सौर ऊर्जा की फैलती रोशनी (In Hindi)

By बाबा मायाराम (Baba Mayaram)onJun. 30, 2026in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially Written for Vikalp Sangam)

(Saur Urja ki Failti Roshni)

फोटो क्रेडिट- बाबा मायाराम और अमिताभ पात्र


इसमें न तो बिजली बिल आता है और न बिजली गुल होती है, बल्कि लगातार आपूर्ति होती है।

“पहले अगर बिजली गुल हो जाती थी, तो न हम पढ़ पाते थे, न फोन चार्ज कर पाते थे, न भोजनालय में भोजन बन पाता था, न पंप से पानी मिलता था, और न ही अंधेरे में कहीं आ जा सकते थे। लेकिन सौर पैनल लगने के बाद यह समस्याएं नहीं रहीं।” यह ओडिशा के सेहरा टीकरा गांव के अरविंदो स्कूल के रविन्द्र बंछोर थे।

ओडिशा के बरगढ़ जिले में सौलर ऊर्जा के लिए एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ पात्र सालों से अंधेरे में दीपक जलाने का काम कर रहे हैं। वे ऐसे दुर्गम व जरूरतमंद इलाकों में सौलर ऊर्जा की ज्योति जला रहे हैं, जहां लोग बिजली नहीं होने से परेशान थे।

अमिताभ पात्र धुन के पक्के हैं। वे सामाजिक कार्यकर्ताओं के परिवार से आते हैं। उनके नाना, अलेख पात्र प्रसिद्ध सर्वोदयी थे। उन्होंने कई रचनात्मक काम किए, और प्राकृतिक खेती में मिसाल पेश की। 90 के दशक की शुरूआत में मुझे भी उनके कृषि फार्म पर जाने और उनसे मिलने का मौका मिला था। मैंने उनके साथ कुछ दिन गुजारे थे और ताजी जैविक सब्जियों का स्वाद चखा था।

सामाजिक क्षेत्र में आने के लिए अमिताभ उनको ही श्रेय देते हैं। उनका बचपन पाईकमाल स्थित निसर्ग निवास में ही बीता है, जो उनके नाना अलेख पात्र का  कृषि फार्म व आवास स्थल था। निसर्ग निवास ही अमिताभ की खेलभूमि और शिक्षण शाला रही है। 

सौलर पैनल के साथ अमिताभ पात्र

गंदमार्दन पहाड़ की तलहटी में स्थित प्रसिद्ध नृसिंहनाथ मंदिर के पास ही यह स्थान है। प्रकृति की गोद में बसा यह इलाका प्राकृतिक रूप से बहुत ही खूबसूरत है। इस पहाड़ में कई झरने हैं और औषधीय पेड़-पौधों का भंडार है। बचपन में ही वैकल्पिक ऊर्जा से उनका परिचय इसी परिसर में हुआ, जो अब मिशन बन गया। यहां गोबर गैस प्लांट था, जिससे भोजन बनता था और बल्ब जलते थे।   

उनके जीवन में एक मोड़ जब आया तब वे सैम पित्रोदा से मिले। यह वर्ष 2010 की बात है। दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय वैकल्पिक ऊर्जा समारोह के दौरान सैम पित्रोदा से उनकी मुलाकात हुई। वहां बातचीत करने का मौका मिला। और उनसे प्रभावित होकर बाद से वे सौर ऊर्जा के काम में जुट गए। ओडिशा वापस लौटकर उन्होंने कुछ विस्थापित गांवों में सौर पैनल लगवाए। और जिन्होंने पूर्व से सौलर पैनल लगवाए थे, उनके रखरखाव और मरम्मत में मदद की। और उसके बाद से लगातार यह सिलसिला चल रहा है।

वे बताते हैं कि सौर ऊर्जा बहुत उपयोगी है। इससे बिजली निर्माण करना, पानी गरम करना, मोटर पंप चलाना, फ्रिज चलाना, बल्ब जलाना, पंखे चलाना इत्यादि सभी काम किए जा सकते हैं। और यह सब भी सस्ते दामों में संभव है। ये तीन तरह के होते हैं- ऑन ग्रिड, ऑफ ग्रिड और हाइब्रिड। इनमें से ग्राहकों के लिए हाइब्रिड सबसे उपयुक्त होती है, क्योंकि इस तकनीक ग्रिड न रहने पर भी बिजली की आपूर्ति बनी रहती है। और बची हुई उत्पादित ऊर्जा वापस ग्रिड में बेची जाती है। आमतौर पर हाइब्रिड लिथियम सिस्टम की कीमत 50 हजार रूपये के आसपास होती है। इसमें बैटरी, इन्वर्टर और पैनल सभी शामिल है। इससे प्राप्त बिजली को उपभोक्ता खुद भी इस्तेमाल कर सकता है और अतिरिक्त होने पर बेच भी सकता है।

उन्होंने बताया कि हीराकुंद बांध से विस्थापित 4 गांवों में बिजली की समस्या थी, तब कुछ साल पहले उन्होंने वहां सौर ऊर्जा के छोटे- बड़े पैनल लगवाए थे, जिससे उस गांव में रोशनी पहुंची थी। यह गांव डेब्रीगढ़ अभयारण्य के अंदर है। इसमें जो भी खर्च आया, उन्होंने खुद व उनके साथियों ने वहन किया था। बाद में सरकार ने सभी परिवारों के लिए सौर ऊर्जा सिस्टम लगवाए।  

