(Andaman Mein Satrangi Jhanda Kaise Lahrai?)
विकल्प संगम खातिर खास लिखल (Specially written for Vikalp Sangam)
अंग्रेजी से अनुवाद स्वर्ण कांता के बा.
“लरिकाइए से लागत रहे अलग बानी. पोर्ट ब्लेयर आवे से पहिले हम ई सब ना त जानत रहीं, ना समझत रहीं,” अरसु एंथनी कहली. “इहंवा अइनी त हमरा आपन जइसन लोग मिलल. इहंई इंटरनेट से जादे जुड़नी, बहुत कुछ जाने-समझे के मौका मिलल.”
अंडमान आ निकोबार द्वीप में रहे वाली 28 बरिस के अरसु के आपन घर दुनिया के सबले सुन्नर ठिकाना लागेला. बाकिर ऊ हंसत कहेली, “हमरा बेंगलुरू भी नीमन लागेला, घूमे-फिरे में बड़ा मजा आवेला.”
अरसु खुशमिजाज स्वभाव के बाड़ी, मुंह झांप के खूब हंसेली. अंडमान के एह द्वीप पर ऊ छोट-छोट बात में आपन खुसी खोज लेले बाड़ी. ऊ इंहई रहेली, जेकरा पोर्ट ब्लेयर पुकारल जाला, आउर डायरेक्टरेट ऑफ शिपिंग सर्विस के सरकारी दफ्तर में ऑफिस मैनेजर के काम करेली.
“लोग हमरा गे मानेला. पता ना हम ट्रांसजेंडर बानी कि ना, बाकिर हमरा जनाना जइसन जियल जादे ठीक लागेला. लइकी के पहचान संगे हम जादे सहज रहिला. बाकिर ऑफिस में लोग हमरा जब लइका बोलावेला, तबो जवाब दीहिला. जादेतर लोग के लागेला हम ट्रांसमेहरारू बानी. असल में ई बात नइखे. काहेकि हम कवनो ऑपरेशन नइखी करइले. हम त बस मेहरारू वाला कपड़ा सब पहरिला.”


ट्रांसजेंडर पहचान-पत्र बनवावे खातिर अंडमान-निकोबार से अबले मात्र दू लोग अरजी लगवले बा. ई जानकारी खुद सामाजिक न्याय आ सशक्तिकरण मंत्रालय के पोर्टल से मिलल ह.
अंडमान-निकोबार द्वीप के जिला कार निकोबार के रहे वाली अरसु सन् 2004 में सुनामी अइला के बाद पोर्ट ब्लेयर आके बस गइली. ऊ बतावत बाड़ी, “बहुते छोट रहीं. सुनामी आइल त अइसन तबाही भइल कि घर-दुआर छोड़े पड़ल. अब हम आपन परिवार संगे रहतानी. ऊ लोग हमार सच जानेला आउर साथ देवेला.”
मिलनसार स्वभाव के अरसु के ढेर दोस्त लोग बा. ओह में से एगो 32 बरिस के प्रमीका (प्रेम कुमार) बाड़न. दुनो लोग पहिल बेर 2017 में फेसबुक पर मिलल रहे. ओकरा दू बरिस बाद आमना-सामना भइल.
“अरसु सीधा हमरा लगे अइली आ अपना बारे में बतावे लगली,” प्रमीका कहलन. “बड़ा खुलल स्वभाव बा उनकर. हम त कवनो अनजान से अइसे ना बतिया सकीं. तनी संकोच होखेला.”
प्रमीका गे बाड़न. उनको मेहरारू वाला कपड़ा पहिरल पसंद बा. बाकिर भगवान से जइसन देह मिलल बा, ऊ ओकरे में खुस बाड़न. प्रमीका आ अरसू दूनो लोग हंसी ना रोक पाइल, जब प्रमीका बतइलन, “जब से होस संभरनी, बोले-बतियावे के तरीका, चाल-ढाल सब लइकिए जइसन रहल.”
