आग बुझाने से जी उठा जंगल (in Hindi)

By बाबा मायारामonSep. 08, 2022in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिए लिखा गया विशेष लेख (Specially written for Vikalp Sangam)

(Aag bujhane se jee utha jungle)

फोटो क्रेडिट: विनीत मोहांतो

झारखंड के दो गावों ने जंगल से आग बुझाकर उन्हें न केवल हरा-भरा कर लिया है बल्कि वे ईंधन, चारा, पानी और जंगल से जुड़े खान-पान के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं।

अब तक हमने जंगल बचाने और पौधारोपण की कई कहानियां सुनी हैं, लेकिन झारखंड के आदिवासियों ने जंगल को आग से बचाकर उसे हरा-भरा कर दिया है। पश्चिम सिंहभूम जिले के बासाकुटी और सराईड ऐसे ही दो गांव हैं, जहां के युवाओं की पहल से उजड़े जंगलों में फिर से हरियाली लौट आई है। कुछ ही समय में चारिबुरू और मरांगबुरू पहाड़ जो लगभग वृक्षविहीन हो गए थे, फिर से जी उठे हैं।

पश्चिम सिंहभूम जिला आदिवासी बहुल है। यहां के अधिकांश बाशिन्दे हो आदिवासी हैं। खेती और पशुपालन के अलावा, यहां के आदिवासी जंगल पर निर्भर हैं। अगर हम देश के नक्शे को ध्यान से देखें तो जहां जंगल है, वहीं आदिवासी हैं और जहां आदिवासी नहीं हैं, वहां जंगल भी साफ हो गया है। आदिवासी प्रकृतिपूजक हैं। जंगल-पहाड़ में उनके देवी देवता बसते हैं। वे पेड़, पहाड़, पत्थर, नदियों की पूजा करते हैं। आदिवासियों की परंपरा में जंगल बचाना प्रमुख रहा है। परंपरा के साथ पारंपरिक ज्ञान भी जुड़ा है, जिसे आदिवासी पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजते आ रहे हैं।   

बदलाव की यह कहानी करीब दो-तीन दशक पहले शुरू हुई थी, जब क्षेत्र के ही कुछ लोगों ने जंगल काट डाले थे। इससे लोगों को जंगल से मिलनेवाली चीजें मिलना दूभर हो गया था। पेड़ों के पत्तों से लेकर, फूल, फल, हरी पत्तीदार भाजियां, कंद-मूल और पारंपरिक औषधियां मिलना मुश्किल था। चाहे वह विवाह के मंडप के लिए छायादार पेड़ों की शाखाएं हों, या भोजन के लिए पत्तों के दोना-पत्तल हों,और या परब-त्योहार में पूजा के लिए पेड़ों के हरे पत्ते हों,सभी मिलने में दिक्कत होने लगी थी। ऐसे में यहां के आदिवासी युवाओं ने वन समितियां बनाकर जंगल को फिर से हरा-भरा करने की ठानी।

मरांगबुरू पहाड़

पश्चिम सिंहभूम जिला पहाड़ व जंगल से घिरा हुआ है। इस जिले में बासाकुटी व सराईड खुंटपानी प्रखंड के गांव हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पहाड़ों को देखने का मुझे बार-बार मौका मिला है। पहाड़ हमेशा ही मां-बाप की तरह आश्वस्त करते नजर आते हैं। मैं खुद सतपुड़ा की तलहटी में बसे कस्बे में रहता हूं और उसी की गोद में पला बढ़ा हूं। लेकिन कई कारणों से इन पहाड़ों की हरियाली कम होने लगी है। ऐसे में झारखंड के आदिवासी युवाओं की पहल महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसे एकजुट संस्था का साथ मिला है। वनविभाग भी इस पहल में मदद कर रहा है, चूंकि यह जंगल वनविभाग के अंतर्गत है, पर जनभागीदारी से इसके संरक्षण व संवर्धन पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि वन अधिकार कानून ( अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी कानून,2006) के क्रियान्वयन की प्रक्रिया धीमी है। आदिवासियों को भी इस कानून के बारे में पूरी जानकारी नहीं है।

