महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की पहल (In Hindi)

By बाबा मायाराम onJul. 17, 2025in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially Written for Vikalp Sangam)

(Mahilaon ko Atmanirbhar Banane Ki Pahal)

सभी फोटो – हेमलता राजपूत

महिलाओं के साथ भेदभाव के खिलाफ और बराबरी के लिए पहल की जा रही है। उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है

“गांवों में अब भी महिलाओं के साथ कई तरह के भेदभाव होते हैं। यह आम तौर पर परिवार और समाज में देखने को मिलते हैं। इसी के मद्देनजर हमारी संस्था ने भेदभावों के खिलाफ अभियान छेड़ा है। और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं।” यह छत्तीसगढ़ की श्रीजन कल्याण समाजसेवी संस्था की हेमलता राजपूत थीं।

इस बदलाव की शुरूआत वर्ष 2016 से हुई है। श्रीजन कल्याण समाजसेवी संस्था का गठन इसी वर्ष हुआ है। कुछ वर्ष पहले संस्था का कार्यालय भी बन गया है। इसकी सभी महिला कार्यकर्ता है, जिनमें विष्णुप्रिया ठाकुर, हिना साहू, दुलारी खैरवार, नीलम ठाकुर इत्यादि।

लेकिन हेमलता, संस्था के गठन के पहले से ही इस दिशा में सक्रिय रही हैं। उनकी सामाजिक कामों में शुरूआत प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता शशि सायल के साथ हुई है। छत्तीसगढ़ महिला जागृति संगठन के साथ काम किया है। इस संगठन ने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रशिक्षण दिया। घरेलू कामगार और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को भी संगठित किया। 

छत्तीसगढ़ का इलाका विविधता के लिए जाना जाता है। यहां पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक विविधता काफी है। यहां विपुल खनिज संपदा के साथ वन संपदा भी बहुतायत में है। मध्य क्षेत्र का मैदानी भाग, जहां से महानदी गुजरती है, वह धान का इलाका है। यही मुख्य रूप से धान का इलाका है। यहां राइस मिलें हैं।

महासमुंद जिला, जो श्रीजन कल्याण संस्था का कार्यक्षेत्र है, भी इसी के अंतर्गत आता है। यहां धान की कई किस्में हैं। इसके साथ दलहन, तिलहन, कंद-मूल, फुटू (मशरूम) और फल-फूल, हरी पत्तीदार सब्जियां इत्यादि भी हैं। हालांकि यहां जंगल क्षेत्र भी है, जहां की आबादी की आजीविका जंगल से जुड़ी है। हालांकि धान की संकर (हाईब्रीड) किस्मों के प्रचलन के कारण देसी धान की किस्में लुप्त हो रही हैं।

हेमलता राजपूत बताती हैं कि “ग्रामीण समाज में महिलाओं के साथ कई तरह भेदभाव देखे जाते हैं। घरेलू हिंसा उनमें एक है। शराब पीकर महिलाओं के साथ मार-पीट की घटनाएं आम हैं। महिलाओं को घर के कामों तक सीमित रखा जाता है। लड़कियों के साथ पढ़ाई मे भेदभाव किया जाता है। लड़कियों को वहीं तक पढ़ाया जाता है, जहां तक गांव में स्कूल होता है। उनको आगे पढ़ने नहीं भेजा जाता है।”

महिला अधिकार सम्मेलन

वे आगे बताती हैं कि “लड़कियों के साथ कई तरह के भेदभाव कृत्रिम रूप से होते हैं। उनके कपड़े, व्यवहार, शिक्षा। समाज की सोच, गैर बराबरी पैदा करती है। सामाजिक लिंगभेद पितृसत्तात्मक है। यानी वह पुरूष की सत्ता दर्शाता है। और पुरुष को अहमियत देता है। हम इसके खिलाफ हैं, इसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं। इस स्थिति में बदलाव भी आ रहा है। सरकार, समाज और स्वैच्छिक संगठनों के प्रयास से इसमें सुधार आ रहा है।”

उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ऐसी पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए काम करती है। आपस में मामले सुलझाना, कानूनी मदद देना इसमें शामिल है। संस्था द्वारा कानूनी मार्गदर्शन केन्द्र चलाया जाता है, जिसमें लोग समस्याएं लेकर आते हैं। इसके अलावा, गांव में बैठकर के दौरान भी पीड़िता की पहचान की जाती है। उनको परामर्श दिया जाता है। परिवार से मिलकर पूरे मामले की जानकारी ली जाती है। अगर परिवार व समाज के स्तर पर मामला सुलझाने की कोशिश की जाती है, अगर वहां मामला नहीं सुलझा तो परिवार परामर्श केन्द्र या कोर्ट भेजा जाता है। 

सरकारी योजनाओं के लिए ज्ञापन

भोरिंग गांव की महिला ने बताया कि उनका पति का बीमारी में निधन हो गया। उसके तीन बच्चे थे। उसे ससुराल में प्रताड़ित किया जा रहा था। न तो उसे घर में रहने दिया जा रहा था और न ही परिवार की सम्पत्ति में हिस्सा दिया जा रहा था। यह केस में कानूनी मदद में सहयोग किया गया। अंततः महिला केस जीत गई। उसे जमीन भी मिली और घर भी। 

हेमलता राजपूत बताती हैं कि हम ऐसे माहौल बनाने की कोशिश करते हैं कि जिसमें लोगों को सभी तरह के नशीले पदार्थों, शराब और तम्बाकू, गुटखा आदि छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। 

शराबबंदी की मांग

इसके साथ सब्जी –बाड़ी (किचिन गार्डन), जैविक खेती, और जंगलों को फिर से हरा-भरा करने की कोशिश की जाती है। संस्था ने जैविक खेती को पुनर्जीवित करने का अग्रणी काम किया है। इसने किसानों को जैविक खेती, प्राकृतिक खेती करने, जंगल को हरा-भरा करने, पारंपरिक बीज संरक्षण, जैविक खाद, जैव कीटनाशक बनाने की दिशा में प्रेरित करने का काम किया है। यह ऐसे समय में जब छोटे किसानों को बाजार की मांग को पूरा करने के लिए एकल खेती की ओर धकेला जा रहा है। 

यहां की महिला किसान पारंपरिक खेती की ओर लौट रही हैं। देसी बीजों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जिसमें पारंपरिक देसी बीज, पारंपरिक व्यंजन और जंगल से मिलने वाले खाद्य पदार्थ को प्रदर्शित किया जाता है। 

संस्था ने गांवों में देसी बीज बैंक बनाने और जैविक खेती के काम को प्रोत्साहित किया है। कुहरी गांव में श्रीजन सामुदायिक बीज बैंक हैं। यहां देसी धान की 19 प्रजातियां, दलहन की 13, उड़द की 4, मूंग की 4, कुलथी की 2 और झुरगा की 2 प्रजातियां हैं। इसके अलावा, कई तरह हरी भाजियों की बीज हैं। लाल भाजी, चैंच भाजी, खेड़ा भाजी, पटवा भाजी, अमाड़ी भाजी, पालक भाजी, मखना भाजी, कुसुम भाजी, चौलाई भाजी इत्यादि। बीज बैंक की शुरूआत वर्ष 2016 से हुई है। इसकी संचालन समिति में 10 सदस्य हैं। यहां से किसानों को बीज दिया जाता है, जिसे उन्हें फसल आने पर वापस करना होता है। 