अरसु टोकली, “हां, ई सांच बात ह.”
दूनो प्राणी मोंगोलॉइड समुदाय से आवेला, जे निकोबारी समाज के हिस्सा हवे. अरसु खुसी-खुसी बतइली, “असल में हमनी दूर के रिस्तेदारो हईं.” एह केंद्र शासित प्रदेस के आबादी जहंवा 4,54, 192 बा, उहंई शोमपेन जइसन दोसर निकोबारी समुदाय सहित अरसु आ प्रमीका लोग के समुदाय के आबादी मात्र 42,000 बा.
सन् 2004 में सुनामी अइला के बाद तेरह बरिस के प्रमीका पोर्ट ब्लेयर आ गइल रहस. “हम आपन पूरा परिवार, बाऊजी, माई आ बहिन लोग संगे इहंवा आ गइनी. कुछ दिन खातिर लउटल रहीं, बाकिर फेरु हम जवाहरलाल नेहरू राजकीय महाविद्यालय, पोर्ट ब्लेयर में ट्रैवल मैनेजमेंट में ग्रेजुएशन करे खातिर फेरु आ गइनी. इहंवा जय होटल में काम करे लगनी. पहिला तनखा 7,000 रुपइया के मिलल रहे,” ऊ तनी गुमान करत बतइलन. आजकल प्रमीका श्री विजयापुरम में टीएसजी एमराल्ड होटल में रिसेप्शनिस्ट बाड़न.
“हमार परिवार हर कदम पर हमरा साथे रहल बा. 2010 में बाऊजी के मरला के बादो माई आ बहिन लोग हमरा अकेला ना छोड़लक. ऊ लोग हमार पसंद-नापसंद समझत रहे. माई आ बहिन संगे हम दू कोठी वाला किराया के घर में रहिला. ऊ लोग जानता हम ‘जनानी’ जइसन बानी, ऊ लोग इहो जानता कि हम गे बानी. बाकिर हमनी एह सब पर कबो चरचा ना करीं. ऊ लोग हम जइसन बानी, वइसहीं अपना लेले बा. ऊ लोग हमरा प्यार करेला. ऊ लोग कबो हमार जेंडर आ तनी ऊंच जनाना जइसन आवाज पर टीका-टिप्पणी ना करे. छोट रहीं त परिवार के चिंता होखत रहे. बाकिर अब बुझ गइल बा लोग कि हम का करतानी. ऊ लोग के हमरा पर पूरा भरोसा बा.”
ऊ कहलन, “हमरा आपन प्रमीका नाम (प्रेम कुमार से) जादे पसंद बा, बाकिर हम अपना के पुल्लिंग के रूप में भी कहिला. अइसे त सभे के हमार गे होखे के बारे में पता बा. बाकिर काम पर त ना, हां कवनो बड़ा मौका होखेला त क्रॉस ड्रेस (कवनो दोसर जेंडर खातिर समाज के तय कइल कपड़ा) करिला, चाहे बढ़िया से तइयार होखिला. हमरा अच्छा लागेला जब पार्टी सब में दोसरो लोग हमरे जइसन देखाई देला, चाहे हमरे जइसन कपड़ा पहिरेला. मेहरारू जइसन ओढ़े-पहिरे में आराम लागेला. चौबीस, पच्चीस साल के रहीं त आपन लिंग बदले के बारे में सोचत रहीं. फेरु लागल ई देह त भगवान के देहल बा, हम एकरे में खुस बानी.”
प्रमीका बतावत बाड़न, “सन् 2018 में हमरा एलजीबीटीक्यूआई के बारे में आउरो जानकारी मिलल. यूट्यूब पर ड्रैग क्वीन सुशांत दिवगीकर (रानी को-हे-नूर) जइसन बहुते लोग के बारे में जननी. ई सब लोग से हमरा बहुते प्रेरणा मिलल.”
