पौष्टिक अनाजों की वापसी की पहल (In Hindi)

By बाबा मायारामonMar. 03, 2026in Environment and Ecology

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially Written for Vikalp Sangam)

(Paushtik Anaajon ki Vaapsi ki Pahal)

फोटो क्रेडिट- नरेश विश्वास


पौष्टिक अनाजों की खेती के लिए महिला और बच्चों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है। पारेंपरिक भोजन बनाने का प्रशिक्षण व बाल मेला आयोजित किए जा रहे हैं।

मध्यप्रदेश में आदिवासियों के बीच पौष्टिक भोजन की वापसी की पहल की जा रही है। इस पहल से विशेष तौर पर महिलाओं और बच्चों को जोड़ा जा रहा है। महिलाओं को पारंपरिक भोजन व व्यंजन बनाने का प्रशिक्षण और स्कूली बच्चों के लिए बाल मेला आयोजित किए जाते हैं। साथ ही जगह-जगह देशी बीजों व जैव विविधता की प्रदर्शनी लगाई जाती है। 

इस पहल की अगुआई निर्माण संस्था ने की है। इस संस्था का काम मुख्य रूप से मैकल पर्वत श्रृंखला केकई बैगा गांवों में है, जहां से नर्मदा व सोन नदी निकलती है। यह संस्था मंडला- डिंडौरी जिले के आदिवासियों के बीच बेंवर खेती को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है। इसके साथ मध्यप्रदेश के पातालकोट, छत्तीसगढ़ के पहाड़ी कोरवा व अनूपपुर के आदिवासियों में भी इस संस्था ने पौष्टिक अनाजों की खेती को प्रोत्साहित किया है।

निर्माण संस्था के नरेश विश्वास बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक पौष्टिक अनाज की खेती को आदिवासी भूल चुके थे। उनके पास देशी बीज भी बहुत कम बचे थे, या नहीं थे। शुरूआत में वे गांव-गांव गए, देशी बीजों की तलाश की, और बीज एकत्र किए। आदिवासियों को इन बीजों को बोने के लिए तैयार किया। बीजों का आदान-प्रदान किया, जिससे फिर से इनकी वापसी हो रही है।

वे बताते हैं कि चूंकि महिलाओं की खेती में बड़ी भूमिका है, वे इसमें विशेष रूचि लेती हैं। वे बोने से लेकर फसल कटाई तक बहुत काम करती हैं। बीजों की सार-संभाल करती हैं। बीजों का आदान- प्रदान करती हैं। अगर उन्हें उनके मायके में अच्छे बीज मिलते हैं, तो वे वहां से बीजों को लाती हैं और उसे बोती हैं, इस तरह देशी बीजों का प्रचार-प्रसार होता है। 

जैव विविधता प्रदर्शनी

इसी के मद्देनजर संस्था ने बीजों की रिश्तेदारी नामक मुहिम चलाई, जिसमें बीजों की पहचान, उसके गुणधर्म जानना और उनका आदान-प्रदान करना। इस तरह मध्यप्रदेश के बीज देश के कई इलाकों में पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। देशी बीजों की पौष्टिक अनाजों की खेती को बढ़ावा मिल रहा है।

नरेश विश्वास बताते हैं कि पौष्टिक भोजन को रूचिकर व स्वादिष्ट बनाने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। लड्डू, खिचड़ी, पुलाव, बिस्कुट, खीर बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। जैव विविधता प्रदर्शनी के माध्यम से इनकी पहचान कराई जाती है, और तौर-तरीके बताए जाते हैं। पौष्टिक अनाजों के पोस्टर छपाए गए हैं, जिन्हें प्रदर्शनी में लगाया जाता है। इन पोस्टरों में कांग, मड़िया, कोदो, कुटकी इत्यादि के पोषक तत्त्वों के बारे में बताया गया है।

संस्था की कार्यकर्ता मुनिया मस्कोले ने कई स्थानों पर जैव विविधता प्रदर्शनी लगाई है। लड्डू, खीर, पुलाव, खिचड़ी बनाने का प्रशिक्षण दिया है। मध्यप्रदेश डिंडौरी, मंडला, छत्तीसगढ़ के अनूपपुर, बिलासपुर, जशपुर में प्रशिक्षण दिया है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में जन स्वास्थ्य सहयोग की महिला कार्यकर्ताओं के साथ व्यंजन बनाने का कार्यशाला की है।