कुहरी गांव की कौशल्या बाई कहती हैं कि देसी बीजों में रोग ज्यादा नहीं लगता है, खाने में भी स्वादिष्ट होता है। अगर फसलों में कीट प्रकोप लगता भी है तो जैव कीटनाशक बनाकर छिड़कते हैं। जिसे वे स्थानीय पौधों की पत्तियों से तैयार कर लेते हैं। कर्रा, आक, नीम, कड़वा रोहना, बिरहा आदि की पत्तियों से जीवामृत बनाया जाता है। इसके लिए बोड़रा, बरबसपुर, खैरा, कोमा आदि गांवों में जैव कीटनाशक व जैव खाद बनाने का प्रशिक्षण शिविर लगाया गया। कुहरी के साथ बांसकुडहा, बिरगिरा, बोड़रा, घोघीबाहरा, सेनकपाट, कुसेराडीह, केशलडीह, वनसिवनी, कर्राडीह गांव में भी जैविक खेती होती है।

बोडरा गांव की श्यामा ध्रुव बताती है कि हम देसी बीजों के साथ धान की खेती करते हैं। रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते है, जिससे हमारी लागत भी कम हो जाती है। इससे हमें आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है।

निरमा पैकेजिंग करते हुए

इसके अलावा, जंगल बचाने व हरियाली बढ़ाने के लिए गांवों की महिलाएं आगे आईँ हैं। इसमें कुछ आंशिक सफलता मिली है, और इस दिशा में प्रयास चल रहा है। विशेषकर, इस क्षेत्र की महिलाओं ने ग्राम सभा, स्वयं सहायता समूहों व सामूहिक एकता के बल पर इस मुहिम को आगे बढ़ाया है। यह हरियाली बढ़ाने के साथ महिला सशक्तीकरण का भी अच्छा प्रयास है। 

जंगल में पौधारोपण के लिए लोहारडीह गांव में पौधशाला बनाई गई थी। इस पौधशाला में महुआ, तेंदू, आम, कोसम, इमली, कैथ,हर्रा,बहेड़ा, इमली इत्यादि की पौध तैयार की गई थी। घोघीबाहरा में कई पौधे रोपे गए थे। इसके अलावा, पेंड्राडीह, घोघीबाहरा, बंजारी, आमाझोला, पतईमाता, ठुमसा, बोडरा, लोहारडीह में पौधारोपण किया गया था।

वृक्षारोपण की तैयारी

उन्होंने बताया कि जंगल से वनोपज के साथ ताजी पत्तीदार सब्जियां, कंद मूल व फल, फूल पत्तियां व मशरूम भी मिलते हैं। कुझियारी, चरौंटा, बोहार,खेकसी, पीपरी, कोसम, कोलियारी भाजी जंगल से मिलती है।घनबहेर फूल, सेमरा फू, नीम फूल, अमली फूल इत्यादि। कई तरह के फुटू मिलते हैं- जैसे बियासी फुटू, भिमोरा फुटू, भदेली, घुटुल, दशहरा फुटू, कनकी फुटू इत्यादि।

वे आगे कहती हैं कि भेदभाव से पीड़ित महिलाओं के लिए कानूनी और संवैधानिक अधिकार हैं, पर यह तभी सार्थक होते हैं जब वास्तविक जीवन की स्थिति को बदलने के लिए प्रयास किए जाएं। यही हमारी कोशिश है। महिलाओं को सम्मानजनक तरीके से जीने के लिए उन्हें आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है, और यही कोशिश उनकी संस्था कर रही है।

कुल मिलाकर, घरेलू हिंसा के खिलाफ अभियान, स्वास्थ्य जागरूकता, किचिन गार्डन, जैविक खेती, सामुदायिक वन अधिकार दिलवाने में मदद करना और महिला नेतृत्व को गांवों में उभारने की कोशिश करना है। हेमलता राजपूत कहती हैं कि अगर आधी आबादी सशक्त बनेगी तो परिवार और समाज भी सशक्त होगा। यह पहल सराहनीय होने के साथ प्रेरणादायक भी है।


लेखक के बारे में

बाबा मायाराम, स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं, वे लम्बे समय से विकास व पर्यावरण के मुद्दों पर लिखते हैं.

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