नियमगिरी के आदिवासियों की खेती (in Hindi)

By बाबा मायाराम on Oct. 20, 2015 in Food and Water

ओड़िशा का एक गांव है कुन्दुगुड़ा। वैसे तो यह गांव देश के अन्य गांवों  की तरह है लेकिन एक युवा किसान की बिना रासायनिक मिश्रित खेती ने इसकी अलग पहचान बना दी है। इस आदिवासी किसान का नाम है आदि। आदिवासी नाम से उसके नाम की समानता संयोग है पर उसकी खेती आदिवासी परंपरा का हिस्सा है।

आम तौर पर आदिवासियों को पिछड़ा माना जाता है, लेकिन उनसे कुछ सीखा भी जा सकता है, यह सोच नहीं है। कुन्दुगुड़ा के आदि की खेती को देखकर यह सोच बदल सकती है। उसने अपने आधे एकड़ खेत में 76 प्रकार की फसलें लगाई हैं जिसमें अनाज, मोटे अनाज, दलहन, तिलहन, साग-सब्जियां और फलदार पेड़ भी शामिल हैं।

नियमगिरी पहाड़ की तलहटी में आदि का खेत है। उसमें विविध प्रकार की रंग-बिरंगी फसलें लहलहा रही हैं। लाल, पीले और सफेद मक्के, मोतियों के दाने से जड़े बाजरा, झुमके से लटकती मड़िया, सुनहरी धान की बालियां, कांग, कोदो और कुटकी हैं। इसके अलावा, आलू, मिर्ची, लौकी, भिंडी, प्याज, लहसुन जैसी हरी सब्जियां हैं।

अगर कवि दृष्टि से देखो तो अपलक निहारते रहो। गर्दन ऊपर करो तो पहाड़ की हरियाली पर मोहित हो जाओ। अपूर्व सौंदर्य से भरपूर इस अनूठी खेती के और भी कई मायने हैं। खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, मौसम बदलाव और पर्यावरणीय दृष्टि से भी इसका महत्व आज बढ़ गया है। इसका महत्व तब और बढ़ जाता है जब हम लगातार दो बार सूखे की मार झेल रहे हैं।

मैंने उसके खेत में घूम-घूमकर फसलें, पौधे, कंद-मूल, साग-सब्जियां देखी। देशी स्वादिष्ट मक्के के भुट्टे को चखा। बरबटी की फल्लियां चबाई। कई पौधों के गुण धर्म के बारे में जाना। कंद मूलों की खासियत समझी।

इसी प्रकार, एक दूसरे गांव केरंडीगुड़ा में पूरा गांव मिश्रित खेती कर रहा है। ये सभी गांव रायगढ़ा जिले में हैं। यहां के लोकनाथ नावरी ने अपने खेत में 62 प्रकार की फसलें लगाई हैं। लिविंग फार्म के कार्यकर्ता कृष्णा कहता है कि हम ढाई सौ से अधिक गांवों में पूरी तरह मिश्रित खेती को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। यह खेती बरसों से हो रही है, हमारी परंपरा से जुड़ी है। जंगल और खेती से हमारे तीज-त्योहार जुड़े हैं।

यहां पहाड़ एक ब्लेक बोर्ड की तरह सपाट दिख रहा है पर उसमें भी झूम खेती हो रही है। झूम खेती में जुताई नहीं की जाती। छोटी-मोटी झाड़ियों को जलाकर उसकी राख में बीज बिखेर दिए जाते हैं जो बारिश में नमी पाकर उग जाते हैं।

प्रकृति प्रेम आदिवासियों का स्वभाव है और उससे उनका लगाव सामंजस्य का अनुपम उदाहरण है। उनकी आजीविका व जीवनशैली जंगल आधारित है। जंगल से जड़ी-बूटी एकत्र करना, वनोपज एकत्र करना और पारंपरिक खेती करना उनकी जीविका के साधन हैं।

यह खेती बिना रासायनिक, बिना कीटनाशक के देशी बीजों से की जा रही है। कम खर्च और बिना कर्ज के की जा रही है। देशी बीज अपने हैं, मेहनत हाथ की है और जमीन खुद की है। कुछ लोग किराये से जमीन लेकर भी खेती कर रहे हैं।

