विकल्प संगम के लिए विशेष रूप से लिखा गया
(Shramyog: Kaise Ek Himalayi Kshetra, Sult, Apna Sashaktikaran Kar Raha Hai)
निधि अग्रवाल द्वारा अंग्रेजी से अनुवादित.
जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान से गुज़रते हुए, मुझे पूरे रास्ते में बाघ के चेहरों वाले बोर्ड नज़र आ रहे थे। मैं सोच रहा था कि उस दिन शायद हमें रास्ते में बाघ मिल जाए। दुर्भाग्य से, या सौभाग्य से, एक भी नहीं दिखा। मेरे साथ शंकर दत्त हैं, जो हमें एक दूरस्थ स्थान सल्ट में ले जा रहे हैं जो कि राष्ट्रीय उद्यान के ‘बफ़र ज़ोन’ में, उत्तराखंड में बसा हुआ है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे, मैं उस जगह की अपने मन में छवि बनाने की कोशिश कर रहा था। सल्ट में 256 गाँव बसे हैं जो कि 138 पंचायतों के अंतर्गत आते हैं और आधिकारिक रूप से वहाँ की जनसंख्या पचास हज़ार है, हालांकि उनमें से कई लोग काम के लिए बाहर पलायन कर गए हैं और असल जनसंख्या का अनुमान उससे आधी संख्या का है, जिसमें ज़्यादातर महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग हैं। क्षेत्र में प्रवेश करते ही, मुझे पूरे इलाके में फैले छोटे-छोटे गाँव दिखाई देते हैं जैसे कि जंगल की चादर पर सफ़ेद बिन्दु। शंकर श्रमयोग के संस्थापक सदस्यों में से एक है, एक ऐसा प्रयास जिसकी शुरुआत वर्ष 2011 में उन्होंने और अजय कुमार ने मिलकर की – जो चाहते थे कि सल्ट के लोगों का सशक्तिकरण हो। श्रमयोग क्षेत्र की महिलाओं और युवाओं के सशक्तिकरण के लिए एक उत्कृष्ट प्रयोग कर रहा है, जिससे कि वे अपने रोज़मर्रा के और लंबे समय के मुद्दों का समाधान कर सकें।
हमारे सल्ट पहुंचते ही, शंकर ने बड़े प्रेम से अपने घर चाय पीने के लिए आमंत्रित किया, जहां उनके माता-पिता भी साथ रहते हैं। शंकर का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ था और उनका जीवन का सफ़र काफ़ी दिलचस्प रहा है। उन्होंने अपनी पढ़ाई और काम के लिए अपना गाँव छोड़ दिया, लेकिन फिर उन्होंने वापस आकर अपने लोगों की सेवा करने का निर्णय लिया। “हमने श्रमयोग की शुरुआत एक शोषण-मुक्त समाज, जहां हम सब प्रकृति और दूसरे लोगों के साथ सामंजस्य में जियें – इस सपने के साथ की थी। हम चाहते थे कि श्रमयोग एक लोक संस्था बने जो लोगों की आवश्यकताओं के आधार पर, लोगों द्वारा ही चलाई जाए”, शंकर जोर देकर कहते हैं। “तो जब हम यहाँ पहुंचे तो हम लोगों के पास गए और उनसे पूछा कि उन्हें क्या चाहिए। हमने एक ‘अध्ययन यात्रा’ की, जिसमें गाँव- गाँव में घूमकर हमने उनकी ज़रूरतों और आकांक्षाओं को समझा।” उन्होंने बताया कि शुरुआत में लोगों की भागीदारी बहुत कम रही। तब उन्हें अहसास हुआ कि पहला कदम है लोगों को संगठित करना। फिर उन्होंने गांवों की महिलाओं को संगठित करना शुरू किया और “रचनात्मक महिला मंच” स्थापित किए – महिलाओं के ऐसे समूह जो अब नियमित तौर पर मिलते हैं और मुद्दों पर चर्चा करते हैं, जानकारी बांटते हैं और सामूहिक गतिविधियां करते हैं। पिछले वर्षों में, महिलाओं के इस समूह ने कई छोटे बड़े मुद्दे उठाए हैं। चूंकि सल्ट बाघ आरक्षित क्षेत्र के बफ़र ज़ोन में है, यहाँ जानवरों-वन्यजीवों के बीच काफ़ी संघर्ष रहता है, जिसके कारण मवेशी मारे जा रहे हैं और मनुष्यों को भी खतरा पहुँच रहा है। महिला संगठन ने राज्य सरकार से मुआवज़े की राशि रु. 4 लाख से बढ़ा कर रु. 6 लाख करने की पैरवी की, जिसे सरकार ने स्वीकार किया। यह समूह वर्ष में एक बार नवंबर माह में दो-दिवसीय बैठक करता है, जिसे ‘सल्ट महिला महोत्सव’ के नाम से जाना जाता है। इस बैठक में वे पिछले वर्ष की गतिविधियों का जायज़ा लेते हैं और भविष्य की कल्पना करते हैं। इस बैठक में खूब चर्चाएं, सांस्कृतिक गतिविधियां और जश्न मनाया जाता है।