अरबिंदो स्कूल

मुझे उन्होंने कुछ स्थानों के सौर पैनल दिखाए, जिसमें बरगढ़ जिले के भेड़न प्रखंड के सहरा टीकरा गांव का अरबिंदो स्कूल ( ऑरोविहार स्कूल) भी था। वहां 9 सौर पैनल लगे थे। यहां सौर ऊर्जा से 2 ट्यूबवेल, बल्ब, पंखे चलते हैं। अब लगातार आपूर्ति बनी रहती है, और बिजली बिल भी नहीं आता है।

यहां के देखभालकर्ता रविन्द्र बंछोर ने बताया कि पहले यहां तीन कनेक्शन थे, इनका करीब 20 हजार बिजली बिल आता था। बार-बार बिजली गुल व कम वोल्टेज की समस्या लगी रहती थी, इससे बच्चों की पढ़ाई बाधित होती थी। बिजली न होने की स्थिति में हम जनरेटर चलाते थे, जिसमें करीब 2000 रूपए का डीजल जल जाता था। इसके अलावा, ध्वनि व वायु प्रदूषण होता था। सौलर लगने से जनरेटर का इस्तेमाल लगभग खत्म हो गया है।

वे आगे बताते हैं कि हमें सौर पैनल लगाने में 3 लाख रूपए का खर्च आया। 2 वर्ष हो गए हैं। किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं है। यह एक आवासीय स्कूल है, जहां करीब सौ विद्यार्थी रहते हैं। वैसे नर्सरी से लेकर 10 वीं कक्षा तक 300 छात्र-छात्राएं अध्ययन करते हैं। जिस दिन हम इस स्कूल में गए थे, उस दिन रविवार था। संयोग से बिजली गुल थी, पर सभी काम निर्धारित समय पर हुए। कोई दिक्कत नहीं हुई। ऑनलाइन डिजीटल कक्षाएं भी चल रही थीं।

भेड़न में सौलर पैनल

बरगढ़ शहर में डॉ. देवाशीष त्रिपाठी का सौलर पैनल भी देखा, जो करीब 8 साल से चल रहा है। यहां 3 किलोवाट का सौलर पैनल है। देवाशीष त्रिपाठी ने बताया कि उनके घऱ सौर ऊर्जा से सभी काम होते हैं। बोरवेल पंप चलता है, बल्ब जलते हैं, और पंखे चलते हैं। फ्रिज व मिक्सर वगैरह सभी चलते हैं। बिजली बिल काफी कम आता है। खंभे ग्रिड की बिजली रहे न रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता है। 

इसी प्रकार, हम एक बरमकेला रोड पर स्थित आयन सत्या ढाबे पर गए, यह ढाबा भी सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करता है। यहां 5 किलोवाट का सौलर पैनल है। इससे 2 फ्रिज, बिजली मोटर पंप, बल्ब और पंखे चलते हैं। यहां बड़े बल्ब और सीसीटीवी कैमरे भी सौर ऊर्जा से चल रहे हैं।

सौलर पंप

अमिताभ बताते हैं कि इसमें लंबी अवधि तक चलते रहने के लिए सही टेक्नोलॉजी के साथ सटीक तरीके से इंस्टाल करना करना व रखरखाव और निगरानी बहुत जरूरी है।  

उन्होंने बताया कि गुणवत्तापूर्ण सामग्री के साथ लगाए गए सौलर पैनल आसानी से 10 वर्ष तक बिना किसी समस्या के चल सकते हैं। निरंतर बिजली की आपूर्ति भी होती है, और रखरखाव का खर्च भी लगभग न के बराबर होता है। उपकरण भी खराब नहीं होते हैं।

वे बताते हैं कि लेड एसिड बैटरी काफी पुरानी तकनीक है, जिसमें बैटरी की जिंदगी अपेक्षाकृत कम होती है। और उसमें नियमित रूप से उसमें आसुत जल ( डिस्टल वाटर) भरते रहना होता है। बड़े सिस्टम में जहां बहुत सारी बैटरी लगती है, वहां संतुलन बनाने में भी समस्या होती है। वहीं लिथियम सिस्टम में बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम लगे होने की वजह से रखरखाव की कोई झंझट नहीं होती।

कुल मिलाकर, सौर ऊर्जा की यह पहल बहुत ही उपयोगी है। यह वैकल्पिक ऊर्जा का अच्छा स्रोत है। इसमें न तो बिजली बिल आता है और न बिजली गुल होती है, बल्कि लगातार आपूर्ति होती है। इसमें एक दिक्कत आती है, देखभाल, रखरखाव और मरम्मत और सतत् निगरानी की, जिसे अमिताभ पात्र जैसे समर्पित व्यक्तियों की जरूरत है। वैश्विक ऊर्जा संकट व जलवायु बदलाव के दौर में यह पहल और भी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो जाती है, जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है। 


लेखक के बारे में

बाबा मायाराम, स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं, वे लम्बे समय से विकास व पर्यावरण के मुद्दों पर लिखते हैं.

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