एकजुट संस्था की मदद से इस पहल का विस्तार भी हुआ है। स्कूली बच्चे, किशोर, किशोरी, महिलाएं और ग्रामीण इससे जुड़े हैं, और कई गांवों में अब यह पहल पहुंच चुकी है। दोपाई, पोरलोंग, खुंटपानी,लगियाबुरू,मदकम हातुबुरू जैसे दर्जनों गांवों में पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

बासाकुटी गांव के मुण्डा सोमा कांडेयाग ने बतलाया कि पहले यहां चारिबुरू का जंगल बहुत अच्छा व सुंदर था। जब यह जंगल कम होने लगे, तो गांव के लोगों को रोजाना की चीजें, जो जंगल से मिलती थीं, कम मिलने लगीं, तब गांववाले चिंतित हो उठे। वे इकट्ठे होकर सोचने लगे और जंगल को फिर से हरा-भरा करने के जतन में जुट गए।

वे आगे बताते हैं कि हम जंगल की रखवाली व देखभाल लम्बे अरसे से करते आ रहे हैं, पर इसे व्यवस्थित रूप से वर्ष 1989 से कर रहे हैं। इसके लिए गांववालों ने मिलकर वन संरक्षण समिति ( ग्राम वन प्रबंधन एवं संरक्षण समिति,बासाकुटी) का गठन किया है। इसमें अध्यक्ष व सचिव के अलावा गांव के सभी सदस्य हैं।

वे बताते हैं कि पहले गांववालों ने जंगल की रखवाली के लिए चौकीदार रखा था, और उसे हर सप्ताह प्रत्येक घर से एक डिब्बा चावल देते थे। यह व्यवस्था 7 साल तक चली। पर फिर गांववालों ने तय किया कि वे स्वयं मिलकर बारी-बारी से जंगल की रखवाली करेंगे। हर दिन 6 लोग जंगल की रखवाली के लिए जाएंगे। अब गांववाले हर महीने जंगल बचाने पर बैठक करते हैं और बारी-बारी से रखवाली करते हैं। जंगल को किसी भी तरह के नुकसान से बचाते हैं।

वे आगे बताते हैं कि मवेशी व बकरियों के चरने पर रोक लगाई गई और किसी भी प्रकार से जंगल को नुकसान न हो, यह सुनिश्चित किया गया है। इसके लिए हर सप्ताह बैठक में रखवाली करनेवालों व ग्रामीणों से जंगल की जानकारी ली जाती है, जहां कुछ कमी लगती है, या जंगल कम होता है, तो वहां ध्यान दिया जाता है। जंगल को पूरी तरह विश्राम देने का सोचते हैं यानी उसमें से लकड़ियां काटने पर रोक है।

बासाकुटी के वन समिति के सदस्य

बासाकुटी गांव के नौरू सुरीन बताते हैं कि अगर गांव में किसी भी उपयोग के लिए जंगल से लकड़ी चाहिए तो वन समिति की अनुमति लेना जरूरी है। गांववाले जरूरी होने पर ही अनुमति देते हैं। अगर कोई बिना अनुमति के लकड़ी काटता है तो उसको जुर्माना देना होता है। आजू-बाजू के गांवों से जो लोग लकड़ी लेने आते हैं, उन पर भी रोक है। अगर उन्हें घर बनाने या अन्य काम के लिए लकड़ी चाहिए तो समिति तय करके देती है।

सराईड गांव की इको विकास समिति के अध्यक्ष सिमोन हेस्सा ने बताया कि पहले उनके गांव के मरांगबुरू जंगल में आग लगना आम घटना थी। इसका मुख्य कारण महुआ संग्रह के लिए पेड़ के नीचे कचरा व पत्तों में आग लगना है। इस कारण आजू-बाजू के जंगल में आग फैल जाती है, और जंगल नष्ट हो जाता है। इसके अलावा, चरवाहे भी कई बार आग लगा देते हैं। तेंदूपत्ता तोड़ने के पहले लोग आग लगा देते हैं, जिससे उसके पेड़ में अच्छे पत्ते निकले। जंगल में आग की वजह से छोटी-मोटी झाड़ियां,फलदार पेड़ और कंद-मूल इत्यादि सब नष्ट हो जाते हैं। इसलिए हमने जंगल को बचाने के लिए आग बुझाने की कोशिश की।

