कीट नहीं, कीटनाशक है दुश्मन (in Hindi)

By अनुवाद : रोहित बंसल; लेखक: मनु मुदगिल on July 8, 2016 in Environment and Ecology

(Keet nahin, Keetnaashak hai dushman)

कीटों एवं फसलों की पारस्परिक निर्भरता : शत-प्रतिशत प्राकृतिक एवं लाभदायक

किसान महिलायें कक्षा में कीटों का अध्ययन करते हुये

हरियाणा के ललितखेड़ा गाँव में एक घर की छत पर, दिन ढलते ही, एक बल्ब जल उठता है, जिसके मध्यम प्रकाश में शीला देवी, प्याले और तश्तरी से, उन कीटों को पकड़तीं हैं जो समीप के तालाव से उड़कर, झुण्ड के झुण्ड, वहाँ आ जाते हैं। शीला देवी एक समय में एक कीट को ही पकड़तीं हैं और उसका अध्यन करती हैं। निरक्षर एवं पचासवें वर्ष की ओर अग्रसर शीला देवी २०० से भी अधिक कीटों को न केवल पहचान सकतीं हैं अपितु उनके खान-पान, आवासीय एवं प्रजनन लक्षणों की जानकारी भी रखती हैं। गत वर्ष, जब चिट्टी मक्खी (व्हाइट फ्लाई)ने उत्तरीय भारत में कपास की फसल नष्ट कर दी, इसी कीट-ज्ञान ने शीला देवी की फसल बचाने में मदद की। वे कहती हैं, “फसल अच्छी हुयी और कीटनाशक के पैसे भी बच गये।”

अहिंसात्मक दृष्टिकोंण

शीला देवी, हरियाणा के जिंद जिले में २५० किसानों के एक ऐसे समूह की सदस्या हैं, जिसका विश्वास है कि कीटनाशक लाभ से अधिक विनाश करते हैं। इस सम्मति का कारण मात्र पर्यावरण-प्रदूषण एवं स्वास्थ्य पर कुप्रभाव तक सीमित नहीं है। डा॰ सुरेन्द्र दलाल कीट-साक्षरता पाठशाला के तले कार्यरत यह किसान-समूह जैविक या प्राकृतिक खेती का समर्थक नहीं है, और रासायनिक खाद का प्रयोग भी करता है, परन्तु कीटों के विषय में इस समूह का दृष्टिकोंण अनूठा है।

कीटों को मित्र या शत्रु समझने एवं प्राकृतिक कीटनाशक के प्रयोग का समर्थन करने वाले प्राकृतिक खेती के समर्थकों के विपरीत, इस समूह ने सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को अपनाया है। मनवीर सिंह, जिंन्होने इस सिद्धान्त को प्रारम्भ में ही अपना लिया था, कहते हैं, “जो कीट हमें आँखों से दिखाई भी नहीं देते, उनको नियन्त्रित करने का विश्वास  निरर्थक है। (कीटों से) युद्ध से शान्ति सदैव ही श्रेयस्कर है।”

इस समूह का विश्वास है कि फसल के लिये प्रत्येक कीट महत्वपूर्ण है। मनवीर सिंह कहते हैं, “कीटों की मुख्यतः दो श्रेणियाँ हैं - शाकाहारी (जो फसल खाते हैं) एवं मांसाहारी (जो अन्य कीट खाते हैं) - और खेतों में दोनों की आवश्यकता है। शाकाहारी कीट पौधों की सुगन्ध एवं रंग इत्यादि से आकर्षित होते हैं और पत्तों इत्यादि की संख्या पर नियन्त्रण रखते हैं। जैसे ही शाकाहारी कीटों की संख्या में जरूरत से अधिक वृद्धि होती है, मांसाहारी कीट स्वतः आकर इस वृद्धि पर अंकुश लगा देते हैं। इसी प्राकृतिक संतुलन को कीटनाशक का प्रयोग नष्ट कर देता है।”