मिश्रित खेती को प्रोत्साहित करने वाले व लिविंग फार्म से जुड़े प्रदीप पात्रा कहते हैं कि यह खेती पूरी जैविक और पर्यावरण के अनुकूल है। इसमें ज्यादा कीट प्रकोप का खतरा भी नहीं है।

कीट नियंत्रण के लिए नीम, सीताफल, अरक आदि के पत्ते को गोमूत्र के साथ मिलाकर स्प्रे कर दिया जाता है। एक ही खेत में कई प्रकार की फसलें लगाने का लाभ यह होता है कि अगर एक फसल मार खा गई तो उसकी पूर्ति दूसरी से हो जाती है।

मिश्रित खेती से साल भर खाद्य सुरक्षा बनी रहती है। एक के बाद एक फसल पकती जाती है और उसे काटकर भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। जब मैं अक्टूबर की शुरूआत में इस इलाके में था तब नवाखाई त्यौहार मनाया जा रहा था। जल्दी पकने वाला धान उस समय तक आ चुका था।

एक फसल दूसरी की प्रतिस्पर्धी नहीं है बल्कि सहायक है। जैसे मक्के के पौधे पर बरबटी की बेल लिपटी है। वह उसे हवा से गिरने से बचाती है। इसी प्रकार एक पौधा दूसरे की मदद के लिए तत्पर खड़ा है। अलग-अलग पौधों की जड़ें अलग-अलग गहराई से पोषक तत्व हासिल करती हैं। फल्लीवाले पौधों के पत्तों से नत्रजन मिलती है।

खेती से पैदा होने वाले कुछ अनाजों को गर्भवती महिलाओं व बीमारों को खिलाया जाता है। यानी ये अनाज बीमारी में भी उपचार के काम आते हैं। इन अनाजों में शरीर के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व होते हैं। रेशे, लौह तत्व, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन व अन्य खनिज तत्व मौजूद हैं।

इस खेती से न केवल खाद्य सुरक्षा व भोजन के लिए जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं बल्कि इसमें जलवायु बदलाव से होने वाले नुकसानों से बचाने की क्षमता भी है। इससे मिट्टी-पानी के संरक्षण के साथ इससे जैव विविधता समृद्ध होती है व पर्यावरण का संरक्षण भी होता है।

लेकिन आदिवासियों की खेती पर एक खतरा भी मंडरा रहा है। यहां सागौन व नीलगिरी की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है जिससे लोगों की खाद्य सुऱक्षा प्रभावित हो रही है। आदि कहता है कि हम सागौन व नीलगिरी को तो नहीं खा सकते। खाने को अनाज ही चाहिए। जंगल ही हमारा जीवन है, इससे हमें भोजन मिलता है। हम इसके बिना नहीं जी सकते।

यह पूरा इलाका आदिवासी बहुल है। यहां कुई भाषा बोलने वाले कंध आदिवासी हैं। डोंगरिया, झरनिया और कुटिया। ये सभी आदिवासी कंध हैं। डोंगरिया, जो डोंगर या पहाड़ पर रहते हैं। झरनिया, जो झरने के पास रहते हैं। कुटिया कंध जो पहाड़ के निचले भाग में रहते हैं। ये सब एक ही आदिवासी समुदाय है, जो अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। और सभी आदिवासी मिश्रित खेती करते रहे हैं।

यह वही नियमगिरी पहाड़ है जहां के आदिवासियों ने खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी और जीती थी। अब भूख और कुपोषण से लड़ाई लड़ी जा रही है। बहरहाल, भूख और कुपोषण से खेती के माध्यम से यह लड़ाई भी लड़ी जा रही है।  

हाल ही में मौसमी बदलाव के कारण जो समस्याएं और चुनौतियां आ रही हैं, उससे निपटने में भी मिश्रित खेती कारगर है। कम बारिश, ज्यादा बारिश, सूखा और कम पानी की स्थिति में यह खेती उपयुक्त है। इस खेती में मौसमी उतार- चढ़ाव व पारिस्थतिकी हालत को झेलने की क्षमता है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, उनसे संपर्क करें



Story Tags: agricultural biodiversity, agrobiodiversity, Traditional Knowledge, Tribals, Kondh, particularly vulnerable tribal group, tribal, Climate Change, self-sufficiency, seed savers, seed diversity, traditional agricultural techniques, slash and burn, Jhum, Food Sovereignty

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