शंकर समझाते हैं कि श्रमयोग तीन मूलभूत सिद्धांतों पर काम करता है – सहयोग, शिक्षा और संगठन। श्रमयोग का उद्देश्य है इन सिद्धांतों को अपनी गतिविधियों और प्रयासों द्वारा मज़बूत बनाना। यह इसलिए कि समुदाय आंतरिक रूप से सशक्त हो और बाहरी संस्थाओं पर निर्भर न रहे। पहला सिद्धांत है संगठन जिसका उद्देश्य है अलग-अलग मंचों पर लोगों को संगठित करना। महिलाओं को “महिला मंच” के अंतर्गत संगठित किया गया है तो युवाओं को “युवा मंच” के तहत और बच्चों को “बाल मंच” के तहत। इन सभी मंचों का एक ढांचा है और उनकी नियमित बैठकें और आयोजन होते हैं जिससे कि वे सक्रिय बने रहें। दूसरा सिद्धांत है “शिक्षा” जिसमें विभिन्न शिक्षात्मक गतिविधियां और ऐसे विषयों पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं जो लोगों के लिए उपयोगी हों, जैसे कि स्वास्थ्य, आजीविकाएं, प्रशासन, पर्यावरण आदि। शंकर मुझे बताते हैं कि पिछले कुछ दिनों से वे “प्राकृतिक प्लीज़” बूटकैम्प आयोजित करने में लगे हुए हैं, जिससे कि लोग स्वस्थ पोषण और प्राकृतिक भोजन का महत्व जान सकें – यह इस सिद्धांत के काम करने का एक अच्छा उदाहरण है। और तीसरा सिद्धांत है “सहयोग” जिसका मतलब है लोगों को श्रमयोग से जिस भी प्रकार का सहयोग चाहिए हो, कुछ ऐसा करने के लिए जो उनकी क्षमता से बाहर हो। यह आखिर में इसलिए आता है क्योंकि श्रमयोग की परिकल्पना यह है कि लोग किसी बाहरी मदद से पहले खुद काम करने के लिए सशक्त हों।
चाय पीने के बाद, हम श्रमयोग के ऑफिस गए। यह एक छोटी-सी सुंदर जगह है, जिसके सामने पहाड़ियाँ हैं। वहाँ मुझे दो युवा टीम के सदस्य मिले, विक्रम और आसना, जो बड़े उत्साह के साथ वहाँ पिछले पाँच वर्षों से अधिक से काम कर रहे हैं। श्रमयोग टीम का गठन बहुत सोच-समझ कर किया गया है। टीम के सदस्य सेवा की भावना से काम करते हैं। संस्था को ज़्यादातर छोटे-छोटे दानदाताओं से दान मिलता है, और ज़रूरी नहीं है कि हमेशा पैसा रहे। टीम के सदस्य अपनी आजीविका चलाने के लिए अलग-अलग कन्सल्टन्सी लेते हैं, जिससे कि श्रमयोग का काम बिना किसी वित्तपोषण के भी जारी रह सके।

मेरी मुलाकात हरदीप नाम के एक किशोर से हुई, जो गाँव में ही बड़ा हुआ लेकिन अब शहर में काम करता है। वह गाँव में एक शादी में शामिल होने के लिए आया हुआ था। मैंने उनसे उनके काम के बारे में बात की और जानने की कोशिश की कि देश में जो भी चल रहा है उसके बारे में वे क्या सोचते हैं। मैं उनकी दुनिया की घटनाओं के बारे में जानकारी और जागरूकता से प्रभावित हुआ, इसलिए मैंने उनसे पूछा कि उन्हें यह सब कैसे पता है। उन्होंने मुझे “बाल मंच” के बारे में बताया जिसे बनाने में श्रमयोग ने सहयोग किया था। इस मंच का हिस्सा होने के नाते युवाओं को अपने आसपास की दुनिया को समझने और अपनी बात कहने का मौका मिलता है। कुछ युवा अब बड़े हो गए हैं और अपने समुदाय में सक्रीयता से भागीदारी करते हैं।
अगले दिन मेरी मुलाकात ऐसे ही एक युवा से हुई जिनका नाम है विजय और पंचायत के चुनाव लड़ने के बाद, अब वे सक्रीयता से सेवा का काम करते हैं। मैंने उनसे पूछा कि उन्हें चुनाव लड़ने की प्रेरणा कहाँ से मिली, जिस पर उन्होंने बताया कि लोग उनके साथ थे और इसलिए उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीते भी। मेरी मुलाकात देवकी देवी से भी हुई, जो एक ‘श्रम सखी’ हैं, जिनका काम है 7-8 गांवों की महिलाओं को संगठित करना। श्रम सखियाँ मासिक बैठक आयोजित करने में मदद करती हैं जहां महिलाएं अपने मुद्दों पर चर्चा करने के साथ-साथ जानकारियाँ साझा करती हैं और गतिविधियों की योजना बनाती हैं। “जब यह शुरू हुआ था, तब गांवों