मुनिया मस्कोले देशी बीजों को प्रदर्शित करते हुए

जन स्वास्थ्य सहयोग बिलासपुर जिले के आदिवासियों के बीच जैविक प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है। संस्था का मानना है कि पौष्टिक अनाजों में शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी पोषक तत्त्व मौजूद हैं। अगर लोग इनकी खेती करेंगे और भोजन में इन्हें शामिल करेंगे तो बीमारी की रोकथाम होगी। यह संस्था बीमारी के इलाज के साथ उसकी रोकथाम पर भी जोर देती है। पौष्टिक अनाजों के भोजन में होने से कुपोषण भी कम होता है। यानी पौष्टिक अनाज न केवल पोषक तत्त्वों की दृष्टि से बल्कि चिकित्सकीय व औषधीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।

इसके अलावा, संस्था ने सरकारी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भागीदारी की है। हाल ही में भोपाल के मानव संग्रहालय और कटनी में प्रदर्शनी लगाई थी। मुझे स्वयं कई बार उनकी जैव विविधता प्रदर्शनी को देखने का मौका मिला है। गांव से लेकर देश के कई कोनों में यह प्रदर्शनी लगाई गई है। महाराष्ट्र के वर्धा में मैंने यह प्रदर्शनी देखी थी। यहां कई किसान व महिलाओं ने न केवल प्रदर्शनी को देखा, बल्कि बीजों की जानकारी ली, बीज लिए, और व्यंजन बनाने के तौर-तरीके भी सीखे। इसी प्रकार, पातालकोट में एक जैव प्रदर्शनी में मुझे शामिल होने का मौका मिला था। जहां पर मुनिया मस्कोले जी ने महिला समूहों के साथ मिलकर कोदो-कुटकी की खिचड़ी, महुआ के लड्डू, खीर और बिस्कुट बनाए थे।

नरेश विश्वास कहते हैं कि हम स्कूली बच्चों के साथ भी बाल मेला, और जंगल यात्राएं करते हैं। जिससे उन्हें पौष्टिक अनाजों, गैर कृषि खाद्य (अनकल्टीवेटेड फूड) से जोड़ा जा सके। उनकी पहचान कराई जा सके,  उनके गुणधर्मों से अवगत कराया जा सके। उन्होंने बताया कि देशी मक्के के खेत में कई तरह की कुदरती हरी पत्तीदार भाजियां मिलती हैं। 

देशी मक्के की किस्में

पिछले साल मुझे स्कूली बच्चों के साथ जंगल में पेड़ पौधे, खाद्य पदार्थ जानने, पहचानने और वन खाद्य चखने का मौका मिला मिला। कोदो का भात, और जंगली हरी पत्तीदार भाजियां भोजन में शामिल थीं। हम बच्चों के साथ जंगल में घूमे थे। इस कार्यक्रम को वन कलेवा नाम दिया गया था। यानी जंगल से मिलने वाला भोजन, जो कुदरती तौर पर उपलब्ध है। जंगल से मिलने वाली भोजन की थाली भी इसे कह सकते हैं।

स्कूली बच्चों की जंगल यात्रा में उनके शिक्षक, गांव के बुजुर्ग और चरवाहे शामिल थे। गांव के बुजुर्गों ने कई तरह की जड़ी-बूटियां से बच्चों की पहचान कराई। कई तरह की हरी पत्तीदार भाजियां दिखाईं और एकत्र कीं। बाद में जंगल में स्थित देव के पास कुटकी का भात पकाया गया और जंगल से एकत्र की गईं हरी पत्तीदार की भाजियों की सब्जी बनाई। सामूहिक रूप से मिलकर इसे पकाया और स्वादिष्ट खाना खाया। यह अनोखा कार्यक्रम था। इससे बच्चों को उनके आसपास के जंगल और जैव विविधता को जानने का मौका मिल रहा था। निर्माण संस्था के नरेश विश्वास ने बहुत मेहनत से वन खाद्यों के बारे में कुछ पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की हैं। 

इसी प्रकार, मुझे यहां एक जैव-विविधता प्रदर्शनी में शामिल होने का मौका मिला था। यह निर्माण संस्था द्वारा आयोजित थी, जो इस इलाके में देशी बीजों की जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रदर्शनी में कई तरह के अनाज जैसे तुअर दाल, डोंगरा सावां, भदेली, बेउरी, कोदो, मडिया, करिया कंगनी, कुसमुसी, जगनी, ज्वार, सिकिया, रजगिरा, बाजरा, काली कुरथी, दूधिया मक्का थे।

