विकल्प संगम के लिए विशेष रूप से लिखा गया
(Kritrim Rangon Se Kaise Bach Sakte Hain)
सभी फोटो – बसंत फुटाणे
कृत्रिम रंगों के खिलाफ छोटी पहल रंग ला रही है, धीरे-धीरे इससे लोग जुड़ने लगे हैं
“हम अपने भोजन, वस्त्र, घरों की साज-सज्जा, पूजा सामग्री में कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि इससे मनुष्यों के साथ मिट्टी, पानी और वातावरण का प्रदूषण होता है। इस छोटी पहल से हमें, हमारे पड़ोसियों को, मित्रो, समुदाय के लोगों को इस दुष्प्रभाव से बचने में मदद मिली है।” यह कहना है महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता बसंत फुटाणे का, जिन्होंने कृत्रिम रंगों के खिलाफ मुहिम चलाई है।
बसंत फुटाणे, अमरावती जिले के रवाला गांव के निवासी हैं। यह गांव वरूड तालुका में स्थित है। उनके पास 30 एकड़ जमीन है और वे इसमें प्राकृतिक खेती करते हैं, जो पूरी तरह विष-मुक्त व पर्यावरणस्नेही है।
वे वृक्ष खेती करते हैं। उनके खेत में आम के 300, और संतरा के 500 पेड़ हैं। आंवला, रीठा, बेर, भिलावा, महुआ, दक्खन इमली, इमली, तेंदू, अगस्त्य, अमलतास, मुनगा, कचनार, चीकू, अमरूद, जामुन, सीताफल, करौंदा, पपीता, बेल, कैथ, इमली, रोहन, नींबू, नीम इत्यादि के फलदार व छायादार पेड़ हैं।
उन्होंने रहने के लिए मिट्टी का घर भी बनाया है। उनका कहना है कि मिट्टी के घर करीब 200 साल तक बने रह सकते हैं। इनमें पीढ़ी दर पीढ़ी लोग रह सकते हैं। इनके टूटने के बाद भी इनकी सामग्री पुन: इस्तेमाल की जा सकती है। दूसरी तरफ कंक्रीट-सीमेंट के घरों की उम्र करीब 50 साल की होती है। उनके मलबे के निपटान की लागत भी चिंता का विषय है। उसमें भी बहुत ऊर्जा (डीजल) लगती है। सीमेंट और गिट्टी बनाने के लिए हर साल पहाड़ों को नष्ट किया जा रहा है, उन्हें तोड़ा जा रहा है। अगर हम यह कल्पना करें कि देश के सभी घर सीमेंट-कंक्रीट में परिवर्तित हो जाएं तो इसकी आर्थिक व पारिस्थितिकीय कीमत क्या होगी?
इसी तरह उन्होंने कृत्रिम और विषैले रंगों की बजाय प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। हालांकि यह छोटी पहल है, लेकिन यह उनकी जीवनपद्धति का हिस्सा है। इसी तरह की जीवनशैली प्रकृति के साथ जुड़ी होती है, जिसमें किसी भी तरह का पर्यावरण का नुकसान नहीं होता है।
इसकी शुरूआत उन्होंने उनके परिवार से की है, जिसमें अब दूसरे भी जुड़ने लगे हैं। प्रतिवर्ष बैलों व पशुओं का पोला त्यौहार होता है। इस मौके पर बैलों को नहलाया जाता है, रंग-बिरंगे फीतों से सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। पहले बैलों को लाल गेरू व पीली मिट्टी के निशान लगाते थे। लेकिन अब ऑईल पेंट लगता है। इसमें फुटाणे परिवार ने पुनः पारंपरिक तरीका अपनाया है।
बसंत फुटाणे बताते हैं कि बैलों का त्यौहार पोला होता है। खेती में बैलों का और पशुओं का महत्वपूर्ण स्थान है। खेती और पशुपालन पूरक हैं। इसलिए किसान बैलों की पूजा करते हैं। उन्हें गेरू मिट्टी से रंगते है और पूजा करते हैं। गेरू मिट्टी का आज भी महत्व है। गेरू जंतुनाशक होती है। बारिश में पशु के जख्मों के उपचार में भी काम आती है।
वे आगे बताते हैं कि बैलों के सींग पहले गेरू से रंगते थे। किन्तु आज आकर्षक ऑईल पेंट का इस्तेमाल होता है, जो महीनों तक बैलों के सींगों में चिपका रहता है। इससे पशु को तकलीफ होती होगी। सींग के छेद ऑईल पेंट के कारण बंद होते हैं। पशु के पूरे शरीर पर गेरू से निशान भी लगाते थे। रंग-बिरंगी रस्सी व फीतों से उन्हें सजाते थे। आज बाजार के रासायनिक, जहरीले किन्तु आकर्षक रंग ने ले ली है। पशु वह रंग चाटते हैं और बीमार होते हैं। दीपावली, होली के अवसर पर भी गाय, भैंस, बकरी आदि के साथ ऐसा ही व्यवहार कर रहे हैं। यह कई तरह के हानिकारक है और सेहत पर विपरीत प्रभाव डालता है।
बसंत फुटाणे बताते हैं कि इसमें कुछ रंग दीर्घकालिक और अति घातक भी होते हैं। पहले ऐसे त्यौहारों में वनस्पतिजन्य रंगों का ही इस्तेमाल होता था। किंतु आकर्षक तथा सस्ते होने के कारण इन रसायन रंगों का धडल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। मानव के स्वास्थ्य के साथ पर्यावरण पर भी घातक परिणाम हो रहे हैं।
