कहानियाँ क्यों ज़रूरी हैं? (in Hindi)

By शिबा डेसोर onDec. 29, 2017in Perspectives

Translated specially for Vikalp Sangam

 

एक बार की बात है, हिमालय के पहाड़ों में जब एक बूढ़ा आदमी अपने जीवन के आख़री चरण पर था उसने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और धीमी आवाज़ में उससे कहा, ‘बेटा, मीठा मडुआ खाना’। इसके कुछ समय बाद वह गुज़र गया और उसका बेटा उसके आख़री शाबादों के बारे में सोचता रह गया। उसने मडुए को गुड़, शहद और शकर के साथ खाकर देखा लेकिन उसका पिता क्या कहना चाहता था उसे समझ नहीं आया। साल गुज़र गए और बेटा उस संदेश को भूल गया। एक दिन वह लकड़ी इकट्ठा करने जंगल गया। बहुत मेहनत की और काम ख़त्म होने तक शाम हो गयी थी। उसे याद आया कि वह घर से बाँध कर मडुआ की कुछ सूखी रोटियाँ लाया था । जब उसने उन्हें खाना शुरू किया तो वह दंग रह गया। इससे पहले कभी भी उसे मडुआ इतना मीठा नहीं लगा था और तभी उसे अपने पिता के आख़री शब्द याद आए और उसकी समझ में आया कि उसके पिता का वास्तविक संदेश क्या था। भूख से भोजन मीठा होता है। और सच्ची भूख तभी लगती है जब श्रम किया हो।

मुझे यह कहानी मुन्स्यारी के सरमोली गाँव की बड़ी मा (ठुल आम) हिर्मा देवी सुमतियाल ने बतायी। पर यह उन्होंने अपने मन से नहीं बनायी थी। बल्कि यह कहानी उन्होंने अपने बचपन की आन कथाओं के समय सुनी थी। ऐसी आन कथाओं का आदान प्रदान बर्फ़ीली सर्दियों में शाम को शुरू हो कर देर रात तक चलता था और इसमें गाँव के बुज़ुर्ग गाँव के बच्चों और युवाओं को पहेलियों की चुनौती देते थे। लेकिन वर्तमान काल दूरदर्शन और स्मार्ट फ़ोन्स का युग है, जिसमें लोगों ने अपने मनोरंजन और शिक्षा के दूसरे तरीक़े ढूंड लिए हैं और आन-कथाओं का रिवाज लगभग ख़त्म हो गया है।  

भारत का कोना कोना विभिन्न प्रकार के कहानीकारी से गूँजता है जिसमें लोग सदियों से मौखिक रूप से अपनी कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी बाँटते आए हैं। जहाँ एक ओर इसके रूप में विविधता है (गाने, दोहे, पहेली, या लम्बी कथाएँ) वहीं दूसरी ओर इसके विषय  में भी (जो रसीला, व्यंग-भरा, उदासीन, व्यावहारिक, दिल-बहलाने वाला,रोमांचक या प्रचारक हो सकता है)। मेरी जनमभूमि पंजाब से मेरी माँ याद करके बताती हैं कि गरमियों की रातों में उनकी माँ या नानी उन्हें और घर के अन्य बच्चों  को कहानियाँ  सुनाने से पहले उनसे आश्वासन लेती थीं कि यह सुनते सुनते हुँगारा देंगे अर्थात- समय समय पर हूँ बोलकर यह बताएँगे के वे अभी भी सुन रहे हैं और सोए नहीं।

मनुष्य के इतिहास में कहानियों का हमेशा से एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सेपियंस पुस्तक के लेखक युवाल नोः हरारी का यह मानना है कि कोई भी ऐसा कार्य जो विशाल स्तर पर मनुष्य की सहकारिता पर आधारित हो – चाहे वह आधुनिक राज्य हो, मध्यकालीन गिरजाघर हो, प्राचीन नगर हो या आदिम जनजाति हो, ऐसे हर कार्य का आधार कुछ ऐसे सामान्य मिथकों में है जो लोगों कि सामूहिक कल्पना में ही मौजूद होते हैं। काल्पनिक कथाओं पर विश्वास करने की हमारी यही क्षमता धर्म, राष्ट्रवाद, यहाँ तक कि न्याय और मानव अधिकार सम्बंधित धारणाओं की भी बुनियाद बनती है। अर्थात एक प्रकार से इतिहास का प्रत्येक  युद्ध, आक्रमण, बदलाव और चुनाव वास्तव में एक कहानियों की प्रतियोगिता है- कौन सबसे अधिक मंत्र-मुग्ध करने वाली कहानी बन सकता है?