संख्या का सिद्धान्त

वर्षों के अध्ययन के पश्चात, वर्ष २००८ में, डा॰ सुरेन्द्र दलाल ने, जो निदान गाँव के भूतपूर्व कृषि विकास अधिकारी थे, कीट-साक्षरता अभियान शुरू किया। धैर्य एवं प्रकृति पर अटूट विश्वास इस अभियान के मूल मन्त्र हैं। यद्यपि डा॰ दलाल का २०१३ में निधन हो गया, उनके ज्ञान एवं उपलब्धियों का प्रसार आज भी हो रहा है। अभियान प्रचारक कभी भी किसानों को कीटनाशक के प्रयोग के लिये मना नहीं करते। श्री मलिक कहते हैं, “हम किसानों को, उनकी फसलों के लिये हानिकारक कीटों के विषय में जानने के लिये प्रेरित करते हैं। तत्पश्चात, कीटनाशक का प्रयोग करने का निश्चय किसानों पर निर्भर करता है। परन्तु हम (सिद्धान्त पर विश्वास के कारण) दावा कर सकते हैं कि किसान कीटनाशक का प्रयोग नहीं करेगें।”

प्रशिक्षण में किसानों को कीटों को पहचानने एवं उनकी संख्या की गणना हेतु आतशी शीशे भी दिये जाते हैं। प्रत्येक हफ्ते (गणना कर) संख्या ज्ञात होने पर, किसान कीटों के प्राकृतिक जन्म-चक्र से अवगत हो जाते हैं - पहले शाकाहारी कीटों की संख्या में वृद्धि होना, तत्पश्चात, मांसाहारी कीटों की संख्या में वृद्धि के कारण शाकाहारी कीटों की संख्या में कमी होना। मांसाहारी कीटों में भी एक विशेष प्रजाति, जिसे स्थानीय भाषा में परपेतिया कहते हैं, अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस परजीवी कीट के अण्डे शाकाहारी कीट के शरीर के अन्दर बड़े होतें हैं और अन्ततः उस कीट को मारकर बाहर आ जाते हैं।

“प्रशिक्षण में किसान विभिन्न कीटों की संख्या की गणना प्रत्येक हफ्ते करते हैं, जिससे कीटों के प्राकृतिक जन्म-चक्र की जानकारी होती है।”

ऐसे एक कीट का स्थानीय नाम है - अंगिरा। यह कीट, कपास की फसल को नष्ट करने वाले सफेद फुईं में अण्डे देता है। मनवीर सिंह कहते हैं, “कीटनाशक के प्रयोग से अंगिरा जैसे कीट तो नष्ट हों जाते हैं परन्तु सफेद फुईं के लार्वा नष्ट नहीं होते क्योंकि वे सफेद फुईं के पेट की थैली में होते हैं। इससे सफेद फुईं की संख्या में वृद्धि होती है क्योंकि उनको नियन्त्रित करने वाले, अंगिरा जैसे कीट, कीटनाशक के द्वारा नष्ट हो जाते हैं।”

गत वर्ष, जब मौसम के कारण चिट्टी मक्खी की संख्या ६ प्रति पत्ते की सामान्य दर से १० प्रति पत्ता हो गयी, तब किसानों ने  नीम-आधारित कीटनाशक के प्रयोग पर विचार-विमर्श किया, परन्तु फिर प्रतीक्षा करने का निश्चय किया। “अगले सप्ताह ही मांसाहारी कीटों के कारण चिट्टी मक्खी की संख्या ३ प्रति पत्ता रह गयी। जिन किसानों ने कीटनाशक का प्रयोग किया उनकी फसल मात्र ३.२ क्विन्टल प्रति एकड़ की औसत से हुयी। मेरी लागत कम थी और फसल भी ६.८ क्विन्टल प्रति एकड़ की औसत से हुयी”, मनवीर सिंह ने बताया।

यद्यपि जलवायु परिवर्तन के कारण कीटों के आक्रमणों की आवृत्ति में वृद्धि हुयी है, कीटों को समझने वाले किसानों का विश्वास है कि प्रकृति अपने संतुलन को बनाये रखने में अभी भी सक्षम है। मनवीर सिंह कहते हैं, “फसलों के विनाश में वृद्धि का कारण कीट नहीं, अपितु मानवीय हस्तक्षेप है।”