दुनो प्राणी मानेला अंडमान-निकोबार द्वीप में क्वियर लोग के गिनती जादे नइखे, आउर इहो कि लोग के बीच घुलल-मिलल आ भरोसा बनावल कठिन बा. “हमनी हर हफ्ता शनीचर-एतवार के दिन संगे बइठिला. बाकिर इहंवा एलजीबीटीक्यूआईए समुदाय के मदद करे वाला कवनो सिस्टम नइखे. लोग सामने त हमनी से कहेला कि ऊ लोग साथे बा, बाकिर पीठ पीछे कुछ आउर कहे आउर करेला. हम ई सब भुगत चुकल बानी. गे भइल इहंवा समाज में एक तरह के कलंक मानल जाला. लोग के ना बुझाला कि कोई गे काहे बा, ऊ लोग के लागेला कि ई चीज त बदलल जा सकेला. हम जब बाहिर निकलिला, भारत जाइला त जादे चैन महसूस करिला. उहंवा हमरा अपना जइसन गे लोग भेंटाला, जे खुल के जी रहल बा. लागेला एगो अलग दुनिया में आ गइल बानी.”
द्वीप पर छुट्टी बितावे खातिर आइल लोग डेटिंग ऐप के सहारे आपस में आसानी से मिल-जुल रहल बा. ओह में केकरो नया दोस्त मिल जाला, त केकरो मनपसंद साथी. हां, लरिकाई में प्रमीला आ अरसु के आपन पहचान के चलते ताना सुने के पड़त रहे. बाकिर आज ओह स्थिति से ऊ लोग आउर बरियार होके निकलल बा. अरसु बतावत बाड़ी कि ऊ प्रमीका से बेसी डेटिंग ऐप पर रहेली. उनका नया-नया लोग से मिले में मजा आवेला.
प्रमीका फरिया के कहे लगलन, “इहंवा लोग आपन पहचान जाहिर करे से डेराला. हमरा स्थायी रिस्ता बनावे में बिस्वास बा, बाकिर इहंवा रउआ ऊ कइसे मिली? जादेतर मरदाना लोग अपना बारे में चुप्पी लगइले रहेला, आपन गे होखे के बात ना खोले. हां, ऊ लोग अंतरंग संबंध जरूर चाहेला. बाकिर जादेतर अइसन मरद लोग या त बियाहल बा, चाहे आपन पहिचान बतावे में डेराला.” हमरा सच्चा साथी चाहीं. रउआ जदि केहू दोसरा से प्रेम बा, त हमरा संगे मत आईं. हम केकरो जिनगी में दोसर नंबर पर नइखी रहे के चाहत. हमरा कबो सच्चा प्यार ना मिलल. एह द्वीप पर एक्को क्वियर जोड़ा नइखे. बड़ा अकेला लागेला.”
अरसु आ प्रमीका दुनो लोग एक-दोसरा संगे मस्त बा. बाकिर प्रमीका के रात के ड्यूटी होखे चलते ओह लोग के मिले-जुले के जादे मौका ना मिले. अइसे ऊ लोग दिन भर आपस में फोन पर बतियावत रहेला. अंडमान में क्वियर समुदाय छोट बा, एह चलते दोस्ती आ एक दोसरा के सहारा देवल बहुत जरूरी बा.
अरसु के कहनाम बा, “हम बस एतने चाहत बानी लोग एलजीबीटीक्यू समुदाय के बारे में जानो. इहंवा बहुते लोग एकरा बारे में ना जाने. लोग गे आदमी के खराब नजर से देखेला, बाकिर हम परवाह ना करीं. नौकरी करतानी, कमात बानी, छोट सोच वाला लोग से हमरा कवनो मतलब नइखे. तरह-तरह के नसीहत देवे में लोग के बड़ा मजा आवेला. केहू कही अइसन काहे बाड़ू, त केहू पूछी वइसन काहे बाड़ू. हमरा अब फरक ना पड़े. अपना हिसाब से जी रहल बानी, आ खुस बानी.”