इसके अलावा, बल्लर, बरबटी, लौकी, गिलकी, लाल सेमी इत्यादि के बीज शामिल थे। इन अनाजों से कई तरह के व्यंजन बनाकर भी टेबल पर सजाए गए थे। जैसे कुटकी पापड़, सावां चटली, कोदो पापड़ी, मड़िया पापड़ी, मड़िया सेव, कोदो चाटला, बाजरा के बड़े, महुआ हलवा, सावां के लड्डू, कोदो के लड्डू, ज्वार के लड्डू, महुआ का भुरका, कोदो पुलाव, कुटकी खीर, सावां की खिचड़ी, ज्वार का भात, मड़िया का हलवा इत्यादि।

मुनिया मस्कोले बताती हैं कि बच्चों को लड्डू, बिस्कुट बहुत पसंद आते हैं। और इसी के साथ उनके परिवारजन भी खाते हैं। इसलिए प्रदर्शनी इसकी शुरूआत भर है। बाद में इसे वे खुद बनाते और खाते हैं। आदिवासी तो पहले से ही इन्हें जानते और खाते थे, इसलिए वे जल्दी इससे जुड़ जाते हैं।

वे आगे बताती हैं कि उनका काम बैगा समुदाय में बीजों को बचाने और उनको खेतों में वापस लाने के लिए प्रेरित करना है। वे कोदो बिस्कुट, रागी बिस्कुट बनाती हैं। इनको बनाने के लिए प्रशिक्षण देती हैं। महुआ लड्डू, दलिया और सत्तू भी बनाती हैं। कोदो, कुटकी, सांवा की खिचड़ी व खीर भी बनाती हैं।

इसके पहले संस्था ने कई बरसों तक बेंवर खेती को बढ़ावा दिया है, जिसमें पौष्टिक अनाज ही बोए जाते हैं। बेंवर खेती बिना जुताई की जाती है। ऐसी मान्यता है कि हल से धरती मां की छाती पर घाव होगा और उसे पीड़ा होगी। उसे नुकसान होगा। ग्रीष्म ऋतु में पेड़ों की छोटी-छोटी टहनियां, पत्ते, घास और छोटी झाड़ियों को एकत्र कर उनमें आग लगा दी जाती है और फिर उसकी राख की पतली परत पर बीजों को बिखेर दिया जाता है। जब बारिश होती है तो उन बीजों में अंकुर आ जाते हैं। धीरे-धीरे उगे पौधे बड़े होते हैं। और फसलें लहलहा जाती हैं। धरती मां की इस फसल को देखकर किसी भी किसान का दिल उछल सकता है। 

एक जगह पर एक वर्ष में खेती की जाती है। अगले साल दूसरी जगह पर खेती होती है। इसे खेती को स्थानांतरित खेती (शिफ्टिंग कल्टीवेशन) कहते हैं। हालांकि अब इसका संशोधित रूप प्रचलन में है। अब स्थान की कमी के कारण एक ही खेत को तीन साल तक बोने लगे हैं। 

कोदो, कुटकी, ज्वार, सलहार ( बाजरा), मक्का, सांवा, कांग, कुरथी, राहर, उड़द, कुरेली, बरबटी, तिली जैसे अनाज बेंवर खेती में बोये जाते हैं। राहर, भालू सल्हार, पडरा सल्हार, सलेरी, झुंझरू, रवांश, कांग, मडिया,डोंगर कुटकी, भालू सल्हार, डोंगर राहर, इसे बैगा राहर भी कहते हैं। कारी कांग, कतकी कांग, ( भात ), रसेड़ी कुटकी, बिजरा, बेदरा, सांवा,इसमें 16 प्रकार के अनाज बोते हैं। इन 16 अनाजों की 50 से ज्यादा किस्में हैं।

जैव विविधता प्रदर्शनी

चूंकि इस खेती में बैलों का उपयोग नहीं है। इसलिए ज्यादातर काम हाथ से करना होता है। और खेती का अधिकांश काम महिलाएं करती हैं। खेत तैयार करना, बोवनी, निंदाई-गुड़ाई, कटाई और बीजों का भंडारण करना आदि काम करती हैं। इसके अलावा, वे ही पैरों से लकड़ी से अनाज को कूटती हैं। ओखली में कूटकर उसके छिलके निकालती हैं और भोजन पकाकर सबको खिलाती हैं।

बेंवर खेती के बारे में नरेश विश्वास बताते हैं कि यह खेती जैविक, पर्यावरण के अनुकूल और मिश्रित है। यह खेती सुरक्षित भी है। चूंकि इसमें मिश्रित खेती होती है, अगर एक फसल मार खा गई तो दूसरी से इसकी पूर्ति हो जाती है। इसमें कीट प्रकोप का खतरा भी नहीं रहता। इसमें रासायनिक खाद की जरूरत भी नहीं होती।

