रासायनिक खेती के गढ़ हरियाणा में किसानों को जैविक खेती से मिली गेहूं की ज्यादा पैदावार : सर्वे (in Hindi)

By राजेंद्र चौधरीonOct. 06, 2021in Economics and Technologies

सर्वे में पाया गया कि रबी 2020 में हरियाणा के आत्मनिर्भर जैविक खेती करने वाले किसानों में 45 फीसदी किसानों को गेहूं की पैदावार रासायनिक खेती की औसत पैदावार से ज्यादा मिली।

रसायनिक खेती के दुष्प्रभावों और जैविक खेती के लाभों को स्वीकार करने के बावज़ूद, आम तौर पर रसायनिक खेती को विकल्पहीन माना जाता है और जैविक खेती को पहले से ही कम रसायनों के प्रयोग वाले इलाकों, जैसे आदिवासी इलाकों या असिंचित इलाकों के लिए ही सुझाया जाता है। स्वामीनाथन आयोग से लेकर आईसीएआर के भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम की हालिया सिफारशों में हरियाणा-पंजाब जैसे गहन कृषि के क्षेत्रों को जैविक खेती से दूर ही रखा जाता है। इस का सब से बड़ा कारण यह मान्यता रही है कि भले ही जैविक खेती टिकाऊ हो, जैविक उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर हो एवं ये पर्यावरण के लिए सुरक्षित हों, पर जैविक खेती की उत्पादकता कम होती है।  

हरियाणा, जो तथाकथित ‘हरित क्रांति’ के केंद्र में हैं। वहां के आत्मनिर्भर जैविक खेती करने वाले किसानों का अनुभव इसके विपरीत है। कुदरती खेती अभियान दवारा कोरोना काल में फ़ोन सर्वे में पाया गया कि रबी 2020 में हरियाणा के आत्मनिर्भर जैविक खेती करने वाले किसानों में से 45 फीसदी को राज्य की सब से महत्वपूर्ण फ़सल, गेहूँ में रसायनिक खेती की राज्य औसत से ज़्यादा पैदावार मिल रही है।  अन्य फसलों विशेष तौर पर धान, जो हरियाणा की खरीफ की मुख्य फसल है, में आम तौर पर पैदावार में कोई कमी नहीं होती,  इस लिए सर्वे के लिए गेहूं को ही चुना गया।। गेहूं में औसत से ज्यादा पैदावार एक-दो किसान नहीं अपितु 100 के करीब (98) किसानों ने हिस्सा लिया। इससे पहले 2019 के सर्वेक्षण में यह अनुपात ज्यादा था (60%) था हालाँकि ऐसे किसानों की कुल संख्या आधी थी।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार हरियाणा में तीन साल की गेहूं की औसत पैदावार 46 मन (1 मन= 40 किलोग्राम) प्रति एकड़ है और सी 306 किस्म की औसत पैदावार 26 मन है। ज़्यादातर जैविक किसान यही कम पैदावार वाली सी 306 किस्म ही बोते हैं क्योंकि रासायनिक खेती में भी इस के उच्च दाम मिलते हैं। इस लिए इस सर्वेक्षण में देसी किस्म की पैदावार 26 मन और उच्च पैदावार की क्षमता वाली किस्मों में 46 मन से ज्यादा प्रति एकड़ पैदावार लेने वाले जैविक किसानों की गणना की गई (क्योंकि अनुभवी जैविक किसान मिश्रित खेती करते हैं इस लिए गेहूं की सहयोगी फसलों की पैदावार को घोषित एमएसपी भाव के आधार पर सममूल्य की गेहूं में बदल दिया गया)।  केवल गेहूं की एचवाईवी (उच्च पैदावार की क्षमता वाली) किस्मों की अलग से गणना करने पर 2019 में 30% और 2020 में 18% किसानों की पैदावार औसत से ज्यादा थी।

जैविक खेती की उत्पादकता बाबत सर्वे परिणाम और आम धारणा में इतना अंतर क्यों है? यह अंतर इस लिए है क्योंकि जैविक खेती के तौर तरीकों में विविधता होती है। रासायनिक उर्वरकों, कीट नाशकों इत्यादि का उपयोग न करना जैविक खेती की न्यूनतम शर्त है परन्तु इस न्यूनतम शर्त को ही जैविक खेती की परिभाषा मान लेना गलत है। आम तौर पर किसान भी जैविक खेती की शुरुआत रसायनों का प्रयोग बंद करने से करते हैं परन्तु खेती के अन्य तौर तरीकों में कोई बदलाव नहीं करते। वही एक फसली खेती जारी रहती है, न कम्पोस्टिंग में सुधार होता है और न सिंचाई के तौर तरीकों में कोई बदलाव। जिन जैविक किसानों को अच्छा बाज़ार भाव मिल जाता है, उनके लिए पैदावार में सुधार करने की अनिवार्यता भी नहीं रहती। आय बढ़ाने के लिए प्रसंस्करण इत्यादि पर जोर दिया जाता है न कि उत्पादकता बढ़ाने पर।

