में घर के 5 सदस्य लगे हुए हैं, और उनकी इससे अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। करीब 20 से 25 हजार प्रतिमाह की कमाई हो जाती है। 

मोहन मिहिर का पूरा परिवार

सत्यनारायण मिहिर के घर में भी साड़ियां बनाई जाती हैं। उनकी पत्नी सुरेश परी, दो बेटियां दिव्यानी और रजनी भी इसी काम में जुड़ी हैं। उनका एक बेटा भी है। उन्होंने बताया कि इस काम को उन्होंने पिताजी से सीखा था, डिजाइन के लिए प्रशिक्षण भी लिया। अब उनकी इससे अच्छी आजीविका चल रही है। 

हैंडलूम पर साड़ी बुनती दिव्यानी

इसी प्रकार, मैंने सरकंडा गांव का दौरा किया। इस गांव की आबादी करीब 6 हजार है। यहां करीब ढाई से तीन सौ परिवार बुनकर समुदाय के हैं। यहां दो तरह से काम होता है। एक वे बुनकर हैं, जो सूत खरीदकर खुद साड़ियां बनाते हैं और दूसरे बुनकर वे हैं, जो मजदूरी से साड़ियां बनाते हैं, उन्हें सूत देकर कोई व्यापारी साड़ियां बनवाते हैं। यहां भी बड़ी संख्या में बुनकर हैं और आत्मनिर्भर हैं।

रहटा पर कौंडा भराई 

यहां के दिलेश्वर का परिवार खुद सूत लाता है और साड़ियां तैयार करता है। उनके घऱ में 6 सदस्य हैं, जो इस काम में लगे हैं। वे सप्ताह में दो साड़ियां तैयार करते हैं, और उनकी कमाई करीब 7 हजार के आसपास है। जबकि एक अन्य घनसुंदर का परिवार मजदूरी से साड़ियां बनाता है, जिनकी कमाई थोड़ी कम 24 हजार के आसपास है।

यहां से सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्र मिहिर संबलपुरी साड़ियों के बाजार के विस्तार में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की विशेष भूमिका है। सरकार ने इन स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दूसरे राज्यों में प्रदर्शनी लगवाई। वहां भी संबलपुरी साड़ियों की स्टॉल लगाई, प्रचार-प्रसार किया, जिससे इनकी मांग बढ़ी है।

वे आगे कहते हैं कि इसके साथ, जगह-जगह कार्यक्रम और खुले बाजार की नीतियों ने भी इसे बढ़ावा दिया है। संबलपुरी साड़ियों की मांग देश भर में हो गई है, इसलिए बुनकरों की आजीविका भी अच्छी खासी चल रही है। इन साड़ियां की मांग इसलिए भी बढ़ रही है, क्योंकि इनकी डिजाइन, रंग सभी कुछ उपभोक्ताओं को पसंद आते हैं। पावरलूम यहां बहुत कम हैं। क्योंकि उनमें डिजाइन का काम ज्यादा नहीं किया जा सकता है।

ओडिशा में कई ऐसे गांव हैं, जिसमें हथकरघे पर बुनकरी का काम होता है। सामाजिक कार्यकर्ता व किसान नेता लिंगराज का कहना है कि हमें खेती के साथ इन पारंपरिक हस्तकला को भी बचाना जरूरी है। यह न केवल हमारी पारंपरिक धरोहर है,बल्कि इससे बड़ी आबादी की आजीविका भी जुड़ी हुई है। आज खेती भी संकट में है, इसीलिए इस ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

संबलपुरी साड़ियां

हम सब जानते हैं कि हथकरघा को गांधी जी ने स्वतंत्रता की लड़ाई से जोड़ा था। आत्मनिर्भर व स्वावलंबी से जोड़ा था। गांधी जी ने चरखा को काफी महत्व दिया था। इस परिप्रेक्ष्य में गांधी जी सोच बारे में प्रासंगिक है। वे गांवों को स्वावलंबी बनाना चाहते थे। लेकिन अंग्रेजी राज के दिनों में भी हथकरघा बुनकरों के कार्य को बहुत क्षति पहुंचाई गई क्योंकि विदेशी सरकार ने अपने कारखानों में बने सामानों की बिक्री करवाने की और स्थानीय दस्तकारों व बुनकरों की तबाही की नीतियां अपनाईं।

गांधीजी कहते थे कि नई तकनीक व उत्पाद का प्रसार केवल मुनाफे के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है। गांधीजी ने सबसे बड़ी कसौटी बताई, वह थी रोजगार की कसौटी। यह सोच आज भी प्रासंगिक हैं।

ग्लोबल वार्मिंग और मौसम बदलाव के इस दौर में एक और बात महत्वपूर्ण है कि किसी भी नए उत्पाद व तकनीक का स्वास्थ्य और पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है। कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी आम बात है। मशीनों के उपयोग से पर्यावरण पर भी उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

हमारे देश में केवल खेती से ही देश के लोगों की आजीविका नहीं चल सकती। खेती के पूरक के रूप में छोटे-मोटे काम धंधे भी जरूरी है। लेकिन हमने औद्योगिकीकरण के चलते बड़े उद्योगों को बढावा दिया है और छोटे उद्योगों को खत्म किया है। इससे इन उद्योगों का बाजार में कब्जा हो गया और उन्हें इन छोटे उद्योगों में लगे लोगों का सस्ता श्रम भी उपलब्ध हो गया।

मशीनीकरण भी एक कारण है, जिससे लोग बडी संख्या में बेरोजगार हो रहे हैं। हैंडलूम की जगह पावरलूम ने ले ली है। इसी प्रकार खेती में मशीनीकरण से बडे पैमाने में लोगों को खेती से अलग होना पड रहा है। खेत की जुताई से लेकर कटाई तक मशीनीकरण से काम होने लगा है जिससे लोगों को खेती में काम नहीं मिल पा रहा है। 

इस मद्देनजर हमें अपने हस्तकार, हस्तशिल्प और बुनकरों को बचाना और उनके काम को बचाना जरूरी है।  देश में हाथ का कार्य, हुनर बचा रहे तभी गरीबी और बेरोजगारी दूर होगी। गांव में लोगों को रोजगार उपलब्ध हो, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पानी की व्यवस्था हो और लोगों को पलायन न करना पड़े। हमें आज ऐसी सोच की जरूरत है जिसमें गरीब, पिछड़े व सबसे कमजोर तबके के लोगों की स्थिति में सुधार हो। खेती-किसानी का संकट दूर हो और परंपरागत रोजगारों को फिर से खड़ा किया जा सके। 


लेखक के बारे में

बाबा मायाराम, स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं, वे लम्बे समय से विकास व पर्यावरण के मुद्दों पर लिखते हैं.

लेखक से संपर्क करें.

Story Tags: , , ,

Leave a Reply

Loading...