पश्चिमी हिमालय में महामारी से मुकाबला (in Hindi)

PostedonApr. 15, 2021in Perspectives
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परिचय
पश्चिमी हिमालय पर नज़र क्यों?

भारतीय हिमालय क्षेत्र में १२ राज्य शामिल हैं, जबकि पश्चिमी हिमालय हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर तक फैला हुआ है. यहां ५१ मिलियन (५.१ करोड़)आबादी निवास कराती है. इस क्षेत्र में वनस्पति व जीव-जंतुओं की काफी विविधता है. यह क्षेत्र भारतीय महाद्वीप के बड़े हिस्से को न केवल पानी उपलब्ध कराता है बालको ऊँची चोटियां, विशाल भूदृश्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत यहां की पहचान है.

यहां के पहाड़ जलवायु बदलाव के त्वरित संकेत हैं. घटते हिमनद (ग्लेशिअर) नदियों के प्रवाह में बदलाव करते हैं और इसके साथ जैव-विविधता में और लोगों की आजीविका में बदलाव आता है. और कुल मिलाकर, इस सबसे उनकी बेहतरी भी प्रभावित होती है. जलवायु बदलास, भूमि का खराब होते जाना, अत्यधिक दोहन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण हिमालयी राज्य, दुनिया में सबसे अधिक वंचित इलाकों में से एक हैं.

पहाड़ आवागमन को कठिन बनाते हैं. जानकारियों का आदान-प्रदान भी आसान नहीं है, व्यवस्थित रूप से जानकारी प्राप्त करना भी पहाड़ों में कठिन है. इंटरनेट धीमा चलना, डिजिटल दूरी के साथ साथ दूरदराज के इलाकों में समस्याएँ बढाती जाती हैं. यह कहा जाता है कि दक्षिण एशिया में पहाड़ के हर तीसरे व्यक्ति गरीबी और खाद्य असुरक्षा की चपेट में है.

इस क्षेत्र में पर्यटन की शुरुआत ब्रिटिश हुकूमत स्थापित होने के साथ हुई, जब उनहोंने हिल स्टेशन और समर रिज़ॉर्ट बनाये. जैसे नैनीताल, मसूरी, शिमला इत्यादि, जो आज बड़े पर्यटन स्थल के रूप में उभर चुके हैं. इस क्षेत्र में बहुत से तीर्थस्थल हैं.  जैसे बद्रीनाथ, चार धाम, केदारनाथ, इत्यादि. इस क्षेत्र में पर्यटन की अत्यधिक संभावनाएं हैं, पर महत्वपूर्ण सवाल टिकाऊपन, वहन क्षमता और पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन का है.

इसके अलावा, सबसे बड़ी चिंता का विषय कचरा प्रबंधन है और बढाती पर्यटकों की संख्या के नतीजे के रूप में प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ना है. इस सबके मद्देनज़र समुदाय आधारित पर्यटन एक टिकाऊ विकल्प दिखाई देता है, जहां होमस्टे से ग्रामीण समुदायों की आय बढ़ सकती है.

अधिकांश भारत की तरह, हिमालय क्षेत्र भी मोटे तौर पर कृषि पर निर्भर है. हालाँकि कृषि के व्यवसायीकरण और बढ़ते वृक्षारोपण ने स्थानीय समुदायों को उनके मूल आधार से काफी अलग-थलग कर दिया है. इस क्षेत्र में पशुपालक और ऋतु प्रवास ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि रहे हैं. संपत्ति अधिकार और वन कानूनों के आने के बाद बहुत से पशुपालक समुदाय जैसे वन गुर्जर, कई तरह के अधिकारों से वंचित हो गए. वे बिना वोट के अधिकार, बिना बिजली और बिना घर के बेघर हो गए. जंगल आधारित समुदाय लगातार वंचित हो रहे हैं और उन्हें अक्सर अवैध बाशिंदे की तरह माना जाता है. राज्य और केंद्र की कोशिश होती है कि उन्हें बसा दिया जाए और उनकी आवाजाही को रोका जाये.

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Read the original report in English (with 10 stories) – Pandemic Resilience in the Western Himalayas

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