व्यापक अभियान

कीट प्रशिक्षण की कक्षा - स्रोत: कीट-साक्षरता अभियान

विगत कई वर्षों में कीट-साक्षरता अभियान की लोकप्रियता ने सरकार और जन-समुदाय को आकर्षित किया है और इसे जिला प्रशासन, कृषि विभाग एवं हरियाणा के कृषि-आयोग का समर्थन भी प्राप्त हुआ है। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कीट एकीकृत प्रबन्धन संस्थान ने इस पद्धति पर ३ वर्षों का परीक्षण भी प्रारम्भ किया है।

यद्यपि यह सिद्धान्त बाकी जनपदों में फैल रहा है, पड़ोसी प्रदेश पंजाब के किसानों के प्रशिक्षण प्राप्त करने एवं महिलाओं के सम्मिलित होने के कारण अभियान का प्रसार तीव्र गति से हुआ है। “हरियाणा में महिलायें भले ही पर्दे में रहती हों, परन्तु वे खेतों में पुरुषों से अधिक श्रम करती हैं। आज इस समूह में लगभग १०० महिलायें हैं और अभियान के सन्देश का प्रचार कर रहीं हैं”, मलिक बताते हैं। इन महिलाओं ने इस सिद्धान्त को आधार बना कर कई रागिनियों (हरियाणवी लोक संगीत) की रचना भी की है।

“कीट-साक्षरता अभियान की बढ़ती लोकप्रियता ने सरकार और समुदाय के नेताओं का ध्यान आकर्षित किया है।”

हरियाणा में सामाजिक विवादों का निवारण करने वाली खाप-पंचायत के लिये यह आश्चर्यजनक ही था जब कीट-साक्षरता अभियान ने मानव-कीट संघर्ष निवारण के लिये उनकी मदद माँगी। खाप-पंचायत ने पहले तो इसे नकार दिया, परन्तु अभियान के सदस्यों से इस सिद्धान्त के आधारभूत विज्ञान की व्याख्या सुनने के पश्चात खाप-पंचायत ने एक अध्ययन समूह का गठन किया, जिसमें भूतपूर्व न्यायाधीश, खाद्य नीति के विशेषज्ञ एवं कृषक-आयोग के सचिव सम्मलित थे। अंततः इस अध्ययन समूह ने सरकार को कीट-साक्षरता को बढ़ावा देने का सुझाव दिया।

गत वर्ष, निदान गाँव में आयोजित एक सर्व-जाति खाप-महापंचायत में एक कृत्रिम मुकदमा चलाया गया, जिसमें किसानों ने अपना पक्ष रखा और कीट-साक्षरता अभियान के सदस्यों ने, जिसमें महिलायें भी थीं, शाकाहारी एवं मांसाहारी कीटों का पक्ष प्रस्तुत किया। दोनो पक्षों को सुनने के पश्चात महापंचायत ने निर्णय दिया कि कीटों का कोई दोष नहीं हैं, और किसानों को, कीटों के विरूद्ध, कीटनाशक बेचने वाली कम्पनियों ने भड़काया था।

इतने समर्थन के पश्चात भी अभियान के सदस्य वित्तीय सहयोग के अभाव का अनुभव करते हैं। उन्हें खेती से समय निकालकर अन्य किसानों को प्रशिक्षित करने का अवसर प्राप्त नहीं होता। “जब डा॰ दलाल जीवित थे, आवश्यक ज्ञान एवं समय होने के कारण, वह अभियान के सभी पक्षों में सामंजस्य स्थापित करते थे। राज्य सरकार को ऐसे अभियानों को वित्तीय सहायता अवश्य देना चाहिये, क्योंकि कीटनाशकों का प्रयोग न करने से, न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, वरन सभी के स्वास्थ्य में सुधार भी होगा”, रणबीर मलिक का दावा है।

किसानों पर बढ़ते ऋण के बोझ का एक मुख्य कारण है - खेती की लागत में वृद्धि, जो कीटनाशकों के प्रयोग से बढ़ती है, अतः कीटनाशक-मुक्त खेती करने से ही लाभप्रद खेती संभव है।

प्रथम प्रकाशन: ३१ मार्च, २०१६,  India Water Portal

Read the original story in English



Story Tags: insect life-cycle, ecology, Agroecology, food production, organic agriculture, organic, women peasants, women empowerment

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