आदिवासियों की हरियाली यात्रा (IN HINDI)

By बाबा मायाराम on Sept. 12, 2018 in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (SPECIALLY WRITTEN FOR VIKALP SANGAM)

इन दिनों सतपुड़ा की घाटी में आदिवासी पेड़ लगाने का अनोखा हरियाली अभियान चला रहे हैं। अभियान का नारा है- हरियाली खुशहाली लाएंगे- पर्यावरण बचाएंगे, भुखमरी भगाएंगे। इसके लिए जगह-जगह हरियाली रैलियां निकाली जा रही हैं, पर्चे बांटे जा रहे हैं, सभा व गांव की बैठकों में पेड़ लगाने का संकल्प लिया जा रहा है। यह अभियान मध्यप्रदेश के बैतूल, हरदा और खंडवा जिले में चल रहा है।

समाजवादी जन परिषद और श्रमिक आदिवासी संगठन के बैनर तले यह अभियान करीब एक दशक से चल रहा है। बरसों की मेहनत अब रंग लाने लगी है। आदिवासियों के द्वारा रोपे गए पौधे अब फल देने लगे हैं। इन फलों को आपस में बांटकर भी पेड़ लगाने का संदेश दिया जाता है। अब तक 50 हजार से ज्यादा पौधे लगाए जा चुके हैं। आदिवासियों ने अपने घर के आसपास, खाली पड़ी जमीन पर, खेतों में और जंगल में फलदार पेड़ लगाए हैं।

श्रमिक आदिवासी संगठन के अनुराग मोदी कहते हैं कि फलदार पेड़ हर दृष्टि से उपयोगी हैं। इससे हरियाली बढ़ेगी, कुपोषण दूर होगा, जैव विविधता बचेगी और पर्यावरण भी बचेगा। मिट्टी का कटाव रूकेगा और पानी का संचय होगा। पेड़ों पर पक्षी आएंगे, वे कीट नियंत्रण करेंगे। आदिवासियों के भोजन में पोषक तत्व होंगे, उनका स्वास्थ्य ठीक होगा और इन फलों की बिक्री से आमदनी भी बढ़ेगी।

वे आगे बताते हैं कि अमेरीकी अर्थशास्त्री शुमाकर ने अपनी प्रसिद्ध किताब स्माल इज ब्यूटीफुल में कहा था – अगर भारत देश के हर गांव में, हर व्यक्ति पांच पेड़ लगाए, तो बिना किसी विदेशी कर्जे और आर्थिक मदद के इस देश की बेरोजगार की समस्या का स्थाई हल निकाला जा सकता है।  

इस साल अभियान की शुरूआत शाहपुर में 6 जुलाई को हरियाली रैली निकालकर की गई। इसके बाद बैतूल में 9 जुलाई को हरियाली रैली हुई। रैली में आदिवासियों ने कांवड़ में पौधे सजाकर बाजार में जुलूस निकाला, ढोल-टिमकी के साथ गीत, नारों व बातचीत से पेड़ लगाने का संदेश दिया और सामूहिक रूप से पौधारोपण का संकल्प लिया। रैलियों में बड़ी तादाद में आदिवासी शामिल हुए।

 मरकाढाना गांव में तैयार नर्सरी

यह अभियान अगस्त माह तक चलेगा। अगस्त में कुछ और जगह हरियाली रैली निकाली जाएंगी। भौंरा (शाहपुर विकासखंड) में 17 अगस्त को, चूनाहजूरी (चिचौली विकासखंड) में 18 अगस्त को, चीरापाटला ( चिचौली विकासखंड) में 19 अगस्त, और चोपना ( घोड़ाडोंगरी विकासखंड) में 20 अगस्त को रैली होना है।