यह खेती संयुक्त परिवार की तरह है। एक फसल दूसरी की प्रतिस्पर्धी नहीं है, बल्कि उनमें सहकार है। एक से दूसरी को मदद मिलती है। मक्के के पौधे कुलथी को हवा से गिरने से बचाते हैं। फल्लीवाले पौधों के पत्तों से नत्रजन मिलती है। कुछ अनाजों को बीमारी व बच्चे जन्मने पर महिलाओं को खिलाया जाता है। यानी ये अनाज बीमारी में उपचार के काम में आते हैं।

इन अनाजों में शरीर के लिए जरूरी सभी पोषक तत्त्व होते हैं। रेशे (फाइबर), लौह तत्त्व, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन व अन्य खनिज तत्त्व मौजूद हैं। चावल व गेहूं के मुकाबले इनमें पौष्टिकता अधिक होती है। 

इससे दाल, चावल, पेज ( सूप की तरह पेय),दाल,सब्जी सब कुछ मिलता है। कुछ ऐसी भी उपज मिलती है, जिसका बाजार में दाम ज्यादा है। जैसे बैंगनी राहर, यह बाजार में महंगी बिकती है। पेज, कोदो व मक्का का पेय होता है जिसमें स्वाद के लिए नमक डाल दिया जाता है। यह गरीबों का भोजन होता है। कम अनाज और ज्यादा पानी। खाना खाते समय अगर मेहमान आ जाए तो उतने ही अनाज में पानी की मात्रा बढ़ा दी जाती है। 

इसके साथ गैर खेती भोजन भी बैगाओं की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है। कंद-मूल, हरी पत्तीदार भाजियां, फल-फूल, पत्ते, जंगली मशरूम, मछली व केकड़े इत्यादि। यह सब जंगल, झरने व नदियों से मिलते हैं। कंद-मूल में कनिहाकांदा, डोनचीकांदा, कडुगीठकांदा, बैचांदीकांदा, लोडंगीकांदा, सैदूकांदा आदि हैं। इसी प्रकार, जंगली मशरूम की कई प्रजातियां हैं। बेंवर खेती से खाद्य सुरक्षा बनी रहती है। एक के बाद एक फसल पकती जाती है और उसे काटकर भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

गौरा कन्हारी गांव के प्रेमसिंह, भुरकुदिया, सनमतिया ने बेंवर के काम को आगे बढ़ाया है। पातालकोट के भगलू चिथलिया ने कहा कि जंगल से हमारा मां-बेटे का रिश्ता है.. जितनी जरूरत है उतना ही जंगल से लेते हैं। नई पीढ़ी को भी जंगल बचाकर रखना है” हमें पेड़ों की छांव चाहिए, अच्छी हवा चाहिए, पानी चाहिए, पेड़ रहेंगे तो पानी भी मिलेगा। जंगल से खाने के लिए पौष्टिक कंद-मूल, हरी भाजियां व फल-फूल मिलते हैं। पातालकोट में तो अब भी वन कलेवा (जंगल के कांदा व फल का नाश्ता) करने का चलन है। इसी प्रकार, गौरा कन्हारी गांव के प्रेमसिंह, भुरकुदिया, सनमतिया ने बेंवर के काम को आगे बढ़ाया है।

कुल मिलाकर, बेंबर खेती की विविध खेती, जैव विविधता प्रदर्शनी, पौष्टिक अनाजों का प्रशिक्षण, बाल मेला, यह सभी प्रयास पौष्टिक अनाजों को फिर से चलन में लाने के लिए हैं। इससे भोजन में विविधता, स्वादिष्टता तो बढ़ती है, रोगों की रोकथाम भी होती है। इस प्रकार खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, जैव विविधता, पर्यावरण की रक्षा और मौसम बदलाव सभी दृष्टि से उपयोगी है। बच्चों को उनके आसपास के जंगल पहचानने, गुणधर्म जानने व जैव विविधता से जोड़ने के लिए उपयोगी है। समुदाय के साथ मिलकर जैव विविधता के संरक्षण व संवर्धन की भी यह अच्छी पहल है। महिला सशक्तीकरण का भी यह अच्छा उदाहरण है। यह पहल सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।


लेखक के बारे में

बाबा मायाराम, स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं, वे लम्बे समय से विकास व पर्यावरण के मुद्दों पर लिखते हैं.

लेखक से संपर्क करें.

Story Tags: , , , , , , ,

Leave a Reply

Loading...