कुल मिला के: भारत के क्वियर के प्रति दोस्ताना सहर कइसे बनल?
बेंगलुरु में जनमल आ पोसाएल संजय कुमार मनोवैज्ञानिक (साइको थेरेपिस्ट), आ लंदन के नाज प्रोजेक्ट में काउंसिलिंग सर्विस के प्रमुख बाड़न. नाज प्रोजेक्ट क्वियर लोग खातिर काम करेला. ऊ मोटा-मोटी 30 साल से आपन पहचान संगे समाज में जी रहल बाड़न. उनका अपना पर गुमान बा. प्रेम आ अरसु के हालात से ऊ अनजान नइखन. उनका पोर्ट ब्लेयर 90 के दसक वाला बेंगलुरू जेका लागेला.
“पोर्ट ब्लेयर के नाम सुनते हमरा बेंगलुरु के आपन पुरान दिन सब इयाद आवे लागल. सन् 1997 में, जब आपन पहचान के बारे में खुले लगनी, हमरा क्यूबन पार्क के एगो गे के बारे में पहिल बेर सुने के मिलल. समझ गइनी ई सब हमरा पहिले से चल रहल बा!” ऊ हंसत कहलन. “क्यूबन पार्क में प्रेमी लोग मिलत रहे, भले ऊ लइका होखे, लइकी होखे, समलैंगिक, ट्रांसजेंडर चाहे कुछुओ आउर होखे. खाली इहंई ना, महात्मा गांधी पार्क आ पूरा गार्डन वॉकवे, जेकरा क्वीन्स वॉक कहल जाला, में प्रेमी जोड़ा के भीड़ लागल रहत रहे. इयाद बा क्वीन्स वॉक के पूरा रस्ता में बोगनवेलिया फूल बिछावल रहत रहे.” लोग एक-दोसरा से मिले आ जोड़ा बनावे. ओह जमाना में अपना जइसन खोजल आसान ना रहे. बाकिर समय के साथे गे समुदाय अपना के खोले लागल, एक-दोसरा के जाने-पहचाने लागल. इहे सोच-विचार चलत रहत रहे, एतवार के दिन सांझ में कहंवा मिलल जाव, ताकि भीड़ हमनी के पहचान ना सको. मोटरसाइकिल चाहे कार से घूमे खातिर कवन बढ़िया जगह रही? क्वियर, अंग्रेजी भाषी, कन्नड़ भाषी. हर तरह के लोग जुटे! आ पोर्ट ब्लेयर जइसन, ई जगह एकदम गुप्त रहत रहे.”
संजय इयाद करत बाड़न कि बेंगलुरू में ओह घरिया मोबाइल फोन, इंटरनेट, चाहे डेटिंग ऐप के चलन ना रहे. पोर्ट ब्लेयर के हालत देख के उनका आपन दिन इयाद आवे लागल. “उहे डेरात, आंख चोरावत लोग. पते नइखे कि आज जेकरा से भेंट भइल, ऊ के ह… ई सब देख के हमरा 20 बरिस पहिले वाला बेंगलुरू इयाद आवे लागल. आपन जमाना में हमनी भीड़-भाड़ वाला बस में मिलीं. उहंई एक-दोसरा के देखीं, इशकबाजी करीं, तनी-मनी छुए के कोसिस करीं. तब इंटरनेट त ना आइल रहे, बाकिर एगो मेलजोल आ साथी वाला भाव रहत रहे. आज ई गायब बा. हां, हमनी खातिर ऊ दौर कठिन रहे. तब ना त आज जेका इंटरनेट पर भेंट होखत रहे, ना फोन पर बात. बाकिर तब जदि हम कवनो मामला में मदद करे लायक बानी, त जरूर मदद करत रहीं. अब त ई सब बहुत कम नजर आवेला. आज ऐप जादे, आ आपसी जुड़ाव कम हो गइल बा.”
