विश्वनागरिकता के नये संदर्भ (in Hindi)

By रमेशभाई शर्मा, राष्ट्रीय संयोजक, एकता परिषद on March 6, 2020 in Perspectives

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (SPECIALLY WRITTEN FOR VIKALP SANGAM)

महात्मा गाँधी आज राजनैतिक-सामाजिक विमर्श के सर्वाधिक प्रासंगिक सन्दर्भ बन चुके हैं। एक राष्ट्रपिता और राजनैतिक आदर्शों के रूप में जाने-अनजाने उनकी पुनर्स्थापना यही साबित करता है कि उनके मूल्य-जिसे हम अक्सर गांधीवाद कहते हैं आखिर कितने सर्वकालिक रहे हैं। अच्छा ही होता यदि गांधीवाद, आज सभी राजनैतिक दलों, मान्यताओं उनके कार्यों और नीतिगत सन्दर्भों का चरित्र बन पाता। इसके बाद का सच वास्तव में गांधीवाद को मारकर केवल गाँधी (और उसके नाम) को राजनैतिक विमर्शों की सहूलियत बना देने का यथार्थ है। 

अपनी बात और निर्णयों को सही साबित करने के लिए महात्मा गांधी अथवा गांधीवाद को मुहर के रूप में उपयोग-दुरुपयोग के इन प्रयासों और परिणामों का गहन विश्लेषण आवश्यक है। 

इस विश्लेषण के पूर्व यह स्वीकार करना आवश्यक है कि हिंसा को स्थापित करने वाले अथवा स्थापित करने वाले किसी कदम को इस देश का समाज न कभी आत्मसात कर पाया और न ही करेगा। महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानने वाले देश में कम से कम यह 'न्यूनतम सामाजिक मूल्य' थे और सर्वदा रहेंगे।  

राज्य अथवा समाज के द्वारा इन मूल्यों का उल्लंघन करते ही - असुरक्षा जन्मती है जिसका परिणाम प्रत्यक्ष या परोक्ष हिंसा है। इसलिए राज्य और समाज दोनों का सम्पूरक दायित्व इन मूल्यों का संरक्षण और संवर्धन है।  

इन दिनों राजनैतिक चर्चाओं के केंद्र में वो सभी निर्णय, उससे उपजे सवाल और प्रतिक्रिया के असहज परिणाम हमारे सामने हैं - जो महात्मा गांधी के विशेषण से जोड़ दिए गये।   

नागरिकता संशोधन कानून मौजूदा विमर्शों के केंद्र में है। सरकार मानती है कि ऐसा राजनैतिक कदम उठाते हुए वो महात्मा गांधी के उन सपनों को ही साकार कर रही है - जो भारत और भारतीयता को मज़बूती से पुरार्स्थापित करते हैं। शेष राजनैतिक-सामाजिक प्रतिष्ठान यह मानते हैं की यह अखंड भारत और भारतीयते के लिए नई चुनौती है।  क्या वाकई में महात्मा गाँधी का सपना ऐसा था ?

महात्मा गाँधी ने कहा था कि - ६ लाख स्वायत्त, स्वशासी, स्वावलम्बी गावों का परिसंघ ही भारत देश है। यदि महात्मा गाँधी का संदर्भ नागरिकता संशोधन कानून के लिए प्रासंगिक है तो क्या सरकार और समाज - आदिवासी-दलित और वंचित समाजों के उत्थान के लिए महात्मा गाँधी के बताये रास्तों पर भी निर्णय लेना चाहती हैं? उन्होंने तो  यहाँ तक कहा था कि - आर्थिक स्वायत्तता के बिना राजनैतिक स्वाधीनता अपूर्ण है। क्या आज आर्थिक स्वायत्तता के सवाल 'पूर्ण नागरिकता' के लिए एक अपरिहार्यता नहीं होनी चाहिए? उन्होंने भूमि और संसाधनों के जिस ट्रस्टीशिप की आजीवन वकालत की, क्या वह भारत के प्रत्येक नागरिक का अधिकार नहीं होना चाहिए? महात्मा गाँधी 'सर्वधर्म समभाव' के उपदेशक और उपासक रहे। क्या समाज के हरेक नागरिक के लिए यह नागरिकता का बुनियादी आचरण नहीं होना चाहिए? वे समाज के अंतिम व्यक्ति को केंद्र में रखकर कानूनों और नीतियों के निर्धारण को सर्वोपरि मानते थे। क्या नागरिकता की नयी परिभाषा में अंतिम व्यक्ति के उत्थान का यथार्थपरक तर्क है ? महात्मा गाँधी ने जिस विश्व बंधुत्व का सन्देश पूरी दुनिया को दिया, क्या नयी नागरिकता की परिधि में वह भावना है?

वास्तव में हम ने महात्मा गाँधी को जारी बहसों, निर्णयों, प्रतिक्रियाओं और परिणामों के एक ऐसे फ्रेम में कैद कर दिया जिसे अक्सर सहूलियतों के हिसब से उपयोग-दुरुपयोग किया जाते रहा है। समाज और राजनैतिक प्रतिष्ठान दोनों के द्वारा।

अर्धसत्यों के इस मौजूदा दौर में हमारे विमर्श का केंद्र यह होना चाहिए कि - २१ वी सदी में आखिर नागरिकता के मायने क्या होंगे? वैसे तो यह सबाल विश्व परिदृश्य में भी उतना ही मौजूद है - जितना भारतीय महाद्वीप में। मध्य-पूर्वी देशों से लाखों लोगों का यूरोप में पलायन, मध्य अमरीकी देशों से उत्तर अमेरिका की ओर जनबहाव, पश्चिमी अफ्रीका से आगे बढ़ता अनगिनत लोगों का कारवाँ और एशियाई देशों में लोगों की अपनी सीमाओं से आगे बढ़ जाने को आखिर हम संकट मानते हैं या समाधान; यही विश्वबंधुत्व के हमारी नहीं धारणा की कसौटी है और होगी।

विगत दो दशकों में हमने 'वैश्वीकरण' की अपनी भी भ्रांतियों को तोड़ते हुए अंततः उसे नए अवसरों में बदल दिया है। यों कहें कि वैश्वीकरण का पुरजोर विरोध करते-करते समाजों और देशों ने भौतिकतावाद के रास्ते वैश्वीकरण को स्वीकार कर ही लिया।  लेकिन भौगोलिक और राजनैतिक रूप से 'वैश्वीकरण' को हम अब तक ख़ारिज ही करते रहे हैं। मौजूदा द्वंद्व ही आज हिंसा, अराजकता, अलगाव और विपन्नता के रूप में हम सब के सामने है। 

गांधीवाद और महात्मा गाँधी के अनुयायियों को या यों कहे कि महात्मा गाँधी के देश को - विश्वबन्धुत्व अथवा विश्वनागरिकता की नयी इबारत लिखने का यह स्वर्णिम अवसर है। क्या भारत देश इसकी प्रेरणा बन सकता है? यह प्रश्न अब से पहले इतना प्रासंगिक कभी नहीं रहा।

विश्वनागरिक की सबसे सरल परिभाषा यही है कि  - वह मानव जो वृहत  विश्व के प्रति जागृत हो और उस वृहत  विश्व में अपनी भूमिका के प्रति संज़ीदा रहते हुए अपने और सामुदायिक प्रयासों से एक सज़ग, समान और स्थायित्व की  दुनिया के निर्माण के लिये तत्पर रहे। इस परिभाषा और निहित वचारों का विरोधी वास्तव में कोई हो ही नहीं सकता। बल्कि दुनिया के हरेक देश में नागरिकता की व्यापक अवधारणा का केंद्रबिंदु भी यही है। महात्मा गाँधी आज होते तो वो भी कुछ ऐसा ही कहते। आज दुनिया के अनेक संकटों का समाधान विश्वनागरिकता की इस अवधारणा को आत्मसात करने से शुरू होगा। 

२१ वी सदी में नयी विश्वनागरिकता की नयी इबारत लिखते हुए समाजों और देशों को मानवनिर्मित भौगोलिक सीमाओं को नए सन्दर्भों में पुनर्परिभाषित करना होगा। यदि पिछली सदी की रंजिशों को भूलकर यूरोपीय संघ इस विचारधारा की शुरुआत कर सकता है तो भारत सहित पडोसी देशों में जहाँ सभ्यता और संस्कृति की साझी विरासतें हैं, वो देश 'एशियाई नागरिकता' के नए सपने को साकार क्यों नहीं कर सकते?

इतिहास तथ्यों और तारीखों का अर्धविराम है। भूगोल को इस अर्धविराम का स्थायी परिणाम मान लेना अब तक राजनैतिक भूल ही साबित होता रहा है। आज नागरिकता के अपने बनाये दायरों से बाहर आने और विश्वनागरिकता को ग्रहण करने की शुरुआत, वास्तव में इतिहास और भूगोल से आगे बढ़ने का अध्याय है।

भारत सहित दुनिया में विश्वनागरिकता के इस अध्याय को लिखने की शुरुआत हम सबको करनी ही होगी। नए गांधीवाद की समग्र दृष्टी के साथ। एक मुमकिन दुनिया के पुनर्निर्माण के लिए। अभी और इसी वक्त। 

लेखक रमेशभाई शर्मा एकता परिषद के राष्ट्रीय संयोजक हैं



Story Tags: culture, economy, localisation, local self government, decentralisation, egalitarian, Gandhi, marginalised

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