क़ुदरती खेती अभियान का नजरिया भिन्न था। अभियान के पास किसानों को बाज़ार उपलब्ध कराने के संसाधन नहीं थे। किसी प्रोजेक्ट की तरह अभियान किसी सीमित क्षेत्र में सक्रिय न हो कर पूरे हरियाणा में काम करने का इच्छुक था। पूरे हरियाणा में फैले किसानों को बिक्री में सहायता करना संभव नहीं था। बिना बिक्री या आर्थिक सहायता के कोई किसान कम पैदावार के साथ खुद खाने के लिए तो जैविक खेती अपना सकता है पर बिक्री के लिए जैविक खेती तभी करेगा, जब पैदावार में गिरावट या तो न हो या बहुत कम हो जिस की भरपाई लागत में हुई कमी से हो जाए। अभियान दवारा जैविक खेती में उच्च पैदावार को लक्षित करने का एक अन्य बुनियादी कारण भी था। उच्च दाम पर कम पैदावार की जैविक खेती किसान के लिए तो लाभकारी हो सकती है पर कम पैदावार की कृषि पद्धति अर्थ शास्त्रीयों और नीति निर्धारकों को आकर्षित नहीं करेगी क्योंकि उन के लिए देश की अन्न सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण है।

लेकिन शुरू में, विशेष तौर पर गेहूं में बराबर की पैदावार नहीं मिली। समीक्षा करने पर पाया गया कि कृषि अवशेष को आग लगाना बंद करने और रसायन छोड़ने के अलावा जैविक खेती और रासायनिक खेती के तौर तरीकों में कोई विशेष अंतर नहीं आया था। मिश्रित खेती इत्यादि सरीखे उपायों को जैविक किसान न तो अनिवार्य मानते थे और न संभव। पर 2016 में आयोजित महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के जैविक कृषि भ्रमण ने इन दोनों मान्यताओं को तोड़ दिया। इन उपायों को ज़मीन पर लागू होता देख और उस के परिणामों को देख कर कुछ जैविक किसानों ने अपने तरीकों में बदलाव किया। शीघ्र ही उन्हें अच्छे परिणाम मिलने लगे। धीरे धीरे जैविक किसानों को यह बात समझ आ गई कि केवल रसायन मुक्त जैविक खेती तो कम पैदावार की खेती है और उच्च पैदावार लेने के लिए न केवल रसायन मुक्त होना पड़ेगा अपितु खेती के तौर तरीकों में बहुत से बदलाव करने पड़ेंगे।

जिन कारणों से कुदरती खेती अभियान बिक्री सहयोग न कर के केवल तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने तक सीमित रहा, उन्हीं कारणों से अभियान ने आत्मनिर्भर जैविक खेती या कुदरती खेती को अपनाने का निर्णय लिया। क्योंकि अभियान का कार्यक्षेत्र किसी एक सीमित इलाके तक महदूद नहीं था, इसलिए यह आवश्यक था कि अभियान उन जैविक तौर तरीकों को बढ़ावा दे जो एक अलग थलग पड़ा किसान भी अपना सके। अगर जैविक किसान को बाज़ार में उपलब्ध जैविक उर्वरकों या अन्य उत्पादों पर निर्भर रहना आवश्यक हो तो दूर दराज़ का अकेला किसान जैविक खेती नहीं कर सकता क्योंकि बाज़ार इक्का-दुक्का किसानों की ज़रूरतों की पूर्ती नहीं करता। प्रारम्भ से अभियान की रणनीति जैविक खेती के ऐसे उपाय अपनाने की थी जो एक आम किसान दवारा अपनाए जा सकें। हरियाणा के ठोस ज़मीनी अनुभव पर आधारित क़ुदरती खेती मार्गदर्शिका का तीसरा संस्करण भी हाल में जारी किया गया है। इस में सुझाए सभी उपाय हरियाणा में लागू किये जा चुके हैं।

तथाकथित ‘हरित क्रांति’ के केंद्र में स्थित हरियाणा में जैविक खेती को मिली सफलता ने साबित कर दिया है कि जैविक खेती कुछ विशेष इलाकों, फ़सलों या उपभोक्ताओं के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए है। क्या कृषि वैज्ञानिक स्वीकार करेंगे कि जैविक खेती उच्च उत्पादकता की खेती भी हो सकती है? हाल ही में रोहतक में आयोजित एक जनसुनवाई में जब उपरोक्त आंकड़ों की सत्यता के समर्थन में आज़ादी के तुरंत बाद के भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत कृषि पंडितों की पैदावार के सरकारी आंकडें, यानी 1949-1955 के दौर के, ‘हरित क्रांति’ एवं एचवाईवी बीजों के आने से पहले के दौर के ‘सरकारी’ आंकड़े रखे गए, तो मौके पर मौजूद कृषि वैज्ञानिकों को ये सरकारी आंकड़े इतने अविश्वसनीय लगे कि उन्होंने निसंकोच कहा कि ‘ये पैदावार प्रति एकड़ न हो कर संभवत प्रति हेक्टेयर है’!। यानी ये सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि बिना रसायनों,  बिना एचवाईवी बीजों के इतनी अच्छी पैदावार मिल सकती है कि वह अविश्वसनीय लगे। इसलिए पूर्वाग्रह को छोड़ कर खुले मन से विकल्पों की पड़ताल करनी चाहिए। अगर प्रस्तुत आंकड़े ‘वैज्ञानिकता’ के आधार पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते, तो इन को सिरे से नकारने के स्थान पर कृषि वैज्ञानिकों को चाहिए कि वो जैविक किसानों के खेतों पर जा कर ‘वैज्ञानिक’ तौर तरीकों से पड़ताल करें।


Pratham prakashak डाउन टू अर्थ, 27 सितम्बर 2021 (Down to Earth)

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