बाकिर उनकर इहो कहनाम बा कि भारत के मैदानी इलाका में क्वियर समुदाय के सहर-सहर घूमे आ आपस में भौगोलिक रूप से जुड़े के सहूलियत बा. ई सहूलियत अंडमान में नइखे. बेंगलुरू में क्वियर समुदाय बड़ा रहे, मिले-जुले के मौका जादे रहे.
“पता ना काहे, अभियो लागेला बेंगलुरू में गे लोग जादे खुसकिस्मत रहे. वरिष्ठ लोग आपन घरे पार्टी करे. उहंवा रउआ बेझिझक केकरो से मिलीं, रोमांटिक होखीं, चाहे प्रेम संबंध बनाईं. पुलिस के तनिको डर ना रहत रहे, काहेकि तवनो घरिया समलैंगिकता अपराध रहे. समझ सकतानी पोर्ट ब्लेयर में केतना अकेला बुझात होई. इहंवा त होटल के कमरा में चुप्पे, चाहे डेटिंग ऐप के जरिए मिले के अलावा आउर कवनो चारे नइखे.”
खाली भारते ना, दुनिया भर के क्वियर समुदाय एह तरह के चुनौती के सामना करता. ऊ आपन हक आ पहचान खातिर लड़ रहल बा आ हरमेसा लड़त रही. हमनी जेकरा प्राइम मंथ कहिला, ओकर सुरुआत न्यूयॉर्क सिटी में विरोध प्रदर्शन से भइल रहे, जेकरा स्टोनवॉल रायट्स भी कहल जाला.
संजय इहो बतइलन कि ऊ लंदन में रहस, त उहंवा गे लोग के खुफिया बार होखत रहे. ई बात खाली गे लोग के ही पता रहे. ऊ लोग आपस में कुछ खास शब्द बोलत रहे, जे क्वियर लोग के एक-दोसरा के पहिचाने में मदद करत रहे. “ऊ लोग दोहरा जिनगी जियत रहे, आपन तरह-तरह के नाम रखले रहे. पोर्टो ब्लेयर में आज उहे सब हो रहल बा. मरद लोग आपन क्वियर पहचान जाहिर करे, चाहे कवनो तरह के संबंध में जाए से बचता. लंदन में अभियो गे लोग दू तरह के जिनगी जियता, आपन पहचान खातिर अलग नाम रखले बा. लंदन के साउथ एशियन क्वियर समुदाय में अभियो कुछ लोग आपसी संपर्क खातिर अलग नंबर रखले बा. अरसु आ प्रेम लोग जे आज झेल रहल बा, क्वियर लोग बहुत बरिस से ई सब सहन कर रहल बा. सब कुछ बहुते तकलीफ देवे वाला बा.”
एतना के बावजूद संजय के आस नइखे टूटल. उ कहेलन बेंगलुरू में 2025 में जे क्वियर इवेंट्स आ रैली भइल, ऊ 1997 में एकरा बारे में कल्पनो ना कर सकत रहस. अब त बेंगलुरू क्वियर लोग के अगुआ सहर बन गइल बा. “उम्मीद बा पोर्ट ब्लेयर भी एह भावना के अपनाई. इंहवा के इंटरनेट के सुविधा, जेकर तनी-मनी नुकसानो बा, एह समुदाय के जोड़ के रखी. पोर्ट ब्लेयर आजो भारत के हिस्सा बा. आम जगह पर लोग एक-दोसरा से मिलत रही. प्रेम आपन रस्ता जरूर खोज लीही.
अनुवाद: स्वर्ण कांता
लेखक के बारे में
स्वेता डागा बेंगलुरु के रहे वाली क्वियर मल्टीमीडिया प्लेटफार्म संगे काम करे वाली स्वतंत्र पत्रकार बानी. उहां के जलवायु बदलाव, जेंडर आ रोजी-रोटी से जुड़ल मुद्दा पर लिखेनी.
शुक्रिया