बासाकुटी गांव की महिलाएं आग बुझाते हुए  

वे बताते हैं कि पहले से ही गांव के युवा आग बुझाने के काम में लगे थे। लेकिन बाद में वनविभाग ने भी इसमें मदद की। आग बुझाने के लिए मशीन दी गई, जिससे आग पर नियंत्रण पाने में मदद मिली। इसके अलावा, जहां जंगल में आग लगी रहती है, उसके आगे के रास्तों की झाड़ियां, पत्ता, छोटी-मोटी टहनियां काटकर एकतरफ हटा देते हैं, जिससे आग पर नियंत्रण पाया जा सके। इसी प्रकार, हरी डालियों से आग को बुझाते हैं, उससे भी आग की तीव्रता कम होती है। इसके साथ ही झारखंड अग्नि शमन सेवा ने भी आग बुझाने में मदद की।

बासाकुटी की सुनीता और पोरलोंग गांव की बहालेन ने बताया कि जंगल से हमें कई तरह की खाने की चीजें मिलती हैं। जंगल से हर मौसम में अलग-अलग सब्जियां व फल-फूल मिलते हैं। चार, बुरूई, जामुन,तेंदू,आम,शरीफा, मीठेश्वर, रोली, बुरूबकरा इत्यादि फल मिलते हैं। हूटेर बा(हो भाषा में फूल को बा कहते हैं), सरजोम बा, जी बा,,मूर बा,  ईचा बा मिलते हैं। इसी प्रकार, सींग आ (हरी पत्तीदार साग), बिलये आ, पीटू आ, सरली आ, मट्टाआ, रिमिलुतुंडू आ इत्यादि हरी भाजियां मिलती हैं। जैसे इन दिनों सारू आ, रिमिल, और वायंग आ की सब्जी मिल रही हैं। इडूर उड (जंगली मशरूम), मुरूम उड, पता उड, सिमडाली उड, शशाक उड,इंदी उड आदि मशरूम मिलते हैं। साल, जामुन, आटीकर, ऊलूऊ, करंज और नीम की दातून मिलती हैं। इसके अलावा, जलावन की लकड़ी तो साल भर मिलती है।

जंगल यात्रा की तैयारी

इस जंगल बचाने की पहल को मजबूती तब मिली जब एकजुट संस्था भी इससे जुड़ गई। चारिबुरू और गुरीबुरू ( पहाड़) में वर्ष 2018 से एकजुट संस्था के सहयोग से युवाओं ने जंगल पहचानो यात्रा शुरू की, जिसका सिलसिला चल रहा है।

एकजुट के विनीत मोहांतो ने बताया कि इस जंगल यात्रा का उद्देश्य युवाओं को पर्यावरण से जोड़ना है। उन्हें जंगल की पहचान करवाना और पारंपरिक त्योहारों में जंगल के महत्व को बताना है, जिससे उनका जुड़ाव प्रकृति, जंगल व पर्यावरण से हो। इससे वे जंगल की विरासत से जुड़ते हैं और उसे सहेजने का काम करते हैं।

एकजुट के कार्यकर्ता मलय प्रधान व अजय बतलाते हैं कि इन यात्राओं में युवा जंगल व गांव के आसपास प्लास्टिक, थर्माकोल और कचरा बीनते हैं, और साफ-सफाई करते हैं। इस यात्रा में गांव के जानकार व बुजुर्ग व्यक्ति भी होते हैं, जो पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों के बारे में जानकारी देते हैं और उनके गुणधर्म के बारे में बताते हैं।

जंगल यात्रा

हाल ही में मुझे एक पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला, जो दोपाई गांव में हुआ था। इसमें युवाओं ने गांव में एक रैली निकाली थी, जिसे देखकर गांववाले भौचक्के रह गए थे। इस रैली का नारा था कि बुरू दारू मीनारे दो, होइयो गामा हुजुए (जंगल पेड़ रहेंगे तो बारिश होगी),माडकम बा अबुआ, बुरू उरूब काबुआ( यानी जंगल नहीं जलाना है, महुआ फूल हमारा है)। इस कार्यक्रम में युवाओं ने एक नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन किया था, जिसमें जंगल को आग से कैसे बचाना है, यह दिखाया गया था। यहां चित्रकला स्पर्धा के माध्यम से जंगल बचाने के बारे में संदेश भी दिया गया।