पेड़ लगाने की मुहिम की तैयारी गर्मी के मौसम से ही शुरू हो जाती है। बीजों को एकत्र करना, उनकी साफ-सफाई करना, उनका रख-रखाव करना और पौधे तैयार करना और फिर उन्हें लगाना। इसके लिए पहले तीन गांव- मरकाढाना, बोड़ और पीपलबर्रा में नर्सरी बनाई गई थी जिनमें पौधे तैयार किए जाते थे। श्रमिक आदिवासी संगठन का कहना है कि वनविभाग द्वारा नर्सरी नष्ट कर देने से इस साल नर्सरी से पौधे तैयार नहीं हो पाए तो खरीदकर पौधे लगाएं जा रहे हैं।

इस अभियान का खर्च संगठन चंदे के रूप में जुटाता है। इस साल भी संगठन ने अपील जारी कर आर्थिक सहयोग मांगा था। कुछ कार्यकर्ता इस काम की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जिनमें मरकाढाना के सुमरलाल, अनीता व उनके साथी शामिल हैं।

श्रमिक आदिवासी संगठन के कार्यकर्ता राजेन्द्र गढ़वाल बताते हैं कि यहां पहले अच्छा जंगल हुआ करता था। वह आदिवासियों के भूख और जीवन का साथी था। यहां से उन्हें कई तरह के कंद मूल, मशरूम, शहद, अचार, महुआ और हरी पत्तीदार भाजियां मिलती थीं। जंगल ही उनका पालनहार था। अब वैसा जंगल नहीं रहा। गांवों में रोजगार भी नहीं है। कहने को रोजगार गारंटी कानून ( महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून)  है, लेकिन अधिकांश मशीनों से होने लगा है। इसलिए लोग पलायन करते हैं। अगर उनके खेतों में व आसपास फलदार पेड़ होंगे तो उनका पोषण भी सुधरेगा और उन्हें बेचकर आमदनी भी होगी। 

राजेन्द्र गढ़वाल कहते हैं कि इस काम में वनविभाग ने अडंगा लगाया है, पीपलबर्रा की नर्सरी को जला दिया। वनविभाग का मानना है कि वनक्षेत्र में पौधे लगाने का काम उसके अलावा कोई और नहीं कर सकता। फलदार पौधे बागवानी के तहत आता है, जो प्रतिबंधित है। लेकिन केन्द्र सरकार द्वारा 2006 में पारित  अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवासी कानून 2006 के तहत ग्रामसभा की सीमा के अंदर जंगल की जैव-विविधता को संभालने और संवारने का अधिकार और जवाबदारी गांव के लोगों की है। लेकिन इसके उलट वनविभाग आदिवासियों की नर्सरी को जला देता है।  

मैंने हरियाली अभियान को देखने के लिए 21-22 जुलाई ( 2018) को दौरा किया। मुझे श्रमिक आदिवासी संगठन के कार्यकर्ता राजेन्द्र गढ़वाल बैतूल जिले के  करीब एक दर्जन गांवों और कस्बों में ले गए, ये गांव शाहपुर व चिचौली विकासखंड के अंतर्गत आते हैं। पाहावाड़ी, टेटरमाल, डुमका, चूनाहजूरी, पीपलबर्रा, बोड़, चीरापाटला, चिचौली, शाहपुर गया। मैं पिछले साल भी यहां आया था, और मरकाढाना गया था।

बैतूल में हरियाली रैली 

बैतूल जिले का यह इलाका आदिवासी बहुल है। यहां गोंड-कोरकू आदिवासी रहते हैं। खेती में मक्का ही मुख्य फसल है। जमीन ऊंची-नीची व हल्की है। सिंचित जमीन नहीं है। आदिवासियों का जीवन जंगल पर ही निर्भर है। वे बूढादेव की पूजा करते हैं। यहां कभी आदिवासियों का राज था। पहाड़ों पर उनके टूटे-फूटे किले उनकी याद दिलाते हैं।  लेकिन पहले जैसा जंगल भी अब नहीं रहा। इसलिए लोगों को मजबूर होकर रोजगार के लिए पलायन करना पड़ता है।   