कहानियों से पता चलता है कि हम किस प्रकार जीवन में अर्थ ढूंढते हैं। मीठे मडुए की कहानी में परिश्रम भोजन को स्वादिष्ट बनाता है। कहानियाँ हमारे मूल्यों की तरफ़ भी संकेत करती हैं। लद्दाख़  के पहाड़ों में एक गाँव में लोग अपने घरों में मुसाफ़िरों  का स्वागत करते हैं क्यूँकि वे मानते हैं कि अगर हम अपने घर को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति मानेंगे तो हम अगले जन्म में कछवे का रूप लेंगे जो अपना घर अपनी पीठ पर लिए चलता है। ऐसा मुझे गंग्लैस गाँव की सेरिंग आंगमो ने बताया।

कहानियाँ सम्बंधों और समानताओं को भी सामने लाती हैं। भारत के संतल आदिवासियों की रचना गाथा में धरती एक कछवे की पीठ पर टिकी है। कोसों दूर पूर्वी अमेरिका के अनिशिनाबेग लोगों के अनुसार एक टर्टल पृथ्वी को अपनी पीठ पर सम्भालता है। ऐसी समानताएँ संकेत करती हैं कि शायद इन विभिन्न जनजातियों का एक ही स्त्रोत था या शायद उस समय विश्व भर में कोई ऐसी ऐतिहासिक घटनाएँ हुई होंगी जिन्हें इन कहानियों द्वारा दर्ज किया गया है। वास्तव में कई लोगों का ऐसा मानना है कि हमारे मिथिकों में हमारा इतिहास दर्ज है।  माना जाता है के ऑस्ट्रेल्या की आदिम जनजातियों की कहानियों में समुद्री स्तर में हुई बढ़ौती की घटना दर्ज है जो कि ७००० साल और १८००० साल पहले के बीच के समय में हुई थी। यह कहानियाँ ३०० पीढ़ियों का सफ़र पार कर वर्तमान तक पहुँचीं।

कहानियों की रचना तीखे तर्क और मज़े के लिए भी हो सकती है। जैसे कि महाराष्ट्र में प्रचलित एक संक्षिप्त कहानी जिसे बूढ़ी अम्मा कहानी के लिए ज़िद्द करते हुए बच्चों से पीछा छुड़ाने के लिए बोलती हैं- एक बुढ़िया थी जो बचपन में ही मर गयी।

लेकिन ऐसा लगता है कि आज के ज़माने में हम उन तंत्रों को ही खो दिए हैं जो ऐसी कहानियों की रचना करते थे। वे ज़ुबानें ही नहीं रहीं। पिछले पाँच दशकों में २२० से अधिक भाषाएँ लुप्त हो गयी हैं। ऑस्ट्रेल्या में १०० से अधिक आदिम भाषाएँ मर चुकी हैं और जो बची हैं उनमें से ७५% लुप्त होनें की कगार पर हैं।

मैं जानती हूँ कि बहुत से लोगों के लिए यह विकास का एक ऐसा नुक़सान है जिसे हमें सहना ही होगा। लेकिन प्रकृति को समझने वाले किसी भी मनुष्य को ऐसी समझ में कुछ गड़बड़ लगेगी। क्यूँकि वे ताक़तें एक ही हैं जो एक ओर हमारी प्रकृति और जैवविविधता को जोखिम में डाल रही हैं और दूसरी ओर हमारी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को नुक़सान पहुँचा रही हैं। आर्थिक विकास की ओर हमारी भागम भाग ही दोनो की जड़ में है, जिससे हमारी ज़रूरतें, हमारे सामाजिक रिश्ते, हमारे परिदृश्य और हमारे जीवन में तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं।  इन बदलावों का सामना करने के लिए हम एकरूपता और अनुपालन में पनाह ले रहे हैं। अतः हमारी लोक कथाएँ अपनी ख़ामोशी में गूँज रही हैं। सौ या हज़ार साल बाद अगर कोई हमारे मिथिकों को समझने की कोशिश करता है, तो उसके अनुसार आज की सदी के सबसे बड़े मिथिक क्या होंगे? हमारी कहानियाँ कैसे ढल रही हैं? हमारे विश्वास क्या हैं?

कहानियों के महत्त्व का रूमानीकरण करना मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं जानती हूँ कि दूसरे माध्यमों की तरह कहानियों का भी शोषण के लिए दुरुपयोग हो सकता है। लेकिन दुरुपयोग की सम्भावना का यह अर्थ नहीं है कि वह माध्यम और उसमें घड़ी सम्पूर्ण रचनाएँ व्यर्थ हैं। सांस्कृतिक और भोगौलिक विविधता से परिपूर्ण इस धरती पर ऐसी पीड़ी-दर-पीड़ी चलती आयी स्थानीय और वैश्विक मौखिक कहानियों से हमें कई कुछ सीखने को मिल सकता है। हमारे सम्भव इतिहासों की एक गहरी समझ आगे के लिए विविध और शायद बेहतर सम्भावनाओं को खोजने के लिए हमारी मदद कर सकती है।  

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Read the original Why Storytelling traditions remain Relevant Today

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