एकजुट कार्यकर्ता सुरेश पुरती ने बतलाया कि महुआ आदिवासियों का भोजन रहा है। इसके फूल को खाते हैं, फल की सब्जी बनती है और इसका तेल भी पिराया जाता है। तेल पिराने की देशज् तकनीक है जाता की। बासाकुटी में यह जाता अभी भी है, जहां आसपास के कई गांव के लोग महुआ की रोड़ी ( फल), करंज, नीम, सरसों, कुसुम इत्यादि तेल पिराकर ले जाते हैं। और वह भी पूरी तरफ निःशुल्क। आदिवासियों में एक दूसरे की मदद करने की समृद्ध परंपरा रही है, इसका यह अच्छा उदाहरण है।

जैविक खेती के प्रचार-प्रसार में जुटे एकजुट के संजय प्रधान व समरजीत प्रधान बताते हैं कि मिट्टी-पानी व जैव-विविधता के संरक्षण के लिए बिना रासायनिक खेती को बढ़ावा देते हैं। फसलों में कम पानी लगे और उत्पादन ज्यादा हो, इसके लिए धान की मेडागास्कर पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसे श्री पद्धति भी कहते हैं। इस पद्धति में बीज कम लगता है,पानी कम लगता है, श्रम कम लगता है,श्रमिक कम लगते हैं, और उत्पादन ज्यादा होता है। इसके अलावा, पोषण वाटिका के माध्यम से जैविक सब्जियां उगाने पर जोर दिया जा रहा है। जिससे लोगों को अच्छा पोषण मिले और स्वस्थ रहें। बिना रासायनिक व बिना कीटनाशक की जैविक खेती से किसी भी जंगली जानवर व पक्षी का भी कोई नुकसान नहीं होता।

सिमोन हेस्सा व सोमा काडेयांग बतलाते हैं कि इस पूरी पहल का परिणाम हुआ कि जंगल अब बहुत अच्छा हरा-भरा हो गया है। पहले जो पौधे 3-4 फुट के थे, अब वे बड़े पेड़ बन गए हैं। पानी के स्रोत भी सदानीरा हो गए हैं। जब जंगल अच्छा हुआ तो पानी भी भरपूर हो गया और जंगली जानवर भी आ गए। हरे-भरे पेड़- पौधे हैं तो कई तरह के पक्षी देखे जा रहे हैं- मोर, जंगली मुर्गा-मुर्गी, तीतर, बटेर,कबूतर,उल्लू,फड़की, कोयल,गौरेया इत्यादि। अब यहां भालू, शेर, हिरण, सुअर, खरगोश, बंदर भी हैं। पर यहां के लोगों की एक दिक्कत है कि उनकी फसलों को जंगली सुअर और बंदर चौपट कर देते हैं।

कुल मिलाकर, अब यह गांव ईंधन,चारा, पानी, रेशा और जंगल से जुड़े खान-पान के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं। इससे मिट्टी-पानी का संरक्षण होता है।  खेती के औजार व घर बनाने के लिए लकड़ी, शादी-विवाह, परब त्योहार के लिए पत्ते, झाडू,रस्सी इत्यादि की जरूरतें जंगल से पूरी होने लगी हैं। जंगल से खेतों को जैव खाद मिलती है,जिससे मिट्टी उपजाऊ होती है। हरा-भरे जंगल में कई तरह के जीव-जंतुओं का बसेरा है। पक्षी व जंगली जानवर हैं। इसके अलावा, इस पूरी पहल से यह निष्कर्ष निकलता है कि गांवों की आपसी समझ, एकजुटता व एक दूसरे की मदद से वनों को नया जीवनदान मिल सकता है। स्थानीय स्तर पर समुदायों की भागीदारी से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण व संवर्धन किया जा सकता है। आज जब पर्यावरण संकट लगातार बढ़ रहा है, तब इन गांवों ने एक नया रास्ता दिखाया है, जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है। 

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