इसी प्रकार, खाद्य पदार्थों में भी कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल होता है। आईसक्रीम, दूध, दही, मिठाईयों में कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल होता है। बच्चों के खाद्य पदार्थ आकर्षक बनाने के लिए इन रंगों का उपयोग होता है। जंक फूड में भी कृत्रिम रंग होते हैं, इन रंगों में पोषण नहीं होता, बल्कि यह नुकसानदेह होते हैं।

बसंत फुटाणे ने बताया कि त्यौहारों पर रंगोली भी कृत्रिम रंगों से बनाई जाती है, इसकी जरूरत नहीं है। वे घर में पिछले चार-पांच दशक से रंगोली बनाने के लिए प्राकृतिक तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं। फूलों और पत्तियों से भी रंगोली बनाई जा सकती है। सफेद ( प्राकृतिक) रंगोली को हम हल्दी, पालक आदि से बना सकते हैं, यह सामग्री घर के आसपास उपलब्ध है, जो पर्यावरणस्नेही होती है।
पारंपरिक तौर पर होली का त्यौहार प्राकृतिक रंगों से मनाते आ रहे हैं। जैसे पलाश के फूलों को उबालकर रंग बनाया जाता था, जो काफी अच्छा रंग होता था। दीवाली में भी चौक इत्यादि आटे से बनाए जाते थे। मिट्टी के दीया जगमग करते थे। गोवर्धन पूजा के दौरान फूल, पत्तियां व कई तरह के घास को पूजास्थल पर रखा जाता था।
वे आगे कहते हैं कि अगर हम कृत्रिम रंगों से रंगोली बनाएंगे तो उससे प्रदूषण होगा। अक्सर त्यौहारों में रंगोली बनाई जाती है, दूसरे दिन उसे साफ कर दूसरी रंगोली बनाई जाती है। विशेषकर, दशहरा-दीवाली के दौरान घर-घर में यही देखा जाता है। यह रंगोली अगले दिन कचरे में जाती है। उसके जहरीले रंग मिट्टी, पानी में पहुंचकर प्रदूषण फैलाते हैं। यह कचरा संस्कृति है। इसमें हम कितनी सफाई करें, दूसरे दिन फिर कचरा पैदा हो जाता है। इसलिए हमें ऐसी जीवनशैली की जरूरत है, जिसमें कचरा पैदा ही न हो। यह संस्कृति पूर्व में गांव में देखी जाती थी।

इसी प्रकार, कपड़ा रंगाई में रसायन-मुक्त रंगों का उपयोग किया जा सकता है। पौधों, शैवाल, बैक्टीरिया और कवक से बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जा सकता है। इससे हर्बल रंगों के विकास को भी बढ़ावा मिलता है, जिनमें औषधीय गुण भी हैं। पौधों, फलों, छालों, तनों, खनिजों और जड़ी-बूटियों का उपयोग कपड़े बनाने के लिए किया जाता रहा है। इससे एलर्जी भी नहीं होती।
बसंत फुटाणे ने बताया कि कृत्रिम रंगों के विकल्प मौजूद हैं। वनस्पतिजन्य, पर्यावरणस्नेही रंग हम पहले इस्तेमाल करते ही थे। आधुनिक रसायनशास्त्र के विकास रंगों की चमक तथा विविधता से हम मोहग्रस्त हुए हैं। जबकि प्राकृतिक रंग हानिकारक नहीं होते हैं।
लम्बे अरसे से मनुष्य ऐसा करते आ रहे हैं। कई तरह के पेड़-पौधों, पत्तियों, फलों के रस से रंग बनाए जाते हैं। पौधों में रंग बनाने की विशेषता के साथ ही औषधीय गुण भी होते हैं, जिनका उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में होता रहा है। प्राकृतिक व जैविक रंगों की विशेषता यह है कि इनका रंग आसानी से धुल जाता है, जबकि ऑईल पेंट आसानी से साफ नहीं होता, और शरीर की त्वचा के लिए हानिकारक माना जाता है।
कुल मिलाकर, आज दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। रासायनिक खेती के कारण मिट्टी, पानी का प्रदूषण तो होता ही है, हमारे खाद्य पदार्थ भी सुरक्षित नहीं है। हम ऐसी तामझाम वाली संस्कृति जीने के आदी हो रहे हैं, जिसमें रोज ही ढेरों कचरा पैदा होता है। प्लास्टिक व पॉलीथीन का अंबार लगा रहता है। कृत्रिम रंगों से भी हमारा मिट्टी-पानी के साथ हमारा भोजन प्रदूषित हो रहा है। ऐसे में फुटाणे परिवार की कृत्रिम रंगों की पहल सकारात्मक है। इसी से बदलाव संभव है। यह ऐसी जीवनशैली है जिसमें कचरा पैदा नहीं होता या कम से कम होता है, जिससे पर्यावरण साफ-सुथरा व सुरक्षित रहता है।यह पूरी पहल सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।
लेखक के बारे में
बाबा मायाराम, स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं, वे लम्बे समय से विकास व पर्यावरण के मुद्दों पर लिखते हैं.