हरियाली अभियान के तहत् कटहल, आम, बादाम, जाम, नींबू, मौसंबी, संतरा, रीठा, मुनगा, अनार, आंवला, बील, आचार, जामुन,काजू, छीताफल, बेर इत्यादि कई  फलदार पेड़ लगाए जा रहे हैं। पीपलबर्रा गांव के सरपंच मुंशी चौहान ( कोरकू) खुद इस मुहिम में जुटे हैं। घर घर जाकर पेड़ लगवाने का काम कर रहे हैं। ग्राम बोड़ के कुंवर सिंह और समोती ने अपने खेत के पेड़ दिखाए।

इस पूरे अभियान से कुछ बातें समझी जा सकती हैं। आज के जलवायु बदलाव के दौर में खेती की सोच बदलनी होगी। रासायनिक और मशीनी खेती में ठहराव आ चुका है। वृक्षों के साथ खेती का तालमेल बिठाना होगा। पेड़ों व मौसमी फसलों की मिली-जुली खेती करनी होगी। पहले ऐसा ही था। खेतों में महुआ, आम और आंवले जैसे कई तरह के पेड़ थे। महुआ खाते थे। उसके कई तरह के व्यंजन व भूंजकर खाया जाता था। केवल वार्षिक फसलों से लोगों की गुजर नहीं होगी।  आज बहुत लागत लगाने और मेहनत करने के  बावजूद किसानी घाटे का सौदा है। किसान आत्महत्या कर रहे है। फिर अधिक रासायनिक व कीटनाशकों के उपयोग से भूजल जहरीला हो रहा है। खासतौर से कम उपजाऊ वाले इलाकों में तो और भी मुश्किल है।

इस दृष्टि से भी हरियाली अभियान उपयोगी है। चाहे भले ही अच्छी उपजाऊ वाले खेतों में हम वार्षिक व मौसमी खेती करते रहें, लेकिन कम पानी वाली व अपेक्षाकृत कम उपजाऊ ढोंगा ( ऊंची-नीची) टीले वाली जमीनों में पेड़ लगाए जा सकते हैं। फिर इन पेड़ों का जमीन में नमी बनाए रखने में प्रमुख योगदान होता है। पेड़ों से गिरी पत्तियां व टहनियां नमी को बचाती हैं, साथ ही जैव खाद बनाती हैं। पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं, वे पोषक तत्वों को बांधे रखती हैं।

भोजन में फलों के शामिल होने से स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। कुपोषण तो दूर होता ही है, भोजन की गुणवत्ता भी बढ़ती है। इनमें पोषक तत्व तो होते ही हैं, रेशा अधिक होने से वे कई बीमारियों से बचाते हैं। पेड़ों से ईंधन के लिए लकड़ियां मिलती हैं। तापमान को पेड़ नियंत्रित करते हैं। हवा देते हैं। कार्बन को सोखते हैं।

जिन इलाकों में वर्षा का कोई भरोसा नहीं है, मौसम की अनिश्चितता है, जो कि बढ़ रही है, उन इलाकों में खेतों में फलदार पेड़ होना, खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत उपयोगी होगा। और इनके अतिरिक्त होने पर कुछ हद आर्थिक सुरक्षा होती है। धरती पर हरियाली चादर कई तरह से उपयोगी व सार्थक है।

इस सबके साथ मनुष्य और प्रकृति के बीच टूटता रिश्ता फिर से जुड़ेगा। मनुष्य ने प्रकृति पर आधिपत्य की सोच अपनाई है, उसी का परिणाम है आज का पर्यावरण का संकट। संसाधनों के बेजा दोहन की होड़। हरियाली अभियान जैसी पहल ने मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व की राह दिखाई है, जो आज पर्यावरण के संकट के हल के साथ मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी बहुत जरूरी है। फिर स्थानीय आदिवासियों के सहयोग से जंगल व पर्यावरण बचाए जा सकते हैं। पेड़ लगाने के इस काम में सरकार को दिलचस्पी लेना चाहिए और इस अनोखे अभियान में सहयोग करना चाहिए ताकि इसे और बेहतर ढंग से किया जा सकता है। इस पूरे अभियान से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, इसका अनुकरण किया जा सकता है।

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