में महिलाओं को संगठित करना आसान नहीं था, क्योंकि यह मान्यता थी कि औरतों को चारदीवारी के अंदर रहना है। पुरुष औरतों को बाहर भेजने और इस तरह से संगठन में जुड़ने से हिचकिचाते थे,” देवकी देवी ने बताया। समय के साथ-साथ, श्रम सखियों के अच्छे काम को देख कर, अब इसको ज़्यादा स्वीकार्यता मिली है। संगठन की सभी महिलाएं वर्ष में एक बार बैठक करती हैं, नवंबर माह के आखिरी रविवार के दिन और वहाँ जश्न मनाने के साथ-साथ, योजना बनती हैं और अपनी कहानियाँ साझा करती हैं। उस दिन सांस्कृतिक आयोजन और उत्सव मनाया जाता है।

श्रमयोग ने “श्रमयोग पत्र” नाम का एक स्थानीय अखबार चलाने में भी सहयोग किया है, जो हर महीने प्रकाशित होता है और उससे लोगों को स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय खबरें पता चलती हैं। इसके 5000 स्थानीय और 30000 ऑनलाइन पाठक हैं। महिलाएं अपने मुद्दों के बारे में लिखती हैं और उपयोगी उपाय भी साझा करती हैं। स्थानीय खबरें साझा की जाती हैं। इस समाचारपत्र ने सल्ट की महिलाओं और लोगों को सशक्त करते हुए उन्हें अपनी एक आवाज़ दी है। काफ़ी संख्या में पाठक होने के साथ अपनी चुनौतियाँ और दबाव भी आते हैं, खासकर राजनीतिक दबाव कि उनके पक्ष में संपादकीय लिखे जाएं, लेकिन अभी तक टीम ऐसे किसी दबाव में नहीं आई है और चुनावी राजनीति से इसे बचाते हुए, क्षेत्र के मुद्दों पर अपना ध्यान कायम रख पाई है। यह समाचारपत्र ज़्यादातर स्थानीय लोगों द्वारा दी जाने वाली फीस से ही वित्तपोषित है।

वापस जाने से पहले, मैं “श्रम उत्पाद” नाम की दुकान में गया जहां स्थानीय उत्पाद, जैसे कि हल्दी, लाल मिर्च, साबुन और अन्य गाँव में बनी रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ें बिकती हैं। यह एक छोटी-सी दुकान है जहां स्थानीय उत्पाद रखे रहते हैं। इससे गाँव वालों को अतिरिक्त आमदनी करने का मौका मिलता है। इस प्रयास ने गाँव वालों का सीधा उपभोक्ता से संपर्क स्थापित करने में मदद की है जिससे कि उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं, जो कि पहले बिचौलियों के शोषण का शिकार थे। शंकर बताते हैं कि पहले गाँव वालों को उनके उत्पाद के लिए आधा दाम ही मिलता था, लेकिन अब उन्हें अपने उत्पादों का सही मूल्य मिलता है और वे मोल-भाव करने के लिए भी सशक्त हो गए हैं। शंकर ने मुझे दुकान से एक हल्दी का पैकेट दिया, जिसे मैंने आभार सहित स्वीकार किया।
दुकान के बाद, मैंने रामनगर के लिए बस पकड़ ली, जो कि पास का एक शहर है। मुझे लोगों की स्वयं संगठित होने की शक्ति और मिलकर अपने मुद्दों का समाधान करने से प्रेरणा मिली। श्रमयोग ने क्षेत्र में परिवर्तनकारी प्रक्रिया को मजबूत किया है जो समुदाय का सशक्तिकरण करती है, बजाए इसके कि उन्हें सीधे मदद दी जाए। इस तरीके से सीखना ज़रूरी है, जो कि गैर-सरकारी संस्थाओं और सरकार द्वारा सहायता देने के पारंपरिक तरीके से अलग है, जो लोगों को उन पर निर्भर बना देती हैं और जब सहयोग बंद हो जाता है तो वे असहाय हो जाते हैं। सल्ट क्षेत्र में श्रमयोग का काम दर्शाता है कि अगर हम स्थायी परिवर्तन लाना चाहते हैं तो समुदाय को संगठित करने का मौलिक काम बेहद महत्वपूर्ण है।
लेखक के बारे में
चंद्रमौली कल्पवृक्ष समूह की वैकल्पिक टीम के साथ काम करते हैं, जहाँ वे विकल्प संगम नेटवर्क के समन्वय में मदद करते हैं और वैकल्पिक विषयों पर पाठ्यक्रम तैयार करने में सहयोग करते हैं। वे पारिस्थितिक और मानवीय संकटों के समय में नागरिक सशक्तिकरण और जमीनी स्तर पर बदलाव के प्रति समर्पित हैं। उनका मानना है कि आंतरिक परिवर्तन ही दुनिया में बाहरी परिवर्तन ला सकता है।
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