महिला किसानों की बीज क्रांति (in Hindi)

By बाबा मायाराम on Dec. 20, 2017 in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially written for Vikalp Sangam)

मलनाड की वनस्त्री संस्था को नारी शक्ति पुरस्कार २०१८!

कर्नाटक का एक कस्बा है सिरसी। यहाँ महिलाओं के एक छोटे से समूह की ख्याति देश-दुनिया में फैल गई है। इस समूह का नाम है- वनस्त्री, यानी जंगल की महिला। इसके द्वारा यहां एक मूक देशी बीज क्रांति हो रही है। अपने घर व जंगल के आसपास तरकारियों की खेती करना, बीज एकत्र करना, उन्हें सहेजना और उनका आपस में आदान-प्रदान करना,  उत्पाद बनाना और उन्हें बेचना आदि काम किए जा रहे हैं।

परंपरागत बीज, जो धरोहर है

कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ा जिले में सिरसी स्थित है। मैंने यहां इस समूह की गतिविधियां देखने-समझने के लिए 14 से 17 सितंबर,2017 तक दौरा किया। इस दौरान में समूह की कई महिलाओं से मिला, उनसे बात की। पश्चिमी घाट के घने जंगल में स्थित सिद्दी आदिवासियों के गांव गया, वहाँ रुका और उनके जीवन को करीब से देखने-समझने की कोशिश की। कई तरह के बीज और उनके उत्पाद देखे और चखे।

14 सितंबर को सिरसी में बस से उतरते ही मुझे वनस्त्री से जुड़े अमित हेगड़े मत्तीगट्टा गाँव ले गए, जो बहुत घने जंगल में बसा था।  मोटर साइकिल से हम वहाँ पहुंचे। यह पश्चिमी घाट की पर्वत श्रृंखला का जंगल था। इस इलाके की पर्वत श्रृंखला को मलेनाडु कहते हैं, जो मलनाड़ के नाम से जानी जाती है। यह जंगल, जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध माना जाता है। इसे देश के मसालों की राजधानी भी कहा जाता है। इस जिले में 80 प्रतिशत वनक्षेत्र है, जहां जैव विविधता फैली हुई है। पक्षियों की कई प्रजातियाँ, वन्य प्राणी, औषधि पौधे पाए जाते हैं। यहां श्रीगंधा (चंदन ) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

धान यहां की प्रमुख फसल है। लेकिन यहां बहुतायत में सुपारी, अनानास, केला, नारियल और कई तरह की मौसमी फसलें होती हैं, जिनमें हरी पत्तेदार तरकारी (सब्जी) और अनाज शामिल हैं।

यहां हम पहाड़ के नीचे खाई में बसे मत्तीगट्टा गए। गाँव में घर बहुत दूर दूर हैं। यहां की लक्ष्मी सिद्दी, जो वनस्त्री की सक्रिय कार्यकर्ता हैं, ने बताया कि वह अपने खेत में कई तरह की तरकारी और कंद उगाती है। केसु (घुइया पत्ता) की उनके पास 6 किस्में हैं। केला, थेंगू (नारियल), अरेका (सुपारी),काडमिनेसू (काली मिर्च) भी होते हैं। लक्ष्मी कहती हैं कि यहाँ सुपारी की खेती अच्छी होती है। यहाँ का मौसम व जलवायु ठंड़ी है, जो सुपारी की फसल के लिए अनुकूल है।

लक्ष्मी सिद्दी, जो मलनाड मेला में अपने बगीचे में उगाए कंद के सा

वे मलनाड मेले( यह मेला देशी तरकारियों, कंद के प्रस्तुतीकरण के लिए हर साल होता है) में जंगली कंद और हल्दी ले जाती हैं। वे कहती हैं कि वनस्त्री से जुड़कर उन्हें बहुत अच्छा लगता है। हम सब महिलाएं आपस में बात करते हैं, दुख-दर्द बांटते हैं और नई- नई जगह जाते हैं, जिससे हमारी हिम्मत बढ़ती है।

15 सितंबर को मैं मत्तीगट्टा से बस से सिरसी पहुंचा। वनस्त्री के कार्यालय में बैठक हो रही थी । इस बैठक में 40 किलोमीटर के दायरे से महिलाएं आई थी । वे तरकारियों के बीज और उनकी खेती से जुड़े अनुभव साझा कर आयी थी अथवा बीजों का आदान-प्रदान कर रही  थी ।

वनस्त्री की समीक्षा बैठ

सनकेरी की सुचेता बताती हैं कि उन्होंने कद्दू,ककड़ी, करेला, लौकी और मिर्ची  अपने बगीचे में लगाई थी। इसी प्रकार, कुगालकुली गांव की गायत्री जोशी ने मिर्ची, बैंगन, हरी पत्तेदार भाजियों और करेला की खेती की थी। वे कहती हैं कि वनस्त्री से जुड़ने के बाद उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है।

अप्पीकोप्पा गांव की श्यामला कहती हैं कि उनके खेत में बारिश नहीं होने से धान अच्छे से नहीं हुआ पर तरकारियाँ अच्छी हुई। 3 माह से उन्होंने सब्जियां नहीं खरीदी।

वनस्त्री की संस्थापक सदस्य सुनीता बताती हैं कि उन्होंने वर्ष 2001 में वनस्त्री की शुरूआत की। यह एक गैर सरकारी पंजीयन ट्रस्ट है। यहाँ मैदानी क्षेत्र नहीं है, जंगल है। गैर खेती भोजन (अनकल्टीवेटेड फुड) की विपुलता है। एक अनुमान के अनुसार यहां गैर खेती भोजन की करीब सौ से दो सौ प्रजातियां लोगों के भोजन से जुड़ी हैं।

सुनीता कहती हैं कि वे जापानी कृषि वैज्ञानिक मासानोबू फुकूओका से प्रभावित थीं और वैसा ही कुछ करना चाहती थी। फुकूओका के प्राकृतिक खेती के अनुभवों पर आई पुस्तक एक तिनके से आई क्रांति (वन स्ट्रा रेवोल्यूशन) की एक समय बहुत चर्चा हुई थी। जब भारत में फुकूओका  आए थे तब सुनीता उनसे मिली थीं। उस समय वे पांडिचेरी में पढ़ाई कर रही थीं। यही से उनकी जिंदगी की दिशा मुड़ गई।

वे बताती हैं कि उन्होंने 8 मार्च 2001, में नीरनल्ली गांव से महिला दिवस से शुरूआत की, बीज एकत्र किए। जैव विविधता मेला करने लगे। थोड़े व्यापक पैमाने पर मलनाड़ मेला शुरू हुआ। यह अब हर साल होता है।

वे बताती हैं कि उन्होंने देखा कि घर के बगीचे में पारंपरिक तरीके से तरकारियों व कंद की खेती तो की जाती है पर बीजों को संभाल कर  नहीं रखा जाता। इसीलिए उनके समूह ने बीजों को एकत्र करना, उनको सहेजना, उनका दस्तावेजीकरण करने का काम शुरू किया।

इस साल 21 जून, 2017 को सिरसी में मलनाड मेला हुआ, जिसमें पश्चिमी घाट की जैव विविधता की झलक मिलती है। यह इस बात का प्रमाण भी है कि जंगल बाड़ी ( जंगल में घर का बगीचा) के लिए महिलाओं में जागरूकता बढ़ रही है और इससे खाद्य सुरक्षा हो रही है।  

मलनाड मेले के बारे में सुनीता ने बताया कि इसमें अचार प्रतियोगिता भी हुई जिसमें स्पर्धा की भावना कम और स्थानीय विविधता और उसके सम्मान करने की भावना थी । यहां आम, बेर,कोकम,नींबू, अदरक, टमाटर,अनानास,करौंदा से बने अचार भी उपलब्ध थे। मेले में आए लोगों का कहना था कि यह मेले से कुछ अधिक था। यह एक मिलने-जुलने, बीजों और पौधों के  संरक्षण,सूचनाओं का आदान-प्रदान करने का मंच था। यह सब अपने घर के इस्तेमाल के लिए और इसके बाद अतिरिक्त हुआ तो पड़ोसियों, मित्रो व रिश्तेदार को बांट देते थे।

मलनाड क्षेत्र के परंपरागत बीजों का आदान-प्रदा

महिलाओं को सशक्त करने के लिए लेंड एंड लेंस कार्यक्रम भी चलाया है जिसमें महिलाओं को फोटोग्राफी करना सिखाया जाता है। एक महिला ललिता ने कहा कि पहले वे घर में चाकू छुरी से सब्जी काटते थे, घर की चारदीवारी  में कैद थे, अब कैमरा से फोटो लेते हैं। यहाँ, पिछले तीन महीनों में ४ महिलायें फोटोग्राफी में प्रशिक्षित हो गयीं हैं। समूह के पास ४कैमरे हैं। इन महिलाओं के द्वारा लिए गए फोटो की एक प्रदर्शनी हुई थी, जिसकी बहुत सराहना की गई थी। इसी तरह का मेला बंगलौर में 10 वर्षों तक हुआ। स्थानीय तरकारियों  व अनाजों की मांग बढ़ने लगी।

इस संस्था को पहली बार वर्ष 2008 में  एक प्रोजेक्ट मिला। जब तक इस समूह से 100 महिलाएं जुड़ चुकी थी। सिरसी में कार्यालय खुला, इस कार्यक्रम का गांव-गांव में प्रचार-प्रसार होने लगा। वह भी स्थानीय तौर-तरीकों से।

इस बीच एक पोस्टमेन इस समूह से जुड़ गया। उसे यह काम अच्छा लगा, क्योंकि उसकी रूचि भी घर के बगीचे में तरकारियों की खेती करने में थी। वह वनस्त्री के पर्चे और प्रचार-सामग्री घर-घर पहुंचाने लगा। इससे महिलाओं का एक बड़ा समूह जुड़ गया।

बीजों के संरक्षण के साथ परिसर उद्योग शुरू हुआ। प्रोसेसिंग हुई। आजीविका कार्यक्रम के तहत वन्या नाम की अलग ही संस्था बनाई गई। जिसका पंजीयन 2016 में हुआ। वन्या के उत्पाद बंगलौर, गोवा,चेन्नई, मैसूर में उपलब्ध हैं, जिन्हें और दूसरे स्थानों पर भेजने की योजना है। उत्पाद भी बढ़ाने की योजना है।

केले के चिप्स, कटहल के पापड़ और चिप्स, कोकम का जूस, अचार इत्यादि जो परंपरागत रूप से बन रहे थे, उन्हें वन्या में खरीदा जाने लगा।  जिससे आज

31 बीज संरक्षक (सीड सेवर) जुड़े हैं।  प्रोसेसिंग कर उत्पाद देने वाली महिला किसान जुड़ी हुई हैं। वन्या के पास आज 40 प्रजातियों की सब्जियों के बीज हैं, 15 कंद की प्रजातियां हैं।

मनोरमा जोशी किसान हैं और वनस्त्री की प्रमुख सदस्य है

16 सितंबर को हमें सोंदा गांव की मनोरमा जोशी ने भोजन पर बुलाया। मनोरमा जी वनस्त्री की संस्थापक सदस्य हैं। कूगलकुल्ली ( सिरसी) गांव में रहती हैं। उन्होंने देशी मोटा चावल, सांभर, हशी (करेला और दही), अप्पे हुली ( इमली और नींबू से तैयार),  कटहल का पापड़, करकली (अरबी की चटनी) और  सुकक्लू उण्डे ( गुड और नारियल से बना) आदि का हमें भोजन कराया। बहुत ही स्वादिष्ट और जायकेदार।

कुल मिलाकर, वनस्त्री का काम कई मायनों में महत्वपूर्ण है। जो देशी बीज लुप्त हो रहे हैं उन्हें एकत्र करना, सहेजना और आपस में आदान-प्रदान करना। इन बीजों को खेतों में उगाना। मेले  के माध्यम से इनका प्रचार करना,  दूसरों लोगों को उपलब्ध कराना। लोग मेले में इन उत्पादों में देख सकते हैं, छू सकते हैं, इसका स्वाद ले सकते हैं। इससे इस खेती को करने की प्रेरणा मिलती है।

वनस्त्री की सदस्य जिनमें अपने काम से आत्मविश्वास आया है

इससे एक तरफ तो घरों में कैद रहने वाली महिलाएं बार-बार मिल रही हैं, आपस में दुख-सुख बांट रही हैं। दौरे कर रही हैं। और दूसरी तरफ इससे देशी खान-पान की संस्कृति वापस आ रही है, जो  देशी खेती के खत्म होने से लुप्त हो रही थी।  बीज संरक्षण के साथ मिट्टी-पानी का संरक्षण भी हो रहा है। यह एक सामाजिक बदलाव का जरिया है।

लेखक से संपर्क करें

Grow a Garden: A Handy Guide for the Aspiring and Experienced Gardener (botanical illustrations by Sushama Durve) published by Vanastree. It provides information on 38 vegetable, tuber and flower species - when and how to plant your organic, open pollinated seeds and tubers, transplanting details, harvesting, etc. (checked on 29 Dec. 2017)

Read in English about other such initiatives in Kitchen Gardens That Bring Nutrition, Livelihood Support and Protect Seeds by Bhart Dogra and Baba Mayaram



Story Tags: Medicinal Plants, Food Sovereignty, Farmers market, Agroecology, agrobiodiversity, community, commons, collectivism, nutrition, localisation

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