थार की कसीदाकारी (in Hindi)

By बाबा मायारामonJan. 08, 2018in Livelihoods

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (SPECIALLY WRITTEN FOR VIKALP SANGAM)

सारी तस्वीरें उरमुल की दी हुई हैं 

एक दिन गांवों में घूमते-घामते एक झोपड़ी पर चरखा पड़ा दिखाई दिया। पहले ग्रामीण इस चरखे से कताई करते थे, पर अब इस्तेमाल नहीं करते। राजस्थान में हस्तकला की परंपरा रही है। चाहे वह ऊन की हो,चमड़े की हो, कशीदाकारी की हो या लकड़ी की। उन्हें लगा कि ऐसे कठिन समय में लोग अपने हुनर से कुछ अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। उरमुल ने इस परिस्थिति में लोगों की जिंदगी संवारने और सामाजिक बदलाव लाने के लिए काम किया।

एक शिविर के दौरान महिलाओं अपने नए काम के साथ 

उरमुल ने आजीविका के इस कार्यक्रम को अपना मिशन बनाया। परंपरागत हस्तकला व शिल्प कौशल को आगे बढ़ाया। पश्चिम राजस्थान के कोलायत, फलोदी, जैसलमेर, लूणकरणसर  आदि में यह काम शुरू हुआ। यहां के हस्तकला कारीगरों की मदद से यह काम गति पकड़ने लगा, ये सभी बुनकर थे। उरमुल ने गरीब परिवारों की पहचान की, इनमें से जो परंपरागत बुनकर नहीं थे, उन्हें सिर्फ कताई के लिए ऊन दिया। और कताई के बाद यह ऊन वापस ले लिया गया। इसकी उन्हें मजदूरी दी गई। धीरे-धीरे काते गए ऊन का अंबार लग गया। तत्काल उसे लेने वाला कोई नहीं था। उरमुल की टीम को समझ नहीं आ रहा था कि इसका क्या करें? उचित दाम में कैसे बेचे, जिससे जो लागत लगी है वह वापस आ सके, यह एक बड़ा मुद्दा सामने आया।

ट्रस्ट ने यह महसूस किया कि यह ऊन उचित दामों में बिके, इसकी संभावना नहीं है। अगर उसने अन्य संभावनाओं पर विचार करना शुरू किया- जैसे बुनाई। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन के विद्य़ार्थियों को आमंत्रित किया गया, उनसे इस संबंध में बात की गई। इस बातचीत से बुनाई की प्रबल संभावना उभरकर सामने आई। पर इसमें जो परंपरागत बुनकर नहीं थे, उन्हें प्रशिक्षण की जरूरत महसूस की गई।

1991 के आसपास एक दूसरे  क्षेत्र में कशीदाकारी का काम शुरू किया गया। खासतौर से उन परिवारों के बीच जो 1971 के युद्ध के समय पाकिस्तान से हिन्दुस्तान में विस्थापन कर आए थे। वे पहले यह काम करते थे लेकिन उन्हें इसका सही दाम नहीं मिलता था और बिचौलिए शोषण करते थे। उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। बाड़मेर और जैसलमेर के बिचौलिए उनसे माल कम दामों में खरीदते थे और खुद मुनाफा कमाते थे। कपड़ों पर उनकी हाथ की कढ़ाई ऊंचे दर्जे की थी। इन उत्पादों की गुणवत्ता इतनी अच्छी थी कि ये बड़े शहरों के बाजारों में और बाहरी देशों में आसानी से बिक सकते थे।

गांव के उत्पादन में महिलाएं

उरमुल से जुड़ी प्रेरणा अग्रवाल बताती हैं कि हम कारीगरों को कपड़े देते हैं, धागा और सुई उपलब्ध कराते हैं, उनसे कशीदाकारी करवाते हैं और फिर बाजार में आपूर्ति करते हैं। महिलाओं को उनके काम का मेहनताना मिल जाता है। रंगसूत्र, दस्तकार और फैब इंडिया,आइकिया इत्यादि के साथ मिलकर मार्केट उपलब्ध करवाया जा रहा है जिससे उत्पादों को देश-विदेश में मांग बढ़ी है। कशीदाकारी के काम से करीब दो- ढाई हजार महिलाएं जुड़ी हैं। आज यह थार डेजर्ट क्राफ्ट या थार मरूज कला या थारी कशीदाकारी के नाम से देश-दुनिया में विख्यात है।

सशक्त होती महिलाएं

बाजार की मांग व नित बदलते फैशन के दौर में कशीदा उत्पादों में विविधता बढ़ी। पहले कच्छी भरत व सिंधी टांका ही काम में लिए जाते थे। कढ़ाई के बीच कांच लगाए जाते थे। समय के साथ इसमें बदलाव किया गया। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन एंड टेक्नोलाजी, राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान,अहमदाबाद और दस्तकार जैसी संस्थाओं से डिजाइन में  सहयोग लिया गया। फैशन डिजाइनर लैला तैयब ने भी इसमें सहयोग किया। ऊषा सिलाई स्कूल के साथ मिलकर भी काम किया जा रहा है। आज बड़े पर्स, लेडीज बैग, पोटली बैग, चश्मा कवर, सांडियां, दुपट्टे, कुरते, टाप, लेपटाप कवर, टेबल मेट्स, चादरें आदि कई कशीदे वाले उत्पाद उपलब्ध हैं।

डेली तलाई ( बीकानेर) गांव की मोहिनी ( 27 वर्ष) कहती हैं  कि आज कशीदाकारी से 4000 से 4500 रूपया महीना कमा लेती हैं। उन्हें कशीदाकारी के लिए वर्ष 2013 में मशहूर सिने तारिका प्रियंका चोपड़ा व बाक्सर मेरी काम ने मुंबई में सम्मानित भी किया था। उनके दो बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं। इसी गांव की गुड्डी व चंपा के घर की स्थिति भी सुधर गई है। वे जब भी खेती-किसानी व घर के काम से फुरसत मिलती है, कशीदाकारी का काम करती हैं।

डेली तलाई की मोहिनी बाई

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि अब इस काम का विस्तार हो गया है। बुनकर और कशीदाकारी में करीब 4500 के आसपास लोग जुड़े गए हैं। आज यह काम दूसरी और तीसरी पीढ़ी को प्रशिक्षित और डिजाइन तक आ पहुंचा है।  इस काम में उरमुल परिवार की तीन स्वतंत्र संस्थाएं कार्यरत हैं। इस काम का कई तरह से समाज में असर देखा जा सकता है। इससे गांवों में महिलाओं के स्वयं सहायता समूह मजबूत बन गए हैं, वे बैंकों से आदान-प्रदान करती हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति बेहतर हुई है। इससे निचले तबके के बहिष्कृत समुदायों को राजनैतिक और सामाजिक रूप सशक्त हुए हैं। परंपरागत रोजगार से स्थाई  आजाविका मिली है। और थार के मरूस्थल में जीवन पहले से आसान ही नहीं हुआ है बल्कि बेहतर हुआ है।

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Nitesh Khatri July 30, 2018 at 7:13 pm

Bahut accha kam kar rahe hai aap. Mera Rajasthan